यूपी में एसआईआर के दौरान मतदाताओं के नाम हटाने के लिए बिना कारण 85,854 फॉर्म तैयार किए गए

‘द रिपोर्टर्स कलेक्टिव’ की जांच के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान चुनाव आयोग के सॉफ्टवेयर ने 85,854 मतदाताओं के नाम हटाने के लिए ऐसे फॉर्म तैयार किए, जिनमें विलोपन का कोई कारण दर्ज नहीं था. रिपोर्ट के अनुसार, इन फॉर्मों पर चुनाव अधिकारियों के डिजिटल हस्ताक्षर भी थे. जबकि नियमों के तहत मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए स्पष्ट कारण दर्ज करना और संबंधित व्यक्ति को इसकी जानकारी देना जरूरी है.

उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों के विश्लेषण में सामने आया कि दावे और आपत्तियों की अवधि के दौरान मतदाताओं के नाम हटाने के लिए 4.3 लाख से अधिक फॉर्म-7 जमा किए गए. इनमें से लगभग 20 प्रतिशत आवेदन निर्वाचन आयोग के अपने विधानसभा स्तरीय अधिकारियों की ओर से प्रस्तुत किए गए थे. रिपोर्ट के अनुसार, अधिकारियों ने ये फॉर्म स्वयं नहीं भरे थे, बल्कि आयोग के ईआरओनेट सॉफ्टवेयर ने सुनवाई के दौरान मतदाताओं के नाम हटाए जाने पर इन्हें स्वतः तैयार किया था.

जांच में पाया गया कि निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों (ईआरओ) और सहायक निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों (एईआरओ) की ओर से जमा किए गए 87,127 आवेदनों में से 85,854, यानी करीब 98.5 प्रतिशत में नाम हटाने का कोई स्पष्ट कारण दर्ज नहीं था. 62 फॉर्मों में केवल ‘ए’, ‘एन’, ‘एच’ और ‘ई’ जैसे अक्षर कारण के रूप में लिखे गए थे, जबकि 1,211 फॉर्मों में ‘अनुपस्थित/स्थानांतरित’ का उल्लेख था. ये सभी 87,127 आवेदन 15 मार्च से 2 अप्रैल 2026 के बीच जमा किए गए.

नियमों के विपरीत प्रक्रिया का आरोप

नियमों के अनुसार, फॉर्म-7 के जरिए किसी मतदाता का नाम हटाने की आपत्ति दर्ज करते समय कारण बताना अनिवार्य है. निर्धारित कारणों में मतदाता की मृत्यु, निर्धारित आयु से कम होना, अनुपस्थित या स्थायी रूप से स्थानांतरित होना, किसी अन्य स्थान पर पहले से नाम दर्ज होना और भारतीय नागरिक न होना शामिल हैं.

‘द रिपोर्टर्स कलेक्टिव’ ने विधानसभा स्तर पर चार निर्वाचन अधिकारियों से बातचीत की. अधिकारियों ने बताया कि एसआईआर की सुनवाई के दौरान जब किसी मतदाता का सत्यापन स्वीकार नहीं किया जाता था, तो सॉफ्टवेयर स्वतः फॉर्म-7 तैयार कर देता था. एक अधिकारी ने कहा कि आवेदन उनके डिजिटल हस्ताक्षर के साथ तैयार होना तय था, क्योंकि संबंधित प्रक्रिया उनके आधिकारिक लॉगिन से संचालित होती थी.

रिपोर्ट के मुताबिक, यह प्रक्रिया मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के प्रावधानों से टकराती है. नियमों के अनुसार, निर्धारित प्रक्रिया का पालन न करने और स्पष्ट कारण नहीं देने वाली आपत्तियों को अस्वीकार किया जाना चाहिए. जांच में यह भी सामने आया कि चुनाव अधिकारियों को सुनवाई के बाद नाम हटाने का कारण दर्ज करना था, लेकिन सॉफ्टवेयर में बदलाव के कारण वे हजारों विलोपन आवेदनों पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य हो गए.

समयसीमा के बाद भी जमा हुए आवेदन

जांच में यह भी पाया गया कि व्यक्तिगत आवेदकों की ओर से नाम हटाने के लिए दिए गए 1,10,476 आवेदन कानूनी समयसीमा समाप्त होने के बाद जमा किए गए और चुनाव आयोग ने उन्हें स्वीकार किया. रिपोर्ट के अनुसार, मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए आवेदन निर्धारित अवधि में ही जमा किए जाने चाहिए.

उत्तर प्रदेश में एसआईआर की शुरुआत नवंबर 2025 में हुई थी. उस समय राज्य की मतदाता सूची में दर्ज 15.44 करोड़ मतदाताओं में से 2.89 करोड़ नाम अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या दोहरी प्रविष्टि वाली श्रेणियों में रखे गए थे. छह जनवरी 2026 को प्रारूप मतदाता सूची प्रकाशित हुई. इसके बाद 3.26 करोड़ मतदाताओं को तार्किक विसंगतियों या रिकॉर्ड से मिलान नहीं होने के कारण संदेह के दायरे में रखा गया और उनकी सुनवाई की गई.

दस अप्रैल 2026 को प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची में करीब 13.4 करोड़ मतदाता दर्ज थे. हालांकि, उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा ने अंतिम सूची जारी करते समय सुनवाई के दौरान हटाए गए नामों की अलग संख्या नहीं बताई थी.

मुस्लिम मतदाताओं को निशाना बनाने के आरोप

जांच में उत्तर प्रदेश की तरबगंज और पीलीभीत विधानसभा सीटों पर भी एक असामान्य पैटर्न सामने आया. रिपोर्ट के मुताबिक, इन दोनों क्षेत्रों में नाम हटाने के लिए दर्ज आपत्तियों में लगभग 90 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं के खिलाफ थीं. तरबगंज में ‘रेशमा’ नाम से 188 आपत्तियां दर्ज की गईं. ये सभी एक ही दिन और एक ही मतदान केंद्र के मतदाताओं के खिलाफ थीं.

हालांकि, चुनाव आयोग के उपलब्ध आंकड़ों में नाम हटाने का प्रस्ताव देने वाले लोगों की पहचान से जुड़ी विस्तृत जानकारी नहीं थी. इससे इन आवेदनों को स्वतंत्र रूप से सत्यापित करना मुश्किल हो गया.

‘द रिपोर्टर्स कलेक्टिव’ ने उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा और दिल्ली स्थित चुनाव आयोग से सवाल पूछे, लेकिन रिपोर्ट प्रकाशित होने तक उनका जवाब नहीं मिला था.

जांच ने एसआईआर की प्रक्रिया में सॉफ्टवेयर की भूमिका, अधिकारियों की जवाबदेही और मतदाताओं को नाम हटाने का कारण बताने के कानूनी अधिकार पर गंभीर सवाल उठाए हैं.

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