जम्मू: गौ रक्षकों के हमले से बचने युवक नदी में कूदा, जान गई; डर के साये में जीने को मजबूर एक परिवार
जम्मू-कश्मीर पुलिस के विशेष अधिकारी (एसपीओ) अब्दुल सलाम के लिए 12 अप्रैल 2026 की सुबह सब कुछ बदल गई. उनके 18 वर्षीय इकलौते बेटे तनवीर का आखिरी फोन आया— "पापा, मैं आज घर आऊँगा." लेकिन वह कभी नहीं लौटा. 20 दिनों की लंबी तलाश के बाद चिनाब नदी की सहायक धारा, बिशलरी नाले से तनवीर का क्षत-विक्षत शव बरामद हुआ. ‘द पॉलिस प्रोजेक्ट’ में बशरत अमीन के अनुसार, यह केवल एक लापता युवक की कहानी नहीं है, बल्कि जम्मू क्षेत्र में कानून हाथ में लेकर की जाने वाली हिंसा के बढ़ते मामलों और नफरत की एक खौफनाक दास्तां है.
तनवीर एक टाटा मोबाइल वाहन से एक गाय और बछड़ा लेकर रामबन लौट रहा था. उसके पास जम्मू के उपायुक्त द्वारा जारी सभी वैध कागजात और पशु चिकित्सा प्रमाण पत्र थे. भारत के कड़े होते पशु परिवहन कानूनों के बीच, अल्पसंख्यक समुदाय के चालक अब सतर्कता बरतते हुए सभी दस्तावेज साथ रखते हैं. लेकिन 12 अप्रैल को ये दस्तावेज तनवीर के काम नहीं आए.
कथित गौ-रक्षकों ने वाहन को रोका, तनवीर और गाड़ी के मालिक के साथ मारपीट की और पत्थर बरसाए. जान बचाने के लिए तनवीर ने बिशलरी नाले में छलांग लगा दी, जहाँ पानी के तेज़ बहाव ने उसे अपनी चपेट में ले लिया. स्थानीय लोगों का आरोप है कि ये हमलावर अक्सर पशु परिवहन करने वाले ड्राइवरों से वसूली करते हैं और मना करने पर 'गुंडागर्दी' पर उतर आते हैं.
एक उजड़ता परिवार और खौफजदा समुदाय
तनवीर चार बहनों के बीच इकलौता भाई था. उसकी माँ नसीमा के लिए उसकी मृत्यु एक अपूरणीय क्षति है. वह कहती हैं, "मेरा बेटा राजनीति से अनभिज्ञ था, पूरा गाँव उसे पसंद करता था. अगर उसने कोई अपराध किया था, तो उसे जेल ले जाना चाहिए था, उसकी जान क्यों ली गई?"
यह घटना उखराल जैसे क्षेत्रों के लिए एक गहरा सदमा है, जहाँ हिंदू और मुस्लिम दशकों से शांतिपूर्वक रहते आए हैं. 65 वर्षीय हिंदू निवासी रतन लाल कहते हैं, "कुछ लोग व्यक्तिगत लाभ या दक्षिणपंथी विचारधारा के प्रभाव में आकर हिंदुओं की छवि खराब कर रहे हैं. 1947 के कठिन दौर में भी यहाँ सांप्रदायिक सद्भाव बना रहा था, जिसे अब नुकसान पहुँचाया जा रहा है. "
हिंसा का व्यापक स्वरूप और राजनीतिक प्रतिक्रिया
स्थानीय लोगों का दावा है कि गिरफ्तार किए गए चार आरोपी—सुरजीत सिंह, संदीप सिंह, दिग्विजय सिंह और केवल सिंह—बजरंग दल से जुड़े हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि यह हमला कोई छिटपुट घटना नहीं है, बल्कि एक व्यापक पैटर्न का हिस्सा है. 2014 के बाद से भारत में गौ-रक्षा के नाम पर होने वाली हिंसा में तेज़ी आई है. जम्मू-कश्मीर, जो पहले इस तरह की हिंसा से काफी हद तक बचा हुआ था, अब उधमपुर (2015), रियासी (2017) और भद्रवाह (2019) जैसी घटनाओं का गवाह बन रहा है.
राजनीतिक कार्यकर्ता सलमान निजामी ने इसे 'लिंचिंग' करार देते हुए सख्त कानूनों की माँग की है. मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी इस 'जंगल राज' की कड़ी निंदा की और स्पष्ट किया कि पशुधन के परिवहन पर कोई कानूनी रोक नहीं है. दूसरी ओर, भाजपा प्रवक्ता अल्ताफ ठाकुर ने भी घटना की निंदा करते हुए कहा कि कानून हाथ में लेने वालों के लिए कोई जगह नहीं है, हालांकि आलोचक इसे पार्टी की राष्ट्रीय नीतियों के विरोधाभास के रूप में देखते हैं.
कश्मीरियों का बाहरी राज्यों में उत्पीड़न
लेख यह भी रेखांकित करता है कि कश्मीर के बाहर भी कश्मीरी छात्र, शॉल विक्रेता और श्रमिक असुरक्षित हैं. 2025 में पहलगाम हमले के बाद से उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और अन्य राज्यों में कश्मीरियों के साथ बदसलूकी और मारपीट के लगभग 200 मामले सामने आए हैं. 2019 में अनुच्छेद 370 हटने के बाद रोजगार की तलाश में घाटी से बाहर जाने वाले युवाओं को अब 'घर' वापस जाने की धमकियाँ दी जा रही हैं.
बशरत के मुताबिक, तनवीर के परिवार को उसका शव तो मिल गया, लेकिन उनके सवालों के जवाब अब भी लापता हैं. यह घटना न केवल न्याय व्यवस्था और पुलिसिंग की प्रभावशीलता पर सवाल उठाती है, बल्कि उस सांप्रदायिक ताने-बाने को भी चुनौती देती है जिसने जम्मू-कश्मीर को दशकों तक जोड़े रखा था. जैसा कि नसीमा ने पूछा, "अन्याय हुआ है... उसे क्यों मारा गया?" यह सवाल आज पूरे प्रशासन और समाज के सामने खड़ा है. हफ्तों पहले गुस्से में पूछा गया उनका वह सवाल आज भी बिना किसी जवाब के खड़ा है: “अगर उसने कोई अपराध किया था, तो उसे जेल ले जाना चाहिए था. उसे मारा क्यों गया?”

