डिजिटल वित्तीय धोखाधड़ी के 72% पीड़ितों को नहीं मिला एक भी पैसा वापस, 27% ने शिकायत दर्ज कराने के लिए पुलिस को रिश्वत दी
‘मकतूब मीडिया’ में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, ‘स्टेटस ऑफ पुलिसिंग इन इंडिया रिपोर्ट 2026’ में पाया गया कि डिजिटल वित्तीय धोखाधड़ी के करीब चार में से तीन पीड़ितों को अपना खोया हुआ कोई भी पैसा वापस नहीं मिला. रिपोर्ट कॉमन कॉज और लोकनीति-सीएसडीएस ने जारी की है.
रिपोर्ट के अनुसार, जिन पीड़ितों की पुलिस शिकायत दर्ज हुई, उनमें 27% ने बताया कि उन्होंने रिश्वत दी थी. रिश्वत देने वाले पीड़ितों के पूरी रकम वापस पाने की संभावना उन लोगों की तुलना में तीन गुना अधिक थी, जिन्होंने रिश्वत नहीं दी. गरीब पीड़ितों में रिश्वत देने की संभावना अमीर पीड़ितों की तुलना में करीब चार गुना अधिक पाई गई.
रिपोर्ट इस श्रृंखला की सातवीं कड़ी है और साइबर अपराध के साथ पुलिस, बैंक और पीड़ितों की प्रतिक्रिया पर केंद्रित है. इसके निष्कर्ष 16 राज्यों के 8,306 लोगों के सर्वेक्षण और 37 पीड़ितों, विशेषज्ञों तथा अन्य संबंधित लोगों के साथ बातचीत पर आधारित हैं.
सर्वेक्षण में 13% लोगों ने बताया कि वे पिछले दो-तीन वर्षों में साइबर अपराध के शिकार हुए. इनमें आधे से अधिक मामले डिजिटल वित्तीय धोखाधड़ी से जुड़े थे. केवल 51% पीड़ितों ने पुलिस से शिकायत की, जबकि 11% ने शुरुआत में पुलिस से संपर्क किया लेकिन मामला आगे नहीं बढ़ाया. शिकायत करने वालों में 42% ने शिकायत दर्ज कराना मुश्किल बताया और करीब एक चौथाई पीड़ितों को कम से कम पांच बार थाने जाना पड़ा.
एक तिहाई से अधिक पीड़ितों ने अपने व्यक्तिगत संपर्कों का इस्तेमाल यह सुनिश्चित करने के लिए किया कि पुलिस उनके मामले पर कार्रवाई करे. ऐसे पीड़ितों के पूरी रकम वापस पाने की संभावना भी बिना संपर्क वालों की तुलना में तीन गुना अधिक थी.
बैंक से मदद मिलने में भी मुश्किल
डिजिटल वित्तीय धोखाधड़ी के 52% पीड़ितों ने अपने बैंक में अलग से शिकायत की और 63% ने 24 घंटे के भीतर बैंक को धोखाधड़ी की सूचना दे दी. इसके बावजूद 72% को कोई पैसा वापस नहीं मिला. 22% साइबर धोखाधड़ी पीड़ित बैंक की भूमिका से बहुत असंतुष्ट थे.
रिपोर्ट के साक्षात्कारों में पीड़ितों और विशेषज्ञों ने आरोप लगाया कि बैंक अक्सर रकम वापस कराने की जिम्मेदारी लेने से बचते हैं. कई मामलों में बैंकों ने पीड़ितों पर ही धोखाधड़ी में सहयोग करने का आरोप लगाया.
रिपोर्ट में साइबर अपराध से होने वाले मानसिक और सामाजिक नुकसान का भी उल्लेख है. पीड़ितों ने तनाव, आघात और अवसाद की बात कही. एक मामले में पीड़ित के गर्भपात और दूसरे मामले में नौकरी छोड़कर विदेश जाने का भी उल्लेख किया गया.
रिपोर्ट के अनुसार, 49% लोग रोजाना यूपीआई ऐप का इस्तेमाल करते हैं और नियमित यूपीआई उपयोगकर्ताओं में साइबर अपराध का अनुभव करने की संभावना अधिक थी. हालांकि, 29% लोगों का मानना था कि पुलिस वित्तीय साइबर अपराध से निपटने के लिए पूरी तरह सक्षम है, जबकि 44% ने पुलिस को कुछ हद तक सक्षम माना.
रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि साइबर अपराध के बाद शिकायत दर्ज कराने और पैसा वापस पाने की क्षमता केवल पुलिस और बैंक की कार्रवाई पर निर्भर नहीं करती, बल्कि पीड़ित के आर्थिक संसाधनों और व्यक्तिगत संपर्कों का भी प्रभाव पड़ सकता है.

