केन-बेतवा परियोजना के दाउधन बांध पर बड़ा सवाल, 60 करोड़ के चंदे से 3,389 करोड़ के ठेके तक

‘आर्टिकल 14’  के मुताबिक, मध्य प्रदेश के छतरपुर और पन्ना जिलों में केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना के तहत बन रहे दाउधन बांध को लेकर विस्थापन और पर्यावरण के सवालों के साथ अब ठेका प्रक्रिया भी विवाद के केंद्र में है. आंध्र प्रदेश की नागार्जुन कंस्ट्रक्शन कंपनी लिमिटेड को 3,389 करोड़ रुपये का बांध निर्माण ठेका मिला है. सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि कंपनी का बड़े बांधों के स्वतंत्र निर्माण का अनुभव सीमित बताया गया है और उसने 2019 से 2022 के बीच चुनावी बॉन्ड के जरिए केवल भारतीय जनता पार्टी को 60 करोड़ रुपये का चंदा दिया था. हालांकि, उपलब्ध सामग्री में चंदे और ठेके के बीच सीधे लेन-देन का प्रमाण स्थापित नहीं हुआ है.

केन-बेतवा परियोजना की कुल लागत 44,605 करोड़ रुपये है. केंद्र सरकार ने इसे 2021 में मंजूरी दी थी और दिसंबर 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका उद्घाटन किया था. सरकार के अनुसार, इसका उद्देश्य बुंदेलखंड के सूखे प्रभावित क्षेत्र में पानी पहुंचाकर सामाजिक और आर्थिक विकास को बढ़ावा देना है. परियोजना में केन नदी का पानी बेतवा नदी की ओर ले जाया जाएगा. लेकिन दाउधन बांध के निर्माण से पन्ना बाघ अभयारण्य प्रभावित होगा. अलग-अलग आकलनों के अनुसार दो से चार मिलियन से अधिक पेड़ डूब सकते हैं, 22 गांवों के हजारों लोग विस्थापित हो सकते हैं और 10 गांव पूरी तरह डूब सकते हैं. प्रभावित आदिवासी और अन्य ग्रामीण उचित पुनर्वास, महिलाओं को समान मुआवजा, जमीन के बाजार मूल्य का चार गुना मुआवजा और जंगल तथा नदी तक पहुंच के साथ पुनर्वास की मांग कर रहे हैं.

दाउधन बांध का ठेका और अनुभव का सवाल

दाउधन बांध की ऊंचाई 96.7 मीटर है. अगस्त 2023 में जारी निविदा में बोली लगाने वाली कंपनी के पास पिछले दस वर्षों में बड़े जल संसाधन या जलविद्युत निर्माण का कम से कम दो वर्ष का अनुभव और कम से कम 40 मीटर ऊंचे कंक्रीट बांध तथा 35 मीटर ऊंचे मिट्टी, पत्थर या मिश्रित बांध के निर्माण का अनुभव जरूरी था. उपलब्ध कंपनी विवरण और उद्योग रिपोर्टों में दाउधन से पहले नागार्जुन कंस्ट्रक्शन कंपनी का कोई स्वतंत्र रूप से निर्मित बड़ा बांध दर्ज नहीं है. उसका पहले का प्रमुख बांध संबंधी काम आंध्र प्रदेश की एक सिंचाई परियोजना था, वह भी संयुक्त उपक्रम में. दाउधन ठेके के बाद सितंबर 2025 में बिहार के बरनार जलाशय और बांध संरचनाओं का 2,090 करोड़ रुपये का ठेका भी उसे मिला.

टेंडर पहली बार अगस्त 2023 में जारी हुआ तो कोई बोली नहीं आई. समयसीमा दो बार बढ़ाई गई. बाद में छह कंपनियों ने बोली लगाई. मेघा इंजीनियर्स-रित्विक इंफ्रा को बांध निर्माण अनुभव की कमी के कारण अयोग्य घोषित किया गया और नागार्जुन कंस्ट्रक्शन कंपनी सबसे कम बोली लगाने वाली कंपनी बनी. जल शक्ति मंत्रालय और राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी ने यह सार्वजनिक नहीं किया कि बोलियों का मूल्यांकन किस तरह हुआ और इसी कंपनी का चयन क्यों किया गया. फरवरी 2023 में तकनीकी सलाहकार समिति ने अनुभव संबंधी शर्तों में बदलाव की सिफारिश की थी. मार्च 2023 की पूर्व निविदा बैठक में प्रमुख जल संसाधन कंपनियां बुलाई गईं, लेकिन नागार्जुन कंस्ट्रक्शन कंपनी उस बैठक में आमंत्रित नहीं थी.

भाजपा को 60 करोड़ का चंदा और उसके बाद ठेके

नागार्जुन कंस्ट्रक्शन कंपनी ने अक्टूबर 2019 में 20 करोड़ और अक्टूबर 2022 में 40 करोड़ रुपये के चुनावी बॉन्ड भारतीय जनता पार्टी को दिए. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार उसने किसी दूसरे राजनीतिक दल को चुनावी बॉन्ड के जरिए चंदा नहीं दिया. कंपनी ने 2018 और 2022 में आयकर विभाग की तलाशी का भी सामना किया था. उसका पहला 20 करोड़ रुपये का चंदा 2018 की तलाशी के एक वर्ष से अधिक समय बाद दिया गया, जबकि दूसरा चंदा 2022 की तलाशी के बाद दिया गया.

फरवरी 2024 में सर्वोच्च न्यायालय ने चुनावी बॉन्ड योजना को मतदाताओं के राजनीतिक दलों की वित्तीय जानकारी जानने के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन मानते हुए रद्द कर दिया. इसके बाद सार्वजनिक हुए आंकड़ों से नागार्जुन कंस्ट्रक्शन कंपनी का भारतीय जनता पार्टी को दिया गया चंदा सामने आया.

इसके बाद कंपनी को भाजपा शासित या उसके सहयोगी दलों वाली सरकारों से कई बड़े ठेके मिले. 2022 के अंतिम महीनों में गुजरात में 707.30 करोड़ रुपये की सिंचाई परियोजना और कर्नाटक में 334.31 करोड़ रुपये की पेयजल तथा 378.62 करोड़ रुपये की बिजली पारेषण परियोजनाएं मिलीं. 2023-24 में मुंबई में 6,300 करोड़ रुपये की सुरंग परियोजना और महाराष्ट्र में 8,398 करोड़ रुपये के स्मार्ट मीटर काम मिले. 2025 में आंध्र प्रदेश, बिहार, मुंबई, असम और अन्य क्षेत्रों में भी बड़े ठेके मिले. कंपनी की परियोजनाओं की कुल लंबित पुस्तिका 2019-20 के 26,572 करोड़ से बढ़कर 2025-26 में 83,004 करोड़ रुपये हो गई.मध्य प्रदेश विधानसभा में विपक्ष के नेता उमंग सिंघार ने 17 जुलाई 2026 को सवाल उठाया कि क्या भाजपा को दिए गए 60 करोड़ रुपये और दाउधन बांध के ठेके के बीच कोई संबंध है. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने भी कंपनी के भाजपा कार्यालय निर्माण से जुड़े काम का हवाला देते हुए भ्रष्टाचार और राजनीतिक संरक्षण के सवाल उठाए.

विशेषज्ञों ने भी उठाए सवाल

पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने कहा कि राजनीतिक चंदे और सरकारी ठेके के बीच संबंध सीधा नहीं माना जा सकता, लेकिन निविदा की शर्तों, प्रतिस्पर्धा और बोली के मूल्यांकन की पेशेवर जांच जरूरी है. यदि पक्षपात या अवैधता का प्रमाण मिलता है, तभी चंदे और ठेके के बीच लेन-देन का संबंध स्थापित हो सकता है. पूर्व आर्थिक मामलों के सचिव ईएएस शर्मा ने कंपनी के सीमित बांध निर्माण अनुभव को देखते हुए इतने बड़े ठेके पर आश्चर्य जताया और संभावित लेन-देन की न्यायिक जांच की मांग की. पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्लाह ने चुनावी चंदे की व्यवस्था में पारदर्शिता पर सवाल उठाए.

कंपनी के पुराने सरकारी काम भी विवादों से अछूते नहीं रहे. एम्स भोपाल के निर्माण में देरी और भुगतान विवाद हुआ. मध्य प्रदेश ने 2010 में कंपनी को कथित गलत जानकारी देने के आरोप में प्रतिबंधित किया था, जिसे 2016 में उच्च न्यायालय ने रद्द कर दिया. 2013 में आयकर विभाग की एक रिपोर्ट में तत्कालीन मध्य प्रदेश मंत्री नरोत्तम मिश्रा पर कंपनी से रिश्वत लेने के आरोप लगाए गए थे, लेकिन 2014 में आयकर अपीलीय अधिकरण ने इन आरोपों को अनुमान और संदेह पर आधारित माना और उनके पक्ष में फैसला दिया.

बांध के खिलाफ विरोध जारी

दाउधन परियोजना के खिलाफ स्थानीय विरोध भी जारी है. अप्रैल 2026 की पुलिस कार्रवाई के बाद ग्रामीण मई और जुलाई में बाराना नदी के किनारे फिर जुटे. 19 जुलाई को पुलिस ने तड़के प्रदर्शन स्थल हटाया और कई प्रदर्शनकारियों तथा नेताओं को हिरासत में लिया. ग्रामीणों ने प्रतीकात्मक चिताओं पर बैठकर "न्याय दो या मृत्यु" का नारा लगाया. उनकी मांग है कि विस्थापन की स्थिति में महिलाओं और बच्चों को समान अधिकारों के साथ पुनर्वास मिले और पूरे समुदाय को एक साथ बसाया जाए.

इसलिए दाउधन बांध का विवाद केवल एक निर्माण ठेके का मामला नहीं है. एक ओर सरकार इसे बुंदेलखंड के लिए पानी की बड़ी परियोजना के रूप में देखती है, तो दूसरी ओर आदिवासी विस्थापन, पन्ना बाघ अभयारण्य, पेड़ों की कटाई, पुनर्वास और ठेका प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल हैं. 60 करोड़ रुपये के राजनीतिक चंदे और 3,389 करोड़ रुपये के ठेके के बीच सीधे संबंध का प्रमाण अभी सामने नहीं आया है, लेकिन कंपनी के अनुभव, निविदा प्रक्रिया, चंदे और उसके बाद मिले बड़े सरकारी ठेकों का क्रम स्वतंत्र और पारदर्शी जांच की मांग को मजबूत करता है.

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