छात्रों के विरोध प्रदर्शनों, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर बढ़ते विवाद के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस तथा राहुल गांधी पर हमले तेज किए हैं. राजनीतिक विश्लेषक अरुण श्रीवास्तव का तर्क है कि राहुल गांधी को केवल भगवा विचारधारा की आलोचना करने के बजाय अपनी रणनीति में व्यापक बदलाव करना होगा. उन्हें भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के वैचारिक प्रभाव के साथ-साथ उनके मजबूत संगठनात्मक और सामाजिक आधार को भी चुनौती देनी होगी.
लेख में छात्र नेताओं अभिजीत दीप्ते, सौरभ दास, रैंक और नेहा बोरा से शांति बनाए रखने के लिए बांड भरवाने की कार्रवाई पर सवाल उठाए गए हैं. ऐसे बांड आम तौर पर उन परिस्थितियों में भरवाए जाते हैं, जब अधिकारियों को किसी व्यक्ति से शांति भंग होने या सार्वजनिक व्यवस्था बिगड़ने की आशंका के पर्याप्त आधार मिलते हैं. श्रीवास्तव का कहना है कि इन छात्र नेताओं का हिंसक प्रदर्शन या टकराव में शामिल होने का कोई पुराना रिकॉर्ड सामने नहीं आया है. इसलिए इस कार्रवाई को विरोध की आवाज दबाने और छात्रों को डराने की कोशिश के रूप में देखा जाना चाहिए.
मोदी ने राहुल गांधी को “परजीवी” कहकर विपक्ष की राजनीतिक विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए हैं. इस राजनीतिक टकराव के बीच मतदाता सूची से नाम हटने और मताधिकार से वंचित होने की आशंकाओं पर बहस जारी है. श्रीवास्तव के मुताबिक, सरकार इन सवालों का ठोस जवाब देने के बजाय राहुल गांधी की छवि को नुकसान पहुंचाने पर ध्यान दे रही है. उनका मानना है कि यदि सरकार विपक्ष की वोट चोरी संबंधी मांगों पर गंभीरता से विचार करती है, तो इससे राहुल गांधी के आरोपों को बल मिल सकता है और सरकार की राजनीतिक स्थिति पर सवाल उठ सकते हैं. हालांकि, वोट चोरी के आरोपों को प्रमाणित करने वाले स्वतंत्र साक्ष्य इस लेख में प्रस्तुत नहीं किए गए हैं.
राहुल गांधी और विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ ने अपने आंदोलन को लोकतंत्र बहाल करने की लड़ाई बताया है. राहुल गांधी का आरोप है कि सरकार लोकतांत्रिक संस्थाओं पर नियंत्रण कर रही है. उन्होंने मतदाता सूची से जुड़े सवालों का समाधान होने तक गिरफ्तारी का सामना करने की तैयारी भी जताई है. दिल्ली के रामलीला मैदान में 1 नवंबर को प्रस्तावित रैली विपक्ष के आगे के आंदोलन की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण हो सकती है.
राहुल गांधी की रणनीति में संस्थागत जवाबदेही और ठोस मुद्दों पर संघर्ष को प्रमुखता मिली है, लेकिन उन्हें इसे और व्यापक बनाना होगा. केवल वैचारिक भाषणों से भाजपा के मजबूत संगठनात्मक ढांचे का मुकाबला करना कठिन है. चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं पर सवाल उठाने के साथ-साथ प्रशासनिक जवाबदेही तथा पुलिस की भूमिका पर भी ठोस प्रमाणों के आधार पर अभियान चलाने की जरूरत है. सरकारी आदेशों को लागू करने वाले अधिकारियों की कानूनी जवाबदेही तय करने की बात भी इस रणनीति का हिस्सा हो सकती है.
युवाओं के बीच स्थायी राजनीतिक पहुंच बनाना भी अहम है. भारत जोड़ो यात्रा से बने जनसंपर्क को डिजिटल माध्यमों और जमीनी संगठन के जरिए लगातार सक्रिय रखना होगा, ताकि जेन जी और जेन अल्फा के साथ संवाद बना रहे. इसके अलावा राहुल गांधी को अन्य पिछड़ा वर्ग, दलितों और आदिवासी समुदायों से जुड़े मुद्दों पर स्पष्ट कार्यक्रम प्रस्तुत करने चाहिए. उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्य में आरक्षण, सामाजिक न्याय, रोजगार और आर्थिक असमानता पर ठोस वादे उनकी रणनीति का हिस्सा होने चाहिए. गरीबों, अल्पसंख्यकों और वंचित समुदायों की जरूरतों तथा आकांक्षाओं से जुड़ना भी जरूरी है.
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से नहीं हटाने का फैसला सरकार के लिए राजनीतिक चुनौती बन सकता है. एसआईआर के विरोध में बढ़ती भागीदारी चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर बहस को और व्यापक कर सकती है. अमित शाह ने आंदोलन को लेकर कांग्रेस पर नकारात्मक राजनीति करने का आरोप लगाया था और उसे आत्ममंथन करने की सलाह दी थी. इस बीच, मतदाता सूची और चुनाव आयोग से जुड़े सवाल विपक्षी अभियान के केंद्र में बने हुए हैं.
भाजपा भी विपक्ष की राजनीतिक सक्रियता का मुकाबला करने की तैयारी कर रही है. पार्टी ने 22 अक्टूबर से 5 नवंबर 2026 तक देशव्यापी जनसंपर्क अभियान शुरू किया है. श्रीवास्तव 1984 के सिख विरोधी दंगों का बार-बार उल्लेख किए जाने को भी राजनीतिक विमर्श में इतिहास के इस्तेमाल से जोड़ते हैं. कांग्रेस की 1 नवंबर की प्रस्तावित रैली में 1984 में सिखों की हत्याओं का मुद्दा उठाए जाने की संभावना है.
भाजपा का समर्थन केवल हिंदुत्व की विचारधारा पर आधारित नहीं है. सरकारी योजनाओं से लाभ पाने वाले लोगों का एक बड़ा वर्ग भी उसके समर्थन का हिस्सा है. आवास, स्वच्छता, अनाज और डिजिटल सेवाओं जैसी योजनाओं से लाभान्वित लोगों तक भाजपा का सीधा संपर्क है. इसलिए आरएसएस और भाजपा की वैचारिक आलोचना अपने आप उनके समर्थकों को विपक्ष की ओर नहीं ले जाएगी. इसके लिए स्थानीय स्तर पर मजबूत संगठन, क्षेत्रीय भाषाओं में संवाद और रोजमर्रा की समस्याओं से जुड़े कार्यक्रम जरूरी हैं.
राहुल गांधी की वैचारिक आलोचना का भाजपा के मध्यमवर्गीय और नव-मध्यमवर्गीय समर्थकों पर असर सीमित रहा है. हालांकि, विपक्षी एकजुटता और कुछ मतदाता समूहों तक पहुंच बनाने में इस रणनीति से लाभ भी हुआ है. आगे की चुनौती यह है कि वैचारिक विरोध को सामाजिक न्याय, रोजगार, कल्याणकारी योजनाओं और संस्थागत जवाबदेही से जुड़े ठोस कार्यक्रमों में बदला जाए. राहुल गांधी अपने राजनीतिक उद्देश्यों में कितने सफल होंगे, यह बदलते राजनीतिक समीकरणों, जनभावनाओं और भाजपा के संगठनात्मक प्रभाव पर निर्भर करेगा.
(अरुण श्रीवास्तव राजनीतिक विश्लेषक हैं. मूल लेख अंग्रेजी में ‘काउंटरकरंट्स’ में पढ़ा जा सकता है.)

