बंगाल में सत्ता की जंग या सक्सेशन बैटल? अमित शाह क्यों केंद्र में

बंगाल में चुनाव आयोग, ईडी, पैरामिलिट्री फोर्सेस और न्यायपालिका की भूमिका जिस तरह से दिखाई दे रही है, क्या वैसी ही सक्रियता अन्य राज्यों में भी देखी गई है? इस संदर्भ में चुनावी प्रक्रिया और संस्थाओं की निष्पक्षता को लेकर कई सवाल सामने आते हैं.

इसके साथ ही हरकारा डीप डाइव के इस एपिसोड में  पत्रकार श्रवण गर्ग के साथ पश्चिम बंगाल चुनाव को लेकर एक अहम चर्चा हुई, जिसमें फोकस सीधे तौर पर अमित शाह की भूमिका और दांव पर रहा. बातचीत की शुरुआत इस से होती है कि जब देश के कई राज्यों में चुनाव हुए हैं, तो पूरा राष्ट्रीय ध्यान सिर्फ बंगाल पर ही क्यों केंद्रित है और केरल, तमिलनाडु या असम जैसे राज्यों को उसी तरह क्यों नहीं देखा जा रहा.

बंगाल में चुनाव आयोग, ईडी, पैरामिलिट्री फोर्सेस और न्यायपालिका की भूमिका जिस तरह से दिखाई दे रही है, क्या वैसी ही सक्रियता अन्य राज्यों में भी देखी गई है? इस संदर्भ में चुनावी प्रक्रिया और संस्थाओं की निष्पक्षता को लेकर कई सवाल सामने आते हैं.

एग्जिट पोल्स को लेकर भी बातचीत में संदेह जताया गया. खास तौर पर प्रदीप गुप्ता द्वारा एग्जिट पोल जारी न करने को लेकर यह चर्चा हुई कि क्या यह केवल तकनीकी कारण है या फिर चुनावी माहौल में किसी तरह के दबाव या असहजता का संकेत. वहीं अन्य एजेंसियों के एग्जिट पोल्स में बीजेपी और टीएमसी के बीच बेहद करीबी मुकाबला दिखाया जाना भी परसेप्शन और वास्तविकता के बीच के फर्क पर सवाल खड़े करता है.

बातचीत में यह भी सामने आया कि यह चुनाव केवल राजनीतिक दलों के बीच मुकाबला नहीं, बल्कि व्यक्तिगत रूप से अमित शाह की राजनीतिक परीक्षा बन गया है. चर्चा में यह धारणा उभरती है कि इस बार नरेंद्र मोदी की भूमिका अपेक्षाकृत सीमित रही, जबकि अमित शाह ने स्वयं बंगाल में सक्रिय रहकर चुनाव की पूरी कमान संभाली. 2021 के चुनावी नतीजों के बाद इस बार उनकी आक्रामक रणनीति को एक बड़ी राजनीतिक वापसी के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है. 

इसी के साथ बातचीत में बीजेपी के भीतर संभावित नेतृत्व परिवर्तन की बहस भी जुड़ती नजर आई. अगर भविष्य में नरेंद्र मोदी सक्रिय राजनीति से पीछे हटते हैं, तो अगला नेतृत्व किसके हाथ में होगा? इस सवाल में योगी आदित्यनाथ का नाम भी उभरकर सामने आता है. ऐसे में बंगाल चुनाव को एक बड़े “सक्सेशन टेस्ट” के रूप में देखा जा रहा है. 

 4 मई को अगर नतीजों में अंतर बेहद कम रहता है, तो क्या राज्य में राजनीतिक और सामाजिक स्थिरता बनी रह पाएगी? भारी संख्या में तैनात सुरक्षा बलों और चुनाव के बाद भी उनकी मौजूदगी को लेकर भी सवाल उठाए गए.

इसके अलावा चुनाव में बढ़ते ध्रुवीकरण, ‘बाहरी बनाम स्थानीय’ की राजनीति और ममता बनर्जी की आक्रामक चुनावी शैली को भी महत्वपूर्ण फैक्टर बताया गया. ममता बनर्जी को इस चुनाव में एक ऐसे नेता के रूप में देखा जा रहा है जो सीधे सत्ता और तंत्र के खिलाफ लड़ाई का प्रतीक बनकर उभरी हैं.पूरी बातचीत यहाँ सुनी जा सकती है.

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