तेल की कीमतों में उछाल के झटके से रुपये में नौ हफ्तों की सबसे बड़ी गिरावट, 96.28/ प्रति डॉलर

कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और मर्चेंट डॉलर की मजबूत मांग के कारण भारतीय रुपये के भविष्य को लेकर चिंताएं एक बार फिर बढ़ गई हैं. इसके चलते शुक्रवार को सुस्त कारोबार के साथ समाप्त हुए सप्ताह में रुपये ने मई के बाद से अपनी सबसे बड़ी साप्ताहिक गिरावट दर्ज की.

‘रॉयटर्स’ में जसप्रीत कालरा की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी और ईरानी सेना के बीच बढ़ते संघर्ष के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य से ऊर्जा आपूर्ति एक बार फिर बाधित हो गई है. इसके चलते ब्रेंट क्रूड ऑयल (कच्चे तेल) की कीमतों में 13% की भारी तेजी आई, जिसने रुपये को तगड़ा झटका दिया. रुपया साप्ताहिक आधार पर लगभग 1% गिरकर 96.28 प्रति डॉलर पर बंद हुआ.

आखिरी बार देखे जाने तक ब्रेंट क्रूड की कीमतें दिन के दौरान लगभग 2% बढ़कर 85.7 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रही थीं.

डीलरों का कहना है कि मर्चेंट डॉलर की मांग मजबूत बनी रहने के बावजूद, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों द्वारा की गई डॉलर की बिकवाली (जो संभवतः भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से की गई थी) ने रुपये को पिछले चार दिनों से जारी गिरावट के सिलसिले को रोकने में मदद की.

एक विदेशी बैंक के फॉरेक्स सेल्सपर्सन ने कहा, "निर्यातकों ने रुपये में और कमजोरी की आशंका को देखते हुए एक बार फिर खुद को बाजार से पीछे खींच लिया है. वहीं आयातक डॉलर/रुपये की विनिमय दर में आने वाली किसी भी गिरावट का फायदा उठाने से नहीं चूकना चाहते."

'स्टेट स्ट्रीट इन्वेस्टमेंट मैनेजमेंट' में एशिया-प्रशांत (एपीएसी) अर्थशास्त्री कृष्णा भीमवरापु ने कहा, "यदि रुपये पर गिरावट का दबाव बना रहता है, तो आरबीआई खुद को एक बेहद मुश्किल स्थिति में पा सकता है, जहां उसे एक तरफ हाजिर बाजार के संचालन को संतुलित करना होगा और दूसरी तरफ अपने फॉरवर्ड-डॉलर बुक का प्रबंधन करना होगा." मई में केंद्रीय बैंक की शुद्ध फॉरवर्ड डॉलर देनदारियां 106.6 अरब डॉलर थीं.

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