15 दस्तावेज़, तीन पीढ़ियों का रिकॉर्ड, फिर भी 'विदेशी' घोषित हुआ असम का एक मजदूर

‘आर्टिकल 14’ के मुताबिक,असम के गोलपाड़ा जिले के रहने वाले 38 वर्षीय दिहाड़ी मजदूर अमीनुल हक के पास अपनी भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए 15 आधिकारिक दस्तावेज़ थे. इनमें 1951 के राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) की प्रति, 1966 से 2017 तक की मतदाता सूचियां, उनके दादा द्वारा 1973 में की गई भूमि बिक्री का दस्तावेज़, पैन कार्ड, स्कूल प्रमाणपत्र और मतदाता फोटो पहचान पत्र शामिल थे. इसके बावजूद 30 जून 2026 को गुवाहाटी हाई कोर्ट ने विदेशी न्यायाधिकरण के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें उन्हें विदेशी घोषित किया गया था.

यह फैसला ऐसे समय आया जब कुछ ही दिनों बाद सुप्रीम कोर्ट ने गुवाहाटी हाई कोर्ट के 27 ऐसे फैसलों को रद्द कर दिया, जिनमें विदेशी न्यायाधिकरणों के आदेशों को संबंधित व्यक्ति की व्यक्तिगत सुनवाई के बिना ही सही ठहराया गया था. सर्वोच्च न्यायालय ने दोहराया कि नागरिकता से जुड़े मामलों में निष्पक्ष सुनवाई और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन अनिवार्य है.

नदी कटाव ने कई बार उजाड़ा परिवार

अमीनुल हक की याचिका के अनुसार उनका परिवार मूल रूप से गोलपाड़ा जिले के चराई खासरा गांव का रहने वाला था. उनके पिता, दादा-दादी और अन्य रिश्तेदारों के नाम 1951 के राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर में दर्ज थे. बाद में ब्रह्मपुत्र नदी के लगातार कटाव के कारण परिवार को गांव छोड़ना पड़ा और वे धुबाकुरा गांव में बस गए, जहां उनके दादा-दादी के नाम 1966 और 1970 की मतदाता सूची में दर्ज हुए.

इसके बाद परिवार घुगुडोबा और फिर हाशदोबा गांव में जाकर बस गया, जहां 1988 में अमीनुल का जन्म हुआ. अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार उनका नाम पहली बार 2013 की मतदाता सूची में शामिल हुआ.

दस्तावेज़ों की लंबी सूची भी नहीं बनी नागरिकता का प्रमाण

अमीनुल हक ने अदालत के सामने 15 दस्तावेज़ पेश किए और अपने पूर्वजों से संबंध साबित करने की कोशिश की. लेकिन गुवाहाटी हाई कोर्ट ने माना कि वे विदेशी अधिनियम, 1946 की धारा 9 के तहत नागरिकता साबित करने का दायित्व पूरा नहीं कर पाए.

अदालत ने 1951 के राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर की प्रति को यह कहते हुए स्वीकार नहीं किया कि वह कंप्यूटर से निकाली गई प्रति थी और उसके साथ भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत आवश्यक प्रमाणन नहीं था. अदालत ने यह भी कहा कि केवल राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर की प्रति किसी व्यक्ति का भारत में स्थायी निवास सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है.

इसी तरह अमीनुल के दादा द्वारा किए गए 1973 के भूमि बिक्री दस्तावेज़ को भी अदालत ने पर्याप्त महत्व नहीं दिया. अदालत ने कहा कि यह स्पष्ट नहीं किया गया कि वह भूमि बाद में किसके पास रही या उसका उत्तराधिकार कैसे हुआ.

मौखिक गवाही भी नहीं आई काम

अमीनुल ने अपने पिता की गवाही भी पेश की, जिन्होंने अदालत में उन्हें अपना पुत्र बताया. लेकिन अदालत ने कहा कि केवल मौखिक गवाही नागरिकता साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है और उसके समर्थन में मजबूत दस्तावेज़ी साक्ष्य होना चाहिए.

स्कूल प्रमाणपत्र भी इसलिए स्वीकार नहीं किया गया क्योंकि न तो उसे जारी करने वाले प्रधानाध्यापक ने गवाही दी और न ही स्कूल का प्रवेश रजिस्टर प्रस्तुत किया गया.

अदालत ने यह भी माना कि परिवार के अलग-अलग गांवों में रहने और नदी कटाव के कारण हुए विस्थापन का दावा पर्याप्त दस्तावेज़ों से सिद्ध नहीं किया गया.

विशेषज्ञ बोले—यह मानक आम नागरिक के लिए लगभग असंभव

सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता तल्हा अब्दुल रहमान का कहना है कि विदेशी न्यायाधिकरण अक्सर यह स्पष्ट नहीं करते कि किसी व्यक्ति पर विदेशी होने का संदेह किस आधार पर किया गया है और उससे कौन-कौन से दस्तावेज़ अपेक्षित हैं. ऐसे में लोग हर उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड जुटा लेते हैं, लेकिन फिर भी यह तय नहीं होता कि कौन-सा दस्तावेज़ अदालत स्वीकार करेगी.

रहमान के अनुसार असम के बाढ़ और नदी कटाव वाले क्षेत्रों में रहने वाले परिवारों के लिए कई पीढ़ियों के रिकॉर्ड सुरक्षित रखना बेहद कठिन है. बार-बार विस्थापन के कारण व्यक्तिगत और सरकारी दस्तावेज़ खो जाना आम बात है.

पटना स्थित चाणक्य राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर फैजान मुस्तफा का कहना है कि अदालत जिस स्तर के प्रमाण की अपेक्षा कर रही है, वह सामान्य दीवानी मामलों से कहीं अधिक कठोर है. उनके अनुसार यदि यही मानक पूरे देश में लागू किया जाए तो बड़ी संख्या में लोग अपनी नागरिकता साबित नहीं कर पाएंगे.

राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, बेंगलुरु की प्रोफेसर दर्शना मित्रा का भी कहना है कि अदालतों को प्रत्येक दस्तावेज़ को अलग-अलग देखने के बजाय सभी साक्ष्यों के समग्र प्रभाव का मूल्यांकन करना चाहिए, क्योंकि पुराने रिकॉर्ड में नामों की वर्तनी या अन्य छोटी विसंगतियां स्वाभाविक होती हैं.

अमीनुल का मामला अकेला नहीं

असम में नागरिकता विवाद कोई नई बात नहीं है. 2005 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा अवैध प्रवासी निर्धारण कानून रद्द किए जाने के बाद फिर से विदेशी अधिनियम, 1946 लागू हुआ, जिसके तहत नागरिकता साबित करने का पूरा दायित्व संबंधित व्यक्ति पर है.

राज्य में इस समय 100 विदेशी न्यायाधिकरण काम कर रहे हैं, जो 24 मार्च 1971 को नागरिकता तय करने की कट-ऑफ तिथि मानते हैं. विधानसभा में पेश आंकड़ों के अनुसार जनवरी 2025 तक 4.36 लाख से अधिक मामले विदेशी न्यायाधिकरणों को भेजे जा चुके थे, जिनमें से 1,65,992 लोगों को विदेशी घोषित किया जा चुका है, जबकि 85 हजार से अधिक मामले अभी भी लंबित हैं.

अमीनुल हक के पास अब सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का विकल्प है. हालांकि उनके वकील मुइज उद्दीन महमूद का कहना है कि आर्थिक तंगी के कारण अधिकांश लोग वहां तक पहुंच ही नहीं पाते. उनके मुताबिक अमीनुल का मामला यह दिखाता है कि असम में कई बार दशकों पुराने सरकारी रिकॉर्ड और तीन पीढ़ियों के दस्तावेज़ भी किसी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं माने जाते.

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