कैथरीन वाइनर | सूचना के महासंकट में कैसे बचें?
गार्डियन अखबार की प्रधान संपादक कैथरीन वाइनर ने एक लंबे और गहरे लेख में यह सवाल उठाया है कि आज के दौर में जब झूठ और सच के बीच की दीवार गिर चुकी है, तो एक आम इंसान और एक जिम्मेदार मीडिया संस्था को क्या करना चाहिए। वे लिखती हैं -"हम एक समय नकली खबरों की बात करते थे, अब तो हकीकत खुद नकली लगने लगी है।" दिलचस्प बात यह है कि यह लेख लिखने में उन्हें खुद वर्षों लग गए — क्योंकि वे भी उसी ध्यानभंग और मानसिक थकान का शिकार थीं जिसके बारे में वे लिख रही थीं।
एक साथ कई संकट
वाइनर का कहना है कि दुनिया इस वक्त एक नहीं, कई आपस में जुड़े संकटों से गुजर रही है।
पर्यावरण के मोर्चे पर वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि धरती एक ऐसे मोड़ के करीब है जहाँ से वापसी मुमकिन नहीं होगी। लोकतंत्र की बात करें तो बीस साल में पहली बार दुनिया में तानाशाही सरकारें लोकतंत्रों से अधिक हो गई हैं। अमेरिका, हंगरी, तुर्की जैसे देशों में लोकतांत्रिक संस्थाओं को व्यवस्थित तरीके से कमजोर किया जा रहा है। आर्थिक असमानता इस कदर बढ़ चुकी है कि दुनिया के मात्र 60,000 लोगों के पास उतनी संपत्ति है जितनी पूरी दुनिया की आधी आबादी के पास। और इस सबके बीच अकेलापन एक महामारी की तरह फैल रहा है — खासकर युवाओं में, जिनके पास न किफायती घर है, न रोजगार का भरोसा।
डिजिटल दुनिया का जहर
इन सभी संकटों को और गहरा करने में डिजिटल तकनीक की बड़ी भूमिका है। वाइनर साफ कहती हैं कि सोशल मीडिया को इंसान की भलाई के लिए नहीं, बल्कि उसका ध्यान खींचने, गुस्सा भड़काने और मुनाफा कमाने के लिए बनाया गया है। एक तकनीक-आलोचक के हवाले से वे लिखती हैं कि आज का इंटरनेट दरअसल हमारे लिए नहीं, बल्कि हमसे खास तरह की प्रतिक्रियाएं निकलवाने के लिए बना है।
एआई से बनी नकली तस्वीरें और वीडियो अब इतने आम और इतने असली लगते हैं कि दिमाग सच और झूठ में फर्क करने में असमर्थ होता जा रहा है। अमेरिकी सरकार ने ईरान पर हमले के वीडियो में हॉलीवुड फिल्मों की क्लिप मिला दीं — और किसी को पता भी न चला। यह महज एक उदाहरण है। ऐसे में अकेलापन महसूस करने वाले लोग ऑनलाइन भीड़ में "दुश्मन" ढूंढते हैं और नफरत के सरल जवाबों में शरण लेते हैं।
पत्रकारिता पर हमला
सच को दबाने के तरीके भी बदल गए हैं। पिछले साल दुनिया भर में 129 पत्रकार मारे गए तीन दशकों में सबसे अधिक। इनमें अकेले गाजा में 54 फिलिस्तीनी पत्रकार थे। इसके अलावा सत्ता का नया हथियार यह है कि इतना झूठ फैलाओ कि सच ढूंढना ही नामुमकिन हो जाए। बड़े अखबारों के मालिक सत्ता के सामने झुक रहे हैं. वाशिंगटन पोस्ट का उदाहरण देते हुए वाइनर बताती हैं कि कैसे उसके मालिक जेफ बेजोस ने राष्ट्रपति चुनाव से पहले अखबार को कमला हैरिस का समर्थन करने से रोक दिया.
रास्ता क्या है?
वाइनर का मानना है कि इस संकट का जवाब निराशा में नहीं, जुड़ाव में है. निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से वित्त पोषित पत्रकारिता इस दौर में एक जरूरी सामाजिक ढाँचे की तरह काम कर सकती है। गार्डियन इसी मॉडल पर चलता है. जहाँ पाठक स्वेच्छा से योगदान देते हैं, और बदले में खबरें सबके लिए मुफ्त रहती हैं. डेढ़ करोड़ से अधिक लोग हर महीने इस अखबार को आर्थिक सहयोग देते हैं.
लेकिन असली बात सिर्फ पत्रकारिता नहीं है. वाइनर कहती हैं कि इस दौर में एक-दूसरे से जुड़े रहना, बातें करना, समुदाय बनाना, साझा हकीकत को थामे रहना . यही इंसान बने रहने का तरीका है। तथ्य जरूरी हैं, लेकिन अकेले काफी नहीं. उम्मीद और इंसानी रिश्ते उतने ही जरूरी हैं.
एक पंक्ति में सार: जब व्यवस्थाएं टूट रही हों, सच धुंधला हो रहा हो, और अकेलापन बढ़ रहा हो, तो एक-दूसरे का हाथ थामे रहना और सच की तलाश जारी रखना ही इस महासंकट से निकलने का रास्ता है.

