तमिलनाडु में डीएमके शासन के दौरान दलितों के खिलाफ अत्याचार में 67% की बढ़ोतरी
‘मकतूब मीडिया’ की रिपोर्ट के अनुसार, तमिलनाडु में 2019 से 2023 के बीच अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के खिलाफ अत्याचार के मामलों में 67 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. यह वृद्धि देश में सबसे अधिक बताई गई है, जिसने मध्य प्रदेश (55.3%) और ओडिशा (42.9%) जैसे राज्यों को भी पीछे छोड़ दिया है.
रिपोर्ट में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा गया है कि राज्य में दलितों के खिलाफ हिंसा के कई गंभीर स्वरूपों में तेज़ वृद्धि देखी गई. दलितों की हत्या के मामलों में 40.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जो 52 से बढ़कर 73 हो गई. वहीं गंभीर चोट के मामलों में 240 प्रतिशत और आपराधिक धमकी के मामलों में 584.8 प्रतिशत की भारी वृद्धि दर्ज की गई.
बलात्कार के मामलों में भी कुल 36.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई. हालांकि वयस्क दलित महिलाओं के बलात्कार मामलों में 14 प्रतिशत की गिरावट देखी गई, लेकिन दलित नाबालिग लड़कियों के मामलों में 73.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई. इसी तरह “शालीनता भंग करने के इरादे से हमला” के मामलों में 289.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई.
2023 में इन मामलों में दोषसिद्धि दर केवल 12.2 प्रतिशत रही, जबकि 87.8 प्रतिशत मामलों में आरोपी बरी हो गए. इसके अलावा, मामलों के लंबित रहने की दर 87.7 प्रतिशत बताई गई है. विशेष अदालतों की कमी को भी एक बड़ी समस्या बताया गया है, क्योंकि राज्य में केवल 20 विशेष अदालतें ही काम कर रही हैं.
कानून के अनुसार राज्य स्तरीय निगरानी समिति, जिसकी अध्यक्षता मुख्यमंत्री करते हैं, को साल में दो बार बैठक करनी होती है. लेकिन रिपोर्ट के अनुसार 2021 से 2023 के बीच यह समिति केवल एक बार ही प्रति वर्ष मिली और 2024 में इसकी कोई बैठक नहीं हुई.
तमिलनाडु में निवारक हिरासत के मामलों में दलितों का अनुपात असामान्य रूप से अधिक है. 2021 में राज्य में हिरासत में लिए गए लोगों में 37 प्रतिशत दलित थे, जो पूरे देश में ऐसे मामलों का 84.5 प्रतिशत हिस्सा था. 2023 तक यह आंकड़ा बढ़कर 42.2 प्रतिशत हो गया, जबकि राज्य में दलितों की आबादी लगभग 20 प्रतिशत है.
मकतूब मीडिया के अनुसार यह बढ़ोतरी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) लंबे समय से “सामाजिक न्याय” और जाति-विरोधी राजनीति की मुखर समर्थक पार्टी मानी जाती रही है. ऐसे में इन आंकड़ों ने राज्य की कानून-व्यवस्था और सामाजिक न्याय के दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
2026 के विधानसभा चुनाव में डीएमके को बड़ा झटका लगा, जबकि टीवीके सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है.

