भारत में एक साल में 58 लाख नए छोटे कारोबार खुले, लेकिन रोज़ की कमाई 600 रुपये भी नहीं: रिपोर्ट

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय की वार्षिक असंगठित क्षेत्र उद्यम सर्वेक्षण 2025 रिपोर्ट के अनुसार भारत में छोटे और असंगठित कारोबारों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन इन कारोबारों से होने वाली आय बेहद कम बनी हुई है. ‘डाउन टू अर्थ’ की रिपोर्ट के मुताबिक देश में एक साल के भीतर लगभग 58 लाख नए छोटे कारोबार शुरू हुए, जबकि इनमें काम करने वाले लोगों की औसत दैनिक कमाई कई राज्यों के न्यूनतम वेतन से भी कम है.

रिपोर्ट के अनुसार 2025 तक देश में असंगठित गैर-कृषि क्षेत्र के कारोबारों की संख्या बढ़कर 7 करोड़ 92 लाख हो गई, जबकि 2023-24 में यह संख्या 7 करोड़ 34 लाख थी. यानी एक ही साल में लाखों लोगों ने छोटे व्यापार, घरेलू इकाइयों, मरम्मत कार्य, स्थानीय सेवाओं और स्वरोज़गार का सहारा लिया.

यह वृद्धि ऐसे समय में हुई है जब संगठित क्षेत्र में रोजगार की रफ्तार धीमी बनी हुई है. इसका मतलब है कि बड़ी संख्या में लोग रोज़गार के लिए छोटे और असुरक्षित कारोबारों पर निर्भर होते जा रहे हैं.

रिपोर्ट बताती है कि इस क्षेत्र में पिछले एक साल के दौरान लगभग 75 लाख नए रोजगार जुड़े. जनवरी से दिसंबर 2025 के बीच असंगठित गैर-कृषि क्षेत्र में कुल 12 करोड़ 81 लाख लोग कार्यरत थे. इनमें स्वरोज़गार करने वाले, वेतनभोगी कर्मचारी, पारिवारिक कामगार और अन्य श्रमिक शामिल हैं.

हालांकि कारोबार और रोजगार बढ़ने के बावजूद इनकी आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर बनी हुई है. रिपोर्ट के अनुसार प्रति प्रतिष्ठान औसत सकल मूल्य वर्धन केवल 2 लाख 50 हजार रुपये सालाना रहा. यानी एक इकाई की औसत कमाई लगभग 20 हजार 800 रुपये प्रति माह या करीब 685 रुपये प्रतिदिन बैठती है.

वहीं प्रति कामगार औसत सकल मूल्य वर्धन लगभग 1 लाख 60 हजार रुपये सालाना रहा, जो करीब 13 हजार 300 रुपये मासिक या 440 रुपये प्रतिदिन के बराबर है. विशेषज्ञों के मुताबिक यह वास्तविक आय भी नहीं है, क्योंकि इसमें किराया, बिजली, परिवहन और कच्चे माल जैसे खर्च शामिल होते हैं.

रिपोर्ट के अनुसार असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों की औसत मासिक आय केवल 12 हजार से 13 हजार रुपये के बीच है, जबकि कई राज्यों में न्यूनतम वेतन इससे अधिक है.

छोटे कारोबारियों पर कर्ज़ का बोझ भी लगातार बढ़ रहा है. रिपोर्ट के मुताबिक प्रति इकाई औसत बकाया ऋण लगभग 42 हजार 776 रुपये है. हालांकि लगभग 80 प्रतिशत ऋण बैंकों और संस्थागत स्रोतों से मिले, लेकिन ऋण की राशि इतनी कम है कि छोटे कारोबारी नई मशीनरी, तकनीक या कारोबार विस्तार में निवेश नहीं कर पा रहे.

डाउन टू अर्थ के अनुसार यह रिपोर्ट बताती है कि भारत में छोटे कारोबारों की संख्या बढ़ना आर्थिक गतिविधि का संकेत जरूर है, लेकिन असंगठित क्षेत्र अब भी कम आय, सीमित पूंजी और असुरक्षित रोजगार के दायरे में फंसा हुआ है.

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