12 आंकड़ों में ‘मेक इन इंडिया’ के 12 साल — विकास, रोजगार और वैश्विक हिस्सेदारी पर धीमा और सीमित प्रभाव

25 सितंबर 2014 को शुरू किए गए ‘मेक इन इंडिया’ अभियान के 12 साल बाद, विकास, निवेश, रोजगार और निर्यात से जुड़े 12 आंकड़ों पर नजर डालने से पता चलता है कि तब से लेकर अब तक भारत के आर्थिक विकास, रोजगार और वैश्विक निर्यात में विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) क्षेत्र की हिस्सेदारी काफी हद तक पहले जैसी ही बनी हुई है. हालांकि सरकार की हालिया प्रोत्साहन योजनाओं को कुछ सफलता मिली है, लेकिन वे लाभ केवल कुछ ही क्षेत्रों तक सीमित हैं.

‘द हिंदू’ में टी.सी.ए. शरद राघवन की रिपोर्ट कहती है कि ‘मेक इन इंडिया’ अभियान की शुरुआत करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि "उद्योगपति किसी आकर्षक प्रोत्साहन योजना के कारण नहीं आते", बल्कि उन्हें एक "विकास और वृद्धि-उन्मुख वातावरण" की आवश्यकता होती है. लेकिन, पिछले 12 वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि जहां सरकार की प्रोत्साहन योजनाओं को कुछ हद तक सफलता मिली है, वहीं "विकास और वृद्धि-उन्मुख वातावरण" को दर्शाने वाले अन्य मानक कमजोर प्रदर्शन कर रहे हैं.

विकास को कोई बड़ा बढ़ावा नहीं

पुरानी श्रृंखला (ओल्ड सीरीज) के आधार पर, समीक्षाधीन 12 वर्षों में से पांच वर्षों में विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि दर समग्र अर्थव्यवस्था की तुलना में अधिक रही है. नई श्रृंखला के तहत, जिन तीन वर्षों (2023-24 से 2025-26) के आंकड़े उपलब्ध हैं, उन सभी में इसने समग्र विकास दर को पीछे छोड़ दिया है, लेकिन यह अंतर तेजी से घट रहा है.

औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) के आंकड़े, जो महीने में एक बार जारी होते हैं, और भी अधिक चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं.  सूचकांक की पुरानी श्रृंखला के अनुसार, आईआईपी के भीतर विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि दर 12 वर्षों में से केवल तीन वर्षों में ही समग्र सूचकांक की वृद्धि से अधिक रही. नई श्रृंखला दर्शाती है कि 2023-24 में विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि दर समग्र सूचकांक के बराबर थी, लेकिन अगले दो वर्षों में यह धीमी रही.

जहां तक अर्थव्यवस्था की संरचना का सवाल है, सकल मूल्य वर्धित (जीवीए) आंकड़ों की पुरानी श्रृंखला से पता चलता है कि 2025-26 में कुल जीवीए में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी 2014 में 'मेक इन इंडिया' की शुरुआत के समय की तुलना में कम है. नई श्रृंखला दर्शाती है कि क्षेत्र की हिस्सेदारी 2022-23 के 14.6% से मामूली रूप से बढ़कर 2025-26 में 15.6% हो गई है.

बढ़ता निर्यात, स्थिर हिस्सेदारी

भारत के गैर-पेट्रोलियम सामानों के निर्यात का मूल्य मेक इन इंडिया अभियान शुरू होने वाले वर्ष के 253.5 अरब डॉलर से 53% बढ़कर 2025-26 में 388.3 अरब डॉलर हो गया. आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि इससे पहले के 12 वर्षों में गैर-पेट्रोलियम सामानों के निर्यात में 400% से अधिक की वृद्धि हुई थी, भले ही वह काफी छोटे आधार (बेस) पर थी. हालांकि, बेस इफेक्ट केवल इस वृद्धि अंतर के एक हिस्से की ही व्याख्या करता है. अंकटाड (यूएनसीटीएडी) के आंकड़े बताते हैं कि वैश्विक मर्चेंडाइज निर्यात में भारत की हिस्सेदारी 2002 के लगभग 0.8% से बढ़कर 2013 में 1.7% हो गई थी, जहां यह 2025-26 में भी स्थिर बनी हुई है.

निवेश का सुस्त प्रतिसाद

निजी क्षेत्र द्वारा सकल स्थिर पूंजी निर्माण (जीएफसीएफ) — जो वास्तविक संपत्ति निर्माण पर उसके खर्च का एक पैमाना है — 2023-24 (नवीनतम वर्ष जिसके आंकड़े पुरानी श्रृंखला में उपलब्ध हैं) में जीडीपी के प्रतिशत के रूप में 2014-15 की तुलना में कम था. नई श्रृंखला भी दर्शाती है कि जीडीपी के प्रतिशत के रूप में जीएफसीएफ 2022-23 से गिर रहा है.

समीक्षाधीन 12 वर्षों में से सात वर्षों में विनिर्माण क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की वृद्धि दर कुल एफडीआई वृद्धि से धीमी रही है.  कुल एफडीआई में इसकी हिस्सेदारी 2014-15 के लगभग 48% से बढ़कर 2025-26 में 55% हो गई.

आरबीआई के क्षमता उपयोग (कैपेसिटी यूटिलाइजेशन) के आंकड़े, जो यह मापते हैं कि कारखानों का कितना गहन उपयोग किया जा रहा है, दिखाते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में यह आंकड़ा धीरे-धीरे बढ़ रहा है, लेकिन यह अभी भी 80% के स्तर से नीचे है — जिसे वह सीमा माना जाता है जिसके बाद कंपनियां नई क्षमता निर्माण के लिए निवेश करती हैं.

आरबीआई के आंकड़े आगे बताते हैं कि उद्योग को दिए जाने वाले बैंक ऋण में पिछले कुछ वर्षों में मजबूत वृद्धि हुई है, जिसका नेतृत्व विशेष रूप से सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों को दिए गए ऋणों ने किया है.  हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि उत्पादन में निरंतर तीव्र वृद्धि के अभाव में, यह बताता है कि ऋण नए निवेश के बजाय कार्यशील पूंजी (वर्किंग कैपिटल) जुटाने के लिए लिए जा रहे हैं.

प्रोत्साहन योजनाओं का प्रभाव

सरकार की प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआई) योजनाओं के कुछ परिणाम सामने आए हैं. 2020 और 2021 के दौरान शुरू की गई इन 14 योजनाओं के परिणामस्वरूप मार्च 2026 तक कुल 2.4 लाख करोड़ रुपये का निवेश हुआ है. हालांकि, आंकड़े यह भी बताते हैं कि यह प्रदर्शन अत्यधिक केंद्रित है.

शीर्ष पांच क्षेत्र — सोलर मॉड्यूल, फार्मास्युटिकल दवाएं, ऑटोमोबाइल और उनके घटक, स्पेशलिटी स्टील, और बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण — मिलकर इन योजनाओं के तहत हुए कुल निवेश का लगभग 83% हिस्सा रखते हैं.

रोजगार पर सीमित प्रभाव

इन योजनाओं के तहत नियोजित 8.5 लाख लोगों में से 86% से अधिक हिस्सा खाद्य उत्पाद, बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण, फार्मास्युटिकल दवाएं, ऑटोमोबाइल और उनके घटक, तथा व्हाइट गुड्स (उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स) क्षेत्रों का था.

श्रम एवं रोजगार मंत्रालय से प्राप्त आंकड़े बताते हैं कि विनिर्माण क्षेत्र में नियोजित कुल लोगों की संख्या 2016-17 के 5.1 करोड़ से बढ़कर 2025-26 में 5.3 करोड़ हो गई. कुल रोजगार में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी 2025-26 में काफी हद तक वही थी जो एक दशक पहले थी.

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