कर्नाटक में 61 हजार मतदाताओं के नाम हटाने के लिए चुनाव अधिकारियों ने बिना कारण बताए आवेदन दिए: ‘द हिंदू’

कर्नाटक में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान चुनाव अधिकारियों ने 61,059 मतदाताओं के नाम हटाने के लिए फॉर्म-7 आवेदन दाखिल किए, लेकिन उनमें नाम हटाने का कोई कारण नहीं बताया गया. ‘द हिंदू’ की रिपोर्ट के अनुसार, अधिकारियों ने कहा कि ये फॉर्म सिस्टम द्वारा अपने आप तैयार किए गए थे और उन पर उनके डिजिटल हस्ताक्षर भी स्वतः जुड़ गए थे.

निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 के अनुसार, मतदाता का नाम हटाने के लिए दिया गया आवेदन यदि कारण नहीं बताता है, तो उसे खारिज किया जाना चाहिए. हालांकि, कर्नाटक में निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों और सहायक निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों ने बताया कि जब नोटिस की सुनवाई के दौरान कुछ मतदाताओं से संपर्क नहीं हो पाया, तो सिस्टम ने अपने आप फॉर्म-7 तैयार कर दिए. ये नोटिस मतदाता सूची में मैपिंग नहीं होने या नाम और पारिवारिक विवरण में ‘तार्किक विसंगतियां’ पाए जाने पर जारी किए गए थे. ऐसे मामलों में कुछ मतदाताओं को ‘अपात्र’ चिह्नित कर दिया गया.

चुनाव आयोग द्वारा बताई गई विसंगतियों में माता-पिता के नाम का मेल नहीं खाना, माता-पिता और बच्चों की उम्र में कम अंतर होना तथा माता-पिता के छह से अधिक बच्चे दर्ज होना शामिल था. अधिकारियों के अनुसार, उन्हें उन मतदाताओं के नाम हटाने के लिए आवेदन दाखिल करने का निर्देश दिया गया था, जो स्थायी रूप से दूसरी जगह चले गए हों, जिनकी दूसरी जगह भी प्रविष्टि हो, जो नाबालिग हों, जिनकी मृत्यु हो चुकी हो या जो भारतीय नागरिक न हों. लेकिन फॉर्म स्वतः तैयार होने के कारण नाम हटाने का विशिष्ट कारण खाली रह गया.

24 अगस्त को प्रकाशित कर्नाटक की मसौदा मतदाता सूची से एक करोड़ से अधिक नाम हटाए गए थे. ये नाम राज्य के कुल मतदाताओं का 19.4 प्रतिशत थे. इनमें सबसे अधिक नाम उन लोगों के थे, जिनके स्थायी रूप से दूसरी जगह चले जाने की जानकारी दर्ज थी. इसके बाद अनुपस्थित मतदाताओं के नाम थे. मतदाताओं को 24 अगस्त से 23 सितंबर तक दावे और आपत्तियां दर्ज कराने का अवसर दिया गया था. इन पर 22 अक्टूबर तक निर्णय होना था और अंतिम मतदाता सूची 27 अक्टूबर को प्रकाशित की जानी थी.

‘द हिंदू’ के मुताबिक, ज्यादातर फॉर्म-7 आवेदन दावे और आपत्तियां दर्ज कराने की अवधि समाप्त होने के बाद दाखिल किए गए. 24 सितंबर से 22 अक्टूबर के बीच 60 हजार से अधिक आवेदन भरे गए, जिनमें से 50 हजार से अधिक आवेदन अंतिम समयसीमा से एक सप्ताह से भी कम पहले दाखिल हुए. अखबार ने कई मतदाताओं के नाम और पहचान संख्या की जांच की और पाया कि उनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए थे. 23 सितंबर के बाद दर्ज की गई आपत्तियों के आधार पर भी कुछ नाम हटाए गए, जबकि समयसीमा के बाद मिले आवेदनों पर विशेष पुनरीक्षण के बाद पूरक सूची में विचार किया जाना था. यह स्पष्ट नहीं है कि इन मामलों में नोटिस या आदेश जारी किए गए थे या नहीं.

कम से कम 26 विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव अधिकारियों ने मतदाताओं या तीसरे पक्षों की तुलना में अधिक फॉर्म-7 आवेदन दाखिल किए. इनमें बृहत बेंगलुरु महानगर पालिका के दक्षिण जिले में सबसे अधिक आवेदन दर्ज किए गए.

जून 2025 में शुरू हुए विशेष गहन पुनरीक्षण पर वास्तविक मतदाताओं के मतदान अधिकार प्रभावित होने और चुनाव परिणामों पर असर पड़ने की आशंकाओं के बीच सवाल उठते रहे हैं. मई में सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रक्रिया की वैधता बरकरार रखी थी, लेकिन स्पष्ट किया था कि इससे चुनाव आयोग को किसी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता तय करने का अधिकार नहीं मिल जाता. इस बीच, मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं को लेकर 2 अक्टूबर से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ देश के विभिन्न हिस्सों में विरोध प्रदर्शन भी हुए हैं.

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