मई के मध्य तक, बंगाल एसआईआर अधिकरणों ने सिर्फ 6,000 अपीलों का निपटारा किया; इनमें 65% नाम सूची में वापस लौटे
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में दामिनी नाथ की रिपोर्ट है कि पश्चिम बंगाल चुनावों की तैयारियों के बीच सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बने 19 अपीलीय न्यायाधिकरणों में से 12 ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान न्यायिक अधिकारियों के निर्णयों के खिलाफ दायर 24.98 लाख अपीलों में से केवल 6,581 अपीलों का निपटारा किया—जो कि कुल अपीलों का मात्र 0.26% है.
आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, 14 मई तक राज्य के 23 जिलों में से 17 जिलों को कवर करने वाले इन 12 न्यायाधिकरणों ने 4,043 अपीलों को स्वीकार किया और 1,267 को खारिज कर दिया. इन अपीलों में उन नागरिकों द्वारा दायर याचिकाएं शामिल हैं जिनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए थे, और साथ ही चुनाव आयोग द्वारा उन अपीलों के खिलाफ दायर याचिकाएं भी शामिल हैं जिनमें न्यायिक अधिकारियों ने नाम जोड़ने का आदेश दिया था.
हालांकि आंकड़ों में शेष 1,271 अपीलों की स्थिति का उल्लेख नहीं है, लेकिन कोलकाता और दिल्ली में चुनाव आयोग के सूत्रों ने बताया कि इनमें से कुछ अपीलें उन लोगों द्वारा दायर की गई थीं जिन्हें चुनावों से पहले प्रकाशित पूरक सूचियों के माध्यम से मतदाता सूची में शामिल कर लिया गया था, जिसका मतलब था कि उनकी अपीलों पर किसी कार्रवाई की आवश्यकता नहीं थी.
कुल निपटाए गए मामलों में से 27% (यानी 1,777 अपीलें) कोलकाता उत्तर और कोलकाता दक्षिण जिलों से थीं, जिन्हें कलकत्ता उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश टी. एस. शिवगणनम के न्यायाधिकरण द्वारा देखा जा रहा था. न्यायमूर्ति शिवगणनम ने 7 मई को इस्तीफा दे दिया था और बाद में इसके लिए व्यक्तिगत कारणों का हवाला दिया था. इन दोनों जिलों में कुल 51,234 अपीलें अभी भी लंबित हैं.
सबसे अधिक अपीलों और नाम काटे जाने वाले दो जिलों—मुर्शिदाबाद और मालदा—में 14 मई तक केवल 100-100 से कुछ अधिक मामलों का ही निपटारा हो सका था. मुर्शिदाबाद में 6,29,392 अपीलों में से 112 का निपटारा हुआ; जबकि मालदा में 5,26,215 अपीलों में से केवल 185 का निपटारा हो सका. सभी 12 न्यायाधिकरणों में 98 अपीलकर्ता ऑनलाइन माध्यम से और 21 ऑफलाइन माध्यम से उपस्थित हुए.
कुल निपटाए गए मामलों की संख्या लगभग 10,000 हो चुकी है. आयोग ने अभी तक दायर और निपटाए गए कुल मामलों का आंकड़ा सार्वजनिक नहीं किया है. 13 अप्रैल को हुई एक सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लिया था कि पश्चिम बंगाल मतदाता सूची से नाम हटाने और जोड़ने के खिलाफ रिकॉर्ड 34 लाख अपीलें दायर की गई थीं.
चुनाव नजदीक आने के बावजूद, न्यायाधिकरणों के कामकाज शुरू करने की रफ्तार धीमी रही. अदालत द्वारा यह आदेश दिए जाने के बाद कि मतदान से 48 घंटे पहले तक न्यायाधिकरणों द्वारा स्वीकृत किए गए सभी नामों को मतदाता सूची में जोड़ा जाए, केवल 1,607 नाम ही बहाल हो सके. इसके कारण शेष 27.16 लाख हटाए गए मतदाता विधानसभा चुनावों में मतदान करने से वंचित रह गए.
चुनाव आयोग ने पिछले साल 24 जून को मतदाता सूचियों का एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण) कराने का निर्णय लिया था, जो कि पिछले दो दशकों की उस प्रथा से अलग था जिसमें हर साल और चुनावों से पहले मतदाता सूचियों का संक्षिप्त पुनरीक्षण किया जाता था. गहन पुनरीक्षण के तहत मतदाता सूचियों को नए सिरे से तैयार किया जाता है. चुनाव आयोग के एसआईआर के इस आदेश और अपनाई गई प्रक्रिया को, जिसमें मौजूदा मतदाताओं के दस्तावेजों का अभूतपूर्व सत्यापन शामिल है, सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है.

