पश्चिम बंगाल में रिकॉर्ड मतदान: 92% वोटिंग के पीछे क्या है असली कहानी?
टॉकिंग न्यूज़ विद निधीश के लाइव शो में पत्रकार राजेश चतुर्वेदी से पश्चिम बंगाल में रिकॉर्ड तोड़ मतदान पर बातचीत की गई. पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव के पहले चरण में करीब 91.7% से 92.6% तक मतदान दर्ज किया गया है, जो पिछले चुनाव (2021) के लगभग 82% मतदान से काफी ज्यादा है. इस बढ़ोतरी को लेकर चर्चा तेज है, लेकिन इसके पीछे कई अहम कारण भी सामने आ रहे हैं. चर्चा में यह बात सामने आई कि मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटाए गए हैं. केवल पहले चरण की 152 सीटों पर ही करीब 50 से 52 लाख नाम हटाए गए, जबकि पूरे राज्य में यह संख्या लगभग 11-12% मतदाताओं तक पहुंचती है. ऐसे में कुल मतदाताओं की संख्या कम होने से मतदान प्रतिशत अपने आप बढ़ा हुआ दिखाई देता है.
इसके अलावा, एसआईआर प्रक्रिया के चलते लाखों लोग अपने नाम कटने के डर से वोट डालने के लिए ज़्यादा संख्या में निकले. कई मामलों में लोग इस चिंता में भी वोट देने पहुंचे कि अगर वे मतदान नहीं कर पाए तो उनके अन्य अधिकारों, जैसे नागरिकता या पहचान पर भी सवाल उठ सकते हैं. इस बीच, सुप्रीम कोर्ट में लाखों अपील लंबित हैं. करीब 34-35 लाख मामलों पर अभी फैसला नहीं हुआ है, जबकि अब तक सिर्फ 139 मामलों का ही निपटारा हुआ है. कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को ट्रिब्यूनल जाने को कहा है, लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि चुनाव खत्म होने के बाद इन अपीलों का क्या मतलब रह जाएगा.
राजनीतिक स्तर पर भी माहौल गरम है. एक तरफ प्रधानमंत्री ने इसे “बदलाव की लहर” बताया है, वहीं विपक्ष का आरोप है कि चुनाव आयोग निष्पक्ष नहीं है और केंद्र सरकार का प्रभाव साफ दिख रहा है. दूसरी ओर, यह भी कहा जा रहा है कि इतनी बड़ी वोटिंग को सिर्फ “बेहतर व्यवस्था” का नतीजा मानना सही नहीं होगा. विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम बंगाल में पहले भी हर चुनाव में मतदान प्रतिशत बढ़ता रहा है, इसलिए इसे केवल इस बार की व्यवस्था से जोड़ना गलत निष्कर्ष हो सकता है. अब सभी की नजर दूसरे चरण की 142 सीटों और 4 मई को आने वाले नतीजों पर टिकी है, जो यह तय करेंगे कि यह चुनाव किस दिशा में जाएगा.

