परिसीमन: तमिलनाडु विधानसभा ने लोकसभा की 543 सीटें बरकरार रखने का प्रस्ताव पारित किया
‘द हिंदू’ के मुताबिक, तमिलनाडु विधानसभा ने बुधवार, 12 अगस्त 2026 को केंद्र सरकार से लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों की संख्या को स्थिर रखने और राज्यों के बीच सीटों के वर्तमान अनुपात को बनाए रखने की मांग वाला प्रस्ताव पारित किया. प्रस्ताव में लोकसभा और राज्यसभा के मौजूदा 2.2:1 अनुपात को बनाए रखने के साथ 2029 के लोकसभा चुनाव में मौजूदा 543 सीटों के आधार पर महिलाओं को 33% आरक्षण देने और इसके बाद होने वाले विधानसभा चुनावों में भी इसे बिना देरी लागू करने की मांग की गई है.
मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने प्रस्ताव पेश करते हुए कहा कि महिलाओं को राजनीति में आगे बढ़ने के लिए अवसर देना जरूरी है. उन्होंने कहा कि महिला आरक्षण कोई रियायत नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और संवैधानिक अधिकार का विषय है. उन्होंने बताया कि तमिलनाडु में महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों से अधिक है, लेकिन पिछली विधानसभा में 234 विधायकों में केवल 12 महिलाएं थीं. मौजूदा विधानसभा में यह संख्या बढ़कर 23 हुई है.
विजय ने कहा कि 2023 में संसद ने 106वां संविधान संशोधन पारित कर लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीट आरक्षित करने का प्रावधान किया था. हालांकि, केंद्र ने इसे जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन से जोड़ दिया. उनके मुताबिक, इससे महिलाओं के राजनीतिक अधिकारों को लागू करने में वर्षों की देरी हो सकती है.
उन्होंने 2026 के 131वें संविधान संशोधन विधेयक और परिसीमन विधेयक का भी उल्लेख किया. 17 अप्रैल 2026 को लोकसभा में परिसीमन विधेयक को दो-तिहाई सदस्यों का समर्थन नहीं मिल सका था.
दक्षिणी राज्यों के प्रतिनिधित्व पर चिंता
मुख्यमंत्री ने कहा कि 8 अगस्त को तमिलनाडु के सांसदों की बैठक में परिसीमन के संभावित प्रभावों पर चर्चा हुई थी. उनके मुताबिक, यदि लोकसभा की सीटों की संख्या 50% तक बढ़ाई भी जाती है, तो 2026 की जनगणना के बाद राज्यों की आबादी के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन किया जा सकता है. ऐसी स्थिति में दक्षिणी राज्यों के लोकसभा प्रतिनिधित्व में बड़ी कमी आ सकती है.
विजय ने कहा कि तमिलनाडु और अन्य दक्षिणी राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण के उपायों को सफलतापूर्वक लागू किया है. आबादी के आधार पर परिसीमन होने पर इन राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कमी उनके लिए बड़ा प्रतिनिधित्वात्मक अन्याय होगा.
उदयनिधि ने डीएमके की भूमिका बताई
विपक्ष के नेता उदयनिधि स्टालिन ने कहा कि परिसीमन से पैदा होने वाले खतरे को सबसे पहले डीएमके ने राष्ट्रीय स्तर पर उठाया था. उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन द्वारा पिछले दो वर्षों में की गई पहलों का उल्लेख किया, जिसमें सर्वदलीय बैठक बुलाना, विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों और राजनीतिक दलों के नेताओं को पत्र लिखना तथा दक्षिण के पांचों राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ निष्पक्ष परिसीमन के लिए संयुक्त कार्य समूह बनाना शामिल था.
उदयनिधि ने कहा कि 16 अप्रैल 2026 को एम.के. स्टालिन ने परिसीमन विधेयक की प्रति जलाई थी. उन्होंने दावा किया कि संसद में विधेयक को रोकने में डीएमके ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी मौजूदा स्थिति को 25 साल से अधिक समय तक बनाए रखने और महिलाओं के लिए 33% आरक्षण लागू करने के पक्ष में है.
अन्नाद्रमुक ने प्रस्ताव का विरोध किया
अन्नाद्रमुक महासचिव एडप्पाडी के. पलानीस्वामी ने प्रस्ताव का विरोध करते हुए कहा कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में आश्वासन दिया था कि लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ने की स्थिति में भी तमिलनाडु का मौजूदा 7.18% प्रतिनिधित्व कम नहीं किया जाएगा.
पलानीस्वामी ने कहा कि परिसीमन में कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन तमिलनाडु का प्रतिनिधित्व 7.18% से कम नहीं होना चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि उनकी पार्टी ने संसद में महिलाओं के लिए आरक्षण की मांग पहले भी उठाई थी.
उन्होंने आरोप लगाया कि परिसीमन विधेयक को लेकर कोई स्पष्ट संकेत नहीं होने के बावजूद तमिलनाडु की सरकार ने राजनीतिक माहौल बनाने के लिए विधानसभा में यह प्रस्ताव लाया.
अन्नाद्रमुक के साथ पीएमके, डीएमडीके और भाजपा ने भी प्रस्ताव का विरोध किया, जबकि डीएमके समेत अन्य दलों ने इसका समर्थन किया. हालांकि, प्रस्ताव का विरोध करने वाले दलों के प्रतिनिधियों ने भी विधानसभा में अपने भाषण के दौरान महिलाओं के लिए 33% आरक्षण लागू करने का समर्थन किया.
प्रस्ताव के जरिए तमिलनाडु ने एक साथ दो मांगें सामने रखी हैं. पहली, परिसीमन के बाद राज्य के लोकसभा प्रतिनिधित्व में मौजूदा हिस्सेदारी कम न हो और 543 सीटों का वर्तमान ढांचा बरकरार रहे. दूसरी, महिलाओं के लिए 33% आरक्षण को जनगणना और परिसीमन से अलग कर 2029 के लोकसभा चुनाव से ही लागू किया जाए.

