क्या ब्रिक्स शिखर सम्मेलन भारतीय विदेश नीति के लिए एक बदलाव का संकेत है?
एकतरफा पश्चिमी प्रतिबंधों के खिलाफ मजबूत विरोध; नागरिकों की हत्या, लेबनान पर हमलों और फिलिस्तीनी क्षेत्र पर जबरन कब्जे को लेकर इजराइल की आलोचना; तथा संयुक्त राष्ट्र सुधारों के साथ-साथ एक ब्रिक्स भुगतान प्रणाली के समर्थन के साथ, 2026 के नई दिल्ली घोषणापत्र की तुलना भारत के गुटनिरपेक्ष अतीत की विदेश नीति से की गई है. लेकिन क्या यह सर्वसम्मति बनाने के लिए नई दिल्ली द्वारा किया गया एक समझौता था, या इस बयान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ईरान, रूस और चीन के नेताओं के साथ घनिष्ठ वार्ता का भारत की विदेश नीति पर कोई प्रभाव पड़ेगा? इस प्रश्न पर ‘द हिंदू’ के लिए सुहासिनी हैदर द्वारा संचालित एक बातचीत में अजय बिसारिया और हैप्पीमोन जैकब चर्चा कर रहे हैं. प्रस्तुत है इस चर्चा का हिंदी में अनूदित सारांश:
गुटनिरपेक्षता से बहुध्रुवीयता की ओर: यह घोषणापत्र भारत की पुरानी गुटनिरपेक्ष नीति की ओर वापसी नहीं है, बल्कि एक बहुध्रुवीय विश्व में खुद को एक प्रमुख शक्ति-केंद्र के रूप में स्थापित करने का प्रयास है. गुटनिरपेक्षता द्विध्रुवीय दौर में कमजोर राष्ट्रों की रक्षात्मक रणनीति थी, जबकि वर्तमान में भारत 'मल्टी-अलाइनमेंट' के जरिए गैर-पश्चिमी और पश्चिमी दोनों मंचों पर आत्मविश्वास से अपनी जगह बना रहा है.
प्रतीकात्मकता बनाम वास्तविक नीति: बहुपक्षीय मंचों पर वैश्विक नेताओं (जैसे मोदी, शी जिनपिंग, पुतिन) की मुलाकातें और घोषणापत्र की कठोर भाषा अक्सर प्रतीकात्मक (आप्टिक्स) होती हैं. "एकतरफा दंडात्मक उपायों" (अमेरिकी प्रतिबंधों) की आलोचना या इजराइल-फिलिस्तीन पर संयुक्त राष्ट्र की भाषा का प्रयोग वैश्विक संतुलन साधने और आम सहमति बनाने का एक कूटनीतिक तरीका है, जो भारत के द्विपक्षीय संबंधों के वास्तविक क्रियान्वयन को सीधे प्रभावित नहीं करता.
कठिन कूटनीतिक समझौते: यूक्रेन युद्ध के संदर्भ को हटाना आम सहमति बनाने के लिए किया गया एक समझौता और रूसी वीटो का नतीजा था, जो बहुपक्षीय कूटनीति की सीमाओं को दर्शाता है. वहीं दूसरी ओर, इजराइल पर सख्त बहुपक्षीय भाषा के बावजूद भारत के व्यावहारिक संबंध संतुलन और रणनीतिक गहराई पर ही आधारित हैं.
आर्थिक स्वायत्तता और चीन की चुनौती: ब्रिक्स के तहत स्थानीय मुद्राओं में व्यापार का समर्थन सराहनीय है, लेकिन भारत किसी ऐसी डी-डॉलराइजेशन या भुगतान प्रणाली से सतर्क है जो चीनी युआन का वर्चस्व स्थापित करे. भारत का लक्ष्य पूर्व और पश्चिम तथा 'ग्लोबल साउथ' के बीच एक मजबूत पुल बनना है.
रणनीतिक प्राथमिकताएं और भविष्य की राह: वैश्विक परिदृश्य में अमेरिका (ट्रम्प कारक) एक गतिवर्धक का काम कर रहा है, लेकिन भारत के लिए मुख्य भू-राजनीतिक चुनौती चीन है. दक्षिण एशियाई पड़ोसियों को क्षेत्रीय मंचों पर एकजुट रखना भारत के लिए बेहद आवश्यक है.
अंतिम निष्कर्ष: ब्रिक्स का नई दिल्ली घोषणापत्र भारत के कूटनीतिक कौशल और बहु-दिशात्मक जुड़ाव को दर्शाता है. यह दर्शाता है कि भारत बिना किसी एक गुट में बंधे, पश्चिमी देशों (जैसे G7, यूरोपीय संघ, अमेरिका) और गैर-पश्चिमी समूहों दोनों के साथ एक साथ अपने हित साध सकता है. हालाँकि, भविष्य की वैश्विक व्यवस्था केवल ब्रिक्स जैसे राजनीतिक मंचों तक सीमित नहीं रहेगी; भारत को एआई, अंतरिक्ष प्रशासन और भविष्य की तकनीकों के वैश्विक नियम तय करने वाले मंचों पर अपनी सीमित कूटनीतिक पूंजी को विवेकपूर्ण ढंग से केंद्रित करना होगा.
(अजय बिसारिया ने पाकिस्तान और कनाडा में उच्चायुक्त के रूप में कार्य किया है. हैप्पीमोन जैकब 'इंडिया आफ्टर नॉन-अलाइनमेंट' के लेखक हैं.)

