एस. वाई. कुरैशी | लोकसभा की संख्या 543 ही क्यों रहनी चाहिए

13 अगस्त 2026 को संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के कई दिन बाद भी मानसून सत्र को औपचारिक रूप से सत्रावसान नहीं किया गया है. इससे अटकलें तेज हैं कि संसद को परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े संवैधानिक संशोधन पर फिर से बुलाया जा सकता है. चाहे ऐसा हो या नहीं, एक महत्वपूर्ण सवाल अब सामने है: क्या परिसीमन का मतलब अनिवार्य रूप से लोकसभा की सदस्य संख्या बढ़ाना है?

सिर्फ आंकड़ों से तय नहीं हो सकता फैसला

पहली नजर में यह सवाल गणित का लगता है. लोकसभा सीटों की संख्या तय होने के बाद भारत की आबादी कई गुना बढ़ चुकी है, इसलिए यह तर्क दिया जाता है कि प्रतिनिधित्व भी उसी अनुपात में बढ़ना चाहिए. लेकिन संवैधानिक व्यवस्था केवल अंकगणित से नहीं चलती.

संविधान का अनुच्छेद 81 कहता है कि जहां तक व्यावहारिक रूप से संभव हो, प्रतिनिधित्व आबादी के अनुपात में होना चाहिए, जबकि अनुच्छेद 82 प्रत्येक जनगणना के बाद सीटों के पुनर्समायोजन का प्रावधान करता है. लेकिन जब कोई बड़ा राष्ट्रीय उद्देश्य सामने आया, तब संसद ने इस सिद्धांत को दो बार बदला.

1976 में 42वें संविधान संशोधन के जरिए राज्यों के बीच लोकसभा सीटों का आवंटन 1971 की जनगणना के आधार पर स्थिर कर दिया गया. इसका उद्देश्य यह था कि जिन राज्यों ने परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण में सफलता हासिल की, उन्हें राजनीतिक रूप से दंडित न किया जाए. बाद में 84वें संविधान संशोधन के जरिए इस व्यवस्था को 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के आंकड़े प्रकाशित होने तक बढ़ा दिया गया. यानी संसद ने खुद माना कि आबादी महत्वपूर्ण है, लेकिन वह एकमात्र संवैधानिक मूल्य नहीं है.

कथित तौर पर सरकार हर राज्य की सीटों में लगभग 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी का विचार रख रही है, ताकि सभी राज्यों का लोकसभा में मौजूदा "अनुपात" बना रहे. पहली नजर में यह दक्षिणी राज्यों की आशंकाओं का समाधान लगता है, लेकिन अनुपात पूरी तस्वीर नहीं बताता.

मान लीजिए उत्तर प्रदेश की सीटें 80 से बढ़कर 120 हो जाती हैं और तमिलनाडु की 39 से लगभग 59. दोनों के बीच अनुपात लगभग वही रहेगा, लेकिन उनकी वास्तविक संख्या का अंतर 41 सांसदों से बढ़कर करीब 61 हो जाएगा. संसद अनुपात के आधार पर मतदान नहीं करती. सरकारें संख्या के आधार पर बनती हैं, विश्वास प्रस्ताव, कानून और संवैधानिक संशोधन संख्या के आधार पर तय होते हैं. इसलिए 50 प्रतिशत की समान बढ़ोतरी अनुपात को भले बचा ले, लेकिन राज्यों के बीच वास्तविक राजनीतिक अंतर बढ़ा देगी.

1976 का फैसला इसलिए एक संघीय समझौता था. जिन राज्यों ने जनसंख्या स्थिरीकरण में सफलता हासिल की, उनकी राजनीतिक आवाज कमजोर नहीं होगी. इस समझ को अब बिना गंभीर विचार के खत्म नहीं किया जाना चाहिए.

परिसीमन और सीटों की बढ़ोतरी एक ही बात नहीं

एक बड़ी गलतफहमी यह है कि परिसीमन और लोकसभा का विस्तार एक-दूसरे से अलग नहीं किए जा सकते. ऐसा नहीं है. भारत पहले भी यह कर चुका है. 2001 की जनगणना के बाद परिसीमन में राज्यों के भीतर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं बदली गईं, लेकिन राज्यों के बीच सीटों का मौजूदा आवंटन बरकरार रखा गया.

यही सिद्धांत फिर अपनाया जा सकता है. 2027 की जनगणना के आधार पर प्रत्येक राज्य के भीतर निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन किया जाए, ताकि आबादी का वितरण अधिक संतुलित हो. शहरीकरण और जनसंख्या के स्थानांतरण को ध्यान में रखकर सीमाएं बदली जाएं. इसके लिए लोकसभा की संख्या 543 से बढ़ाने या मौजूदा संघीय संतुलन को बदलने की कोई आवश्यकता नहीं है.

दुनिया के कई लोकतंत्र भी दिखाते हैं कि आबादी बढ़ने के साथ संसद का आकार बढ़ाना कोई अनिवार्य लोकतांत्रिक नियम नहीं है. अमेरिका के प्रतिनिधि सभा में एक सदी से अधिक समय से 435 मतदान सदस्य हैं, हालांकि कुछ अस्थायी अपवाद रहे हैं. स्विट्जरलैंड की नेशनल काउंसिल 1963 से 200 सदस्यों की है. हंगरी ने अपनी संसद को 386 से घटाकर 199 सदस्य कर दिया, जबकि इटली ने चैंबर ऑफ डेप्युटीज की संख्या 630 से घटाकर 400 कर दी.

बड़ी लोकसभा, कमजोर विमर्श

एक और गंभीर सवाल यह है कि बड़ी लोकसभा संसद के कामकाज को कैसे प्रभावित करेगी. सांसदों की संख्या बढ़ने के साथ संसदीय समय नहीं बढ़ता. 543 सदस्यों वाली लोकसभा में भी कई सांसदों को बोलने, सवाल पूछने या सार्वजनिक महत्व के मुद्दे उठाने का पर्याप्त अवसर नहीं मिलता. यदि लोकसभा 50 प्रतिशत बढ़कर 800 से अधिक सदस्यों की हो जाती है, तो यह अवसर और कम हो सकते हैं.

इससे प्रतिनिधित्व संख्या के लिहाज से बढ़ेगा, लेकिन संसदीय विमर्श की गुणवत्ता कमजोर पड़ सकती है. भारतीय सांसद पहले से ही दुनिया के बड़े लोकतंत्रों की तुलना में बहुत बड़ी आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं. ऐसे में नागरिकों तक प्रतिनिधियों की पहुंच बेहतर बनाने की जरूरत वास्तविक है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि सभी अतिरिक्त प्रतिनिधि संसद में ही बैठें.

लोग अपने प्रतिनिधियों के पास सड़क, स्कूल, अस्पताल, स्थानीय सेवाओं और राज्य प्रशासन से जुड़े मामलों के लिए अधिक जाते हैं. ये विषय मुख्य रूप से राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं. इसलिए यदि आबादी बढ़ने से निर्वाचन क्षेत्र बहुत बड़े हो गए हैं, तो अधिक व्यावहारिक समाधान राज्य स्तर पर प्रतिनिधित्व बढ़ाना है.

विधानसभाओं में सदस्यों की संख्या बढ़ाई जा सकती है और विधानसभा क्षेत्रों को छोटा किया जा सकता है. इससे प्रतिनिधि नागरिकों के करीब पहुंचेंगे, लेकिन संसद में राज्यों के बीच शक्ति संतुलन नहीं बदलेगा. किसी राज्य की विधानसभा बड़ी होने से दूसरे राज्य की राजनीतिक ताकत प्रभावित नहीं होती.

महिला आरक्षण के लिए भी जरूरी नहीं विस्तार

महिला आरक्षण को भी परिसीमन से जोड़कर देखा जा रहा है और लोकसभा के विस्तार को मौजूदा राजनीतिक हितों को प्रभावित किए बिना महिलाओं के लिए जगह बनाने का माध्यम बताया जा रहा है. लेकिन महिला प्रतिनिधित्व को संसद का आकार बढ़ाने का संवैधानिक आधार नहीं बनाया जाना चाहिए.

543 सदस्यीय मौजूदा लोकसभा का एक-तिहाई लगभग 181 सीटें होती हैं. महिलाओं को उनके संवैधानिक रूप से तय प्रतिनिधित्व का अधिकार इसी मौजूदा संरचना के भीतर दिया जा सकता है. आरक्षण का उद्देश्य यह बदलना है कि संसद में कौन बैठेगा, न कि अनिवार्य रूप से सैकड़ों नई सीटें बनाना.

50 प्रतिशत विस्तार का एक विचित्र परिणाम यह हो सकता है कि महिला सांसदों की संख्या तो बढ़े, जो निश्चित रूप से सकारात्मक है, लेकिन बड़ी आबादी वाले राज्यों की संख्यात्मक राजनीतिक ताकत भी और बढ़ जाए. एक प्रतिनिधित्व असंतुलन को दूर करने वाला सुधार दूसरे संघीय असंतुलन को गहरा कर सकता है. महिला प्रतिनिधित्व और संघीय न्याय, दोनों वैध संवैधानिक उद्देश्य हैं. भारत को इनमें से किसी एक को चुनने की जरूरत नहीं है.

543 को बरकरार रखते हुए सुधार

समाधान स्पष्ट है: लोकसभा की सदस्य संख्या 543 ही रखी जाए. राज्यों के बीच सीटों का मौजूदा आवंटन बरकरार रहे. नई जनगणना के आधार पर राज्यों के भीतर परिसीमन किया जाए. इसी संरचना के भीतर महिला आरक्षण लागू हो. आबादी बढ़ने से प्रतिनिधियों तक पहुंच की जो समस्या पैदा हुई है, उसका समाधान विधानसभाओं का विस्तार कर किया जाए.

करीब आधी सदी तक राज्यों ने यह भरोसा रखते हुए जनसंख्या नीतियां लागू कीं कि जनसंख्या नियंत्रण में सफलता उनकी संसदीय ताकत कम नहीं करेगी. दक्षिणी राज्यों ने विशेष रूप से शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण में निवेश किया और प्रजनन दर को उस स्तर तक लाने में सफलता पाई, जिसे राष्ट्रीय नीति भी प्रोत्साहित करती रही है.

अब तेज जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों को अधिक राजनीतिक लाभ देना उस प्रोत्साहन व्यवस्था को उलट देगा, जिसे केंद्र ने खुद तैयार किया था.

सवाल यह नहीं है कि आबादी महत्वपूर्ण है या नहीं. निश्चित रूप से आबादी महत्वपूर्ण है. असली सवाल यह है कि क्या आबादी के आधार पर अब उस संघीय राजनीतिक संतुलन को यांत्रिक तरीके से बदल दिया जाए, जिसे भारत ने पांच दशकों तक जानबूझकर सुरक्षित रखा.

संसद पहले भी दो बार जनसंख्या में बदलाव के बावजूद राज्यों के बीच सीटों का आवंटन बनाए रखने के लिए संवैधानिक ढांचे में संशोधन कर चुकी है. ऐसा तीसरी बार करने से कोई संवैधानिक बाधा नहीं है.

परिसीमन जरूरी है. महिला प्रतिनिधित्व लंबे समय से लंबित है. निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को नई जनसंख्या और शहरी बदलावों के अनुसार अपडेट करना भी आवश्यक है. लेकिन इनमें से किसी भी उद्देश्य के लिए 800 से अधिक सदस्यों वाली लोकसभा की जरूरत नहीं है.

कई बार संवैधानिक समझदारी संस्थाओं को बड़ा करने में नहीं, बल्कि उस संतुलन को बनाए रखने में होती है जिसने उन्हें लंबे समय तक टिकाऊ बनाया है. 543 की संख्या ने भारत की लोकतांत्रिक और संघीय व्यवस्था को आधी सदी से अधिक समय तक संभाला है. इसलिए इसे 543 ही बनाए रखने के पक्ष में मजबूत संवैधानिक, संघीय और लोकतांत्रिक तर्क मौजूद है.

एस. वाई. कुरैशी भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त हैं और "एन अनडॉक्यूमेंटेड वंडर - द मेकिंग ऑफ द ग्रेट इंडियन इलेक्शन" के लेखक हैं. मूल लेख अंग्रजी में यहां पढ़ा जा सकता है.

Previous
Previous

बंगाल के मालदा मेडिकल कॉलेज में एक दिन में 10 नवजातों की मौत, तीन हफ्तों में 60 की जान गई

Next
Next

महाराष्ट्र में मवेशी ले जा रहे दलित व्यक्ति को ‘गौ रक्षकों’ ने जबरन गोबर खिलाया; अब तक कोई गिरफ्तारी नहीं