मध्य प्रदेश के कान्हा टाइगर रिजर्व में बाघिन और उसके चार शावकों की मौत, कुत्तों से फैलने वाले वायरस पर संदेह 

मध्य प्रदेश के कान्हा टाइगर रिजर्व (केटीआर) में पिछले दो हफ्तों के भीतर एक बाघिन और उसके चार शावकों की मौत हो गई है. बाघिन और एक शावक ने बुधवार (29 अप्रैल, 2026) को दम तोड़ा. इस साल (2026) अब तक राज्य में कुल 27 बाघों की मृत्यु हो चुकी है.

इन पांचों जानवरों की मौत फेफड़ों के संक्रमण के कारण हुई है.  वन्यजीव अधिकारियों ने इस मामले की जांच शुरू कर दी है क्योंकि उन्हें कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (सीडीवी) के फैलने का संदेह है, जो आमतौर पर कुत्तों के माध्यम से फैलता है. अधिकारियों के मुताबिक, 10 वर्षीय बाघिन और उसका 18 महीने का शावक 26 अप्रैल से क्वारंटीन में थे और इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई. इससे पहले 17 से 25 अप्रैल के बीच कान्हा के सरही रेंज में तीन शावक मृत पाए गए थे, जिसके बाद बाघिन और इस अंतिम शावक को बेहोश करके इलाज के लिए लाया गया था.

मुख्य वन्यजीव वार्डन समिता राजोरा ने 'द हिंदू' को बताया कि तीसरे मृत शावक में सीडीवी की पुष्टि हो चुकी है, जबकि बाघिन और बुधवार को मरे शावक के नमूने जांच के लिए भेजे गए हैं.

"शुरुआत में दो शावकों के शव काफी सड़ी-गली अवस्था में मिले थे.  स्थानीय अधिकारियों को लगा कि बाघिन बीमार होने के कारण शिकार नहीं कर पा रही थी, इसलिए शावकों की मौत भूख से हुई होगी. लेकिन जब तीसरा शावक मिला, तो मुझे लगा कि मामला गंभीर हो सकता है," राजोरा ने कहा. उन्होंने बताया कि तीसरे शावक का शव जबलपुर स्थित स्कूल ऑफ वाइल्डलाइफ फॉरेंसिक एंड हेल्थ (एसडब्ल्यूएफएच) भेजा गया था.

एसडब्ल्यूएफएच की जांच में पाया गया कि शावक गंभीर श्वसन समस्याओं, हीट स्ट्रोक और निमोनिया जैसी स्थितियों से जूझ रहा था और उसमें सीडीवी की मौजूदगी की पुष्टि हुई. राजोरा ने आगे बताया, "हमने हाथियों पर गश्ती दल भेजकर बाघिन और आखिरी शावक का पता लगाया. उनके लिए भोजन भी छोड़ा गया लेकिन उन्होंने ठीक से नहीं खाया, इसलिए हमने उन्हें इलाज के लिए पकड़ा. चार डॉक्टरों की टीम लगातार काम कर रही थी, लेकिन उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बहुत कम हो चुकी थी, जिसके कारण उन्हें बचाया नहीं जा सका."

राजोरा ने कहा कि वायरस को अन्य बाघों और जानवरों में फैलने से रोकने के लिए क्षेत्र में 40 कैमरे लगाए गए हैं, हालांकि अभी वहां कोई अन्य बाघ नहीं दिखा है. जानवरों की जांच के लिए पशु चिकित्सा कर्मियों को तैनात किया गया है. क्षेत्र से जानवरों का मल हटाया जा रहा है, ताकि संक्रमण न फैले. किसी अन्य संक्रमण की संभावना को खारिज करने के लिए जलाशयों के पानी के नमूने लिए गए हैं. इस घटना की रिपोर्ट केंद्रीय अधिकारियों और एनटीसीए को भेजी जा रही है. राजोरा ने यह भी स्पष्ट किया कि इस वर्ष मरे 27 बाघों में से 13 की मौत प्राकृतिक कारणों से हुई, 1 की मौत डूबने से हुई, कुछ की मौत आपसी लड़ाई में हुई और 7 बाघों की मौत करंट लगने से हुई.

इस बीच वन्यजीव कार्यकर्ता अजय दुबे ने इन मौतों के लिए लापरवाही और गश्त की कमी को जिम्मेदार ठहराया है. उन्होंने दावा किया कि कान्हा और अन्य रिजर्व के कोर क्षेत्रों में आवारा कुत्ते घूम रहे हैं. वनों के भीतर भ्रष्टाचार बढ़ रहा है. टाइगर रिजर्व के अंदर तेंदू पत्ता जैसे वनोपज इकट्ठा करना प्रतिबंधित है, लेकिन कुछ अधिकारी ग्रामीणों को अंदर जाने देते हैं. ये लोग अपने साथ कुत्ते रखते हैं ताकि बाघ आने पर उन्हें सतर्क कर सकें." उन्होंने संदेह जताया कि बाघिन ने किसी कुत्ते का शिकार किया होगा और उसे अपने शावकों को खिलाया होगा.

दुबे ने 2020 के एनटीसीए दिशा-निर्देशों का भी हवाला दिया, जिसमें रिजर्व के अंदर आवारा कुत्तों का टीकाकरण अनिवार्य है. उन्होंने सवाल उठाया, "यदि अंदर के कुत्तों का टीकाकरण हुआ था, तो यह वायरस कैसे आया? यह दर्शाता है कि संक्रमण बाहर से आया है." हालांकि, राजोरा ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि एनटीसीए के दिशा-निर्देशों के अनुसार कोर, बफर और परिधीय क्षेत्रों में कुत्तों का नियमित टीकाकरण किया जा रहा है.

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