राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड एक रबर स्टैंप: भारत के वन्यजीव प्रहरी को आज़ादी की आवश्यकता क्यों है

राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (एनबीडब्ल्यूएल) की परिकल्पना वर्ष 2003 में वन्यजीव संरक्षण और जंगलों की सुरक्षा के लिए भारत के शीर्ष वैधानिक निकाय के रूप में की गई थी. हालाँकि, आज ऐसा प्रतीत होता है कि यह एक स्वतंत्र पर्यावरण प्रहरी के रूप में काम करने के बजाय विकास परियोजनाओं को मंज़ूरी देने वाले एक कुशल और सुगम तंत्र के रूप में अधिक काम कर रहा है.

‘द टेलीग्राफ’ ने अपनी संपादकीय में लिखा है कि वन्यजीव मंज़ूरी की आवश्यकता वाली परियोजनाओं के मूल्यांकन का जिम्मा संभालने वाली एनबीडब्ल्यूएल की स्थायी समिति ने पिछले दशक में संरक्षित वन भूमि पर जाँचे गए औद्योगिक और बुनियादी ढांचा (इन्फ्रास्ट्रक्चर) प्रस्तावों में से 96.5% को मंज़ूरी दे दी. इसकी बैठकों के मिनट्स (कार्यवृत्त) से पता चलता है कि 2016 से हुई 52 चर्चाओं में समिति ने 2,448 विकास प्रस्तावों पर विचार किया. इनमें से 572 को स्थगित कर दिया गया, जबकि 1,876 पर निर्णय लिया गया; जिनमें से 1,810 को मंज़ूरी दी गई और केवल 66 प्रस्तावों को खारिज किया गया.

साल 2018, 2021 और 2026 की पहली बैठक में समिति के समक्ष रखे गए हर एक प्रस्ताव को हरी झंडी दे दी गई. यहाँ तक कि 2020 में भी, जब इसकी मंज़ूरी की दर अपने सबसे निचले स्तर पर थी, समिति ने जाँचे गए 92 प्रोजेक्ट्स में से 82 को मंज़ूरी दी थी.

पिछले सप्ताह 10 पर्यावरणविदों और कार्यकर्ताओं द्वारा दिल्ली उच्च न्यायालय में दायर एक याचिका में स्थायी समिति और एनबीडब्ल्यूएल की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए गए हैं, जिसमें मंज़ूरी देने की प्रक्रिया में "बिना सोचे-समझे काम करने" का आरोप लगाया गया है. यह याचिका स्थायी समिति की कार्यवाहियों में दर्ज असहमति की अनुपस्थिति और महत्वपूर्ण निर्णयों पर मतदान न होने की ओर भी इशारा करती है.  इसका एक कारण समिति की संरचना में छिपा हो सकता है. केंद्रीय पर्यावरण मंत्री की अध्यक्षता वाली इस समिति में वर्तमान मंत्रियों और सरकारी अधिकारियों का भारी वर्चस्व है. जब सरकारी समर्थन वाली परियोजनाओं की जाँच करने वाले निकाय में खुद मुख्य रूप से सरकार के प्रतिनिधि ही भरे हों, तो स्वतंत्र निगरानी की गुंजाइश अनिवार्य रूप से कम हो जाती है.

इसके परिणाम स्वीकृत की जा रही परियोजनाओं की प्रकृति में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं. सड़कें, रेलवे लाइनें, खनन परियोजनाएं, ट्रांसमिशन कॉरिडोर और पर्यटन से जुड़े बुनियादी ढांचे तेजी से संरक्षित क्षेत्रों, पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्रों और वन्यजीव गलियारों में अपनी जगह बना रहे हैं. निकोबार द्वीप समूह पर मेगापोड और गैलाथिया बे अभयारण्यों को डिनोटिफाई (अभयारण्य का दर्जा हटाने) करने का निर्णय इसका एक ज्वलंत उदाहरण है, जो कि 92,000 करोड़ रुपये की विकास परियोजना का मार्ग प्रशस्त करने के लिए किया गया है—इसके कारण 7 लाख से अधिक पेड़ काटे जाएंगे.

विकास और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी नहीं होने चाहिए.  आर्थिक विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सड़कें, रेलवे, ट्रांसमिशन लाइनें और रणनीतिक बुनियादी ढांचे अपरिहार्य हैं. लेकिन एनबीडब्ल्यूएल का अस्तित्व ठीक इसी बात का आकलन करने के लिए है कि क्या ऐसी परियोजनाएं पारिस्थितिक अखंडता से समझौता किए बिना आगे बढ़ सकती हैं. यदि लगभग हर प्रस्ताव इस परीक्षा को पार कर लेता है, तो खुद इस परीक्षा की विश्वसनीयता पर ही सवाल खड़े हो जाते हैं. भारत ऐसा नियामक ढांचा बर्दाश्त नहीं कर सकता जो नाजुक पारिस्थितिकी वाले क्षेत्रों में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को जल्दबाज़ी में मंज़ूरी देने की गति को ही 'कार्यकुशलता' मान ले.

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