सुशासन पर सवालों के साये में पीएम मोदी का 76वां जन्मदिन, जबकि 2013 में खुद कहा था-“अपना जन्मदिन कभी नहीं मनाता”
वर्ष 2013 में प्रधानमंत्री बनने से ठीक पहले नरेंद्र मोदी ने कहा था कि वे कभी अपना जन्मदिन नहीं मनाते और इस दिन किसी से फोन या मुलाकात भी नहीं करते. 2014 में पद संभालने के बाद जब श्रीनगर विनाशकारी बाढ़ से जूझ रहा था, तब भी उन्होंने समर्थकों से जन्मदिन का जश्न मनाने के बजाय राहत कार्यों में जुटने की नम्र अपील की थी.
हालाँकि, 12 साल बाद अपने तीसरे कार्यकाल में 76 वर्ष के होने पर परिस्थितियाँ पूरी तरह बदली नजर आईं. 17 सितंबर को उनका जन्मदिन अभूतपूर्व देशव्यापी भव्यता के साथ मनाया गया. भाजपा ने उनके सार्वजनिक जीवन के 25 वर्षों और "सुशासन" को समर्पित एक महीने लंबे 'सेवा संकल्प अभियान' की शुरुआत की. लेकिन इस भव्य आयोजन के पीछे हालिया राजनीतिक व प्रशासनिक चुनौतियाँ छिपी नहीं रह सकीं.
श्रावस्ती दासगुप्ता की रिपोर्ट के मुताबिक, विज्ञापनों, पूजा-पाठ और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से इस बार पार्टी और सरकार का विलय सा प्रतीत हुआ. अखबारों के पहले पन्नों से लेकर जैकेट पेजों तक बधाई संदेशों की बाढ़ आ गई.
विज्ञापनों की होड़: महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे द्वारा दिए गए विज्ञापनों में मोदी को "36 देशों से सर्वोच्च सम्मान पाने वाले नेता" के रूप में चित्रित किया गया, जो देश के कई प्रमुख समाचार पत्रों के फ्रंट पेज पर छाया रहा.
देशव्यापी आयोजन: दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने विशेष पूजा का आयोजन किया, जबकि गृह मंत्री अमित शाह और गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने वडनगर में आरती की. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने काशी विश्वनाथ मंदिर में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान के साथ प्रार्थना की.
विवाद और दावों का दौर: पश्चिम बंगाल में भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी ने 17 सितंबर को 'अन्नपूर्णा दिवस' के रूप में मनाने की घोषणा की. हालाँकि, यह योजना पूर्ववर्ती टीएमसी सरकार की कल्याणकारी योजना का नाम बदलकर बनाई गई थी. बिहार के पटना मरीन ड्राइव पर 49 लाख से अधिक बाढ़ पीड़ितों की तबाही के बीच 'आशीर्वाद का दीया' कार्यक्रम हुआ, जबकि मध्य प्रदेश के बालाघाट में आदिवासी बच्चों की मौतों के साये के बीच उज्जैन में भव्य लाइट एंड साउंड शो आयोजित किया गया. छत्तीसगढ़ के रायपुर में 25 लाख दिए जलाकर विश्व रिकॉर्ड बनाने का दावा किया गया.
गुजरात से शाह ने 'वडनगर से वाराणसी' बाइक रैली को हरी झंडी दिखाई. एक महीने तक चलने वाले इन आयोजनों में भावनात्मक नुक्कड़ नाटक, महायज्ञ, इन्फ्लुएंसर्स के दौरों से लेकर करदाताओं के पैसे पर 1.25 लाख प्रतिनिधियों का सम्मेलन शामिल है.
शासन और सुशासन पर खड़े होते तीखे सवाल, प्रशासनिक और विधायी असफलताएँ
जन्मदिन का यह भव्य प्रदर्शन ऐसे समय में हुआ है जब सरकार पिछले 12 वर्षों के सबसे कठिन कूटनीतिक और राजनीतिक दौर से गुजर रही है.
प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में धांधली के खिलाफ युवाओं के उग्र आंदोलन के बाद हाल ही में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा. यह पहला मौका था जब जनआक्रोश के कारण न केवल मंत्री को हटाया गया, बल्कि सोशल मीडिया पर विफलता के चलते पार्टी की आईटी सेल की कमान भी बदलनी पड़ी. इसके अलावा, पांच महीने पहले सरकार का बहुचर्चित महिला आरक्षण से जुड़ा लोकसभा विस्तार संशोधन विधेयक संसद में खारिज हो गया—जो 12 वर्षों में उसकी पहली बड़ी विधायी हार थी.
जुलाई में प्रदर्शनकारियों पर पेलेट गन और अत्यधिक बल प्रयोग के मुद्दे पर विपक्ष के हंगामे के बीच प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह मानसून सत्र की बैठकों से दूर रहे. शाह, जिन्हें पीएम का स्वाभाविक उत्तराधिकारी माना जाता है, दिल्ली पुलिस की कार्रवाई पर विपक्ष के निशाने पर हैं.
आर्थिक व ढांचागत मोर्चे पर दबाव: उच्च जीडीपी वृद्धि दर के दावों के बीच आम जनता महंगाई और असमान विकास की मार झेल रही है. 2,000 रुपये से अधिक के डिजिटल (यूपीआई) लेनदेन पर अतिरिक्त शुल्क के कदम ने नाराजगी बढ़ाई है. दिल्ली के सत्य निकेतन जैसी घटनाओं से बुनियादी ढाँचे की जर्जर हालत उजागर हुई है, वहीं विपक्ष 'स्कूल ठीक करो' अभियानों के ज़रिए सरकारी शिक्षा प्रणाली की कमियों को उजागर कर रहा है. अंतर्राष्ट्रीय मोर्चे पर, अमेरिकी सरकार द्वारा भारतीय वस्तुओं पर 100% तक टैरिफ लगाने का दबाव भी एक नई चुनौती बना हुआ है.
उत्तराधिकार और युवाओं की नाराजगी: भाजपा के भीतर 75 वर्ष की उम्र से जुड़े अलिखित नियम (जो लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी पर लागू हुआ था) को लेकर भी आंतरिक सवाल तैर रहे हैं. आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले युवाओं का आक्रोश पार्टी के लिए चिंता का विषय है. हालाँकि पीएम मोदी इंस्टाग्राम रील्स और भाषणों के जरिए युवाओं से जुड़ने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन नीतिगत और प्रशासनिक सवाल उनके सामने मजबूती से खड़े हैं.
इसमें कोई दो राय नहीं कि भारतीय राजनीति में भाजपा और नरेंद्र मोदी का वर्चस्व आज भी शीर्ष पर बना हुआ है. लेकिन 76वें वर्ष में प्रवेश करते हुए, भव्य आयोजनों और विज्ञापनों की चमक के पीछे प्रशासनिक विफलताओं, युवा असंतोष और कूटनीतिक दबावों के वे गंभीर सवाल भी छिपे हैं जो आने वाले समय में उनके शासनकाल की दिशा तय करेंगे.

