2006 मालेगांव ब्लास्ट केस: बॉम्बे हाई कोर्ट ने चार आरोपियों के ख़िलाफ़ आरोप रद्द किए
महाराष्ट्र के मालेगांव में 8 सितंबर 2006 को हुए सिलसिलेवार बम धमाकों ने देश को झकझोर दिया था. मस्जिद और कब्रिस्तान के पास हुए इन धमाकों में 31 लोगों की जान गई और 300 से अधिक लोग घायल हुए थे. स्क्रोल की रिपोर्ट के मुताबिक़ अब दो दशकों बाद, इस मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट ने हाल ही में उस विशेष अदालत के आदेश को रद्द कर दिया है , जिसमें चार आरोपियों , मनोहर नरवरिया, राजेंद्र चौधरी, धन सिंह और लोकेश शर्मा के ख़िलाफ़ आरोप तय करने को कहा गया था.
विशेष अदालत ने सितंबर में इनके ख़िलाफ़ हत्या, आपराधिक साज़िश और गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत आरोप तय करने का आदेश दिया था, लेकिन अब हाई कोर्ट ने यह कहते हुए इसे ख़ारिज कर दिया कि आरोप तय करने के लिए पर्याप्त और ठोस सबूत मौजूद नहीं है.
बचाव पक्ष का तर्क था कि मामले में कोई चश्मदीद नहीं है और अभियोजन पक्ष जिस कबूलनामे पर निर्भर है, उसे अन्य अदालतें पहले ही अविश्वसनीय मान चुकी हैं. अदालत ने इन दलीलों को स्वीकार किया.
इस मामले की जांच अपने आप में एक जटिल और विवादित यात्रा रही है. शुरुआत में महाराष्ट्र एटीएस ने नौ मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार किया और उन्हें आरोपी बताया था. बाद में सीबीआई ने भी इन्हें ही आरोप माना था. लेकिन 2011 में जांच अपने हाथ में लेने के बाद एनआईए ने पूरी दिशा बदल दी. 2016 में एनआईए ने कहा कि पहले गिरफ्तार किए गए मुस्लिम युवक बेक़सूर हैं और उन्हें बरी करदिया गया. लेकिन तब तक वे करीब 10 साल जेल में बिता चुके थे। इस फैसले के खिलाफ दायर अपील 2019 से लंबित है, जो न्यायिक प्रक्रिया की धीमी गति को भी उजागर करता है.
इसके बाद एनआईए जांच का रुख हिंदुत्व संगठनों के कुछ सदस्यों की ओर मूड़ा. इस बदलाव की वजह वो क़बूलनामा था, जो आरोपी स्वामी असीमानंद ने 2010 में दिया था. इसमें उन्होंने दवा किया था कि इन बम धमाकों में हिंदुत्व संगठन के लोग शामिल थे. हालांकि बाद में असीमानंद अपने बयान से मुकर गए और अन्य मामलों में अदालतों ने उनके क़बूलनाम को भरोसेमंद नहीं माना.
2014 में द कारवां को दिए गए एक एक विस्तृत इंटरव्यू में असीमानंद ने एक बार दावा किया था कि इन हमलों की साज़िश में हिंदुत्व संगठनों से जुड़े कुछ अहम लोग शामिल थे. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि इन गतिविधियों को संघ परिवार के कुछ वरिष्ठ पदाधिकारियों की “मौखिक स्वीकृति” प्राप्त थी.
इन मामलों ने भारत में आतंकवाद से जुड़े मुकदमों की एक बड़ी तस्वीर भी सामने रखी है. यूएपीए जैसे कड़े कानूनों के तहत बड़ी संख्या में गिरफ्तारियां होती हैं, लेकिन सज़ा का प्रतिशत बेहद कम है. स्क्रोल की रिपोर्ट के मुताबिक़ लोकसभा में साझा किए गए गृह मंत्रालय के आंकड़ों (2019-2023) के अनुसार, यूएपीए के तहत 10,440 गिरफ्तारियों के मुकाबले सिर्फ 335 लोगों को सज़ा हुई है. यह लगभग 3.2% का बहुत कम सज़ा दर दर्शाता है. 2015–2020 के बीच सिर्फ 2.8% गिरफ्तार लोगों को दोषी ठहराया गया, जबकि 97% से अधिक लोग बरी हो गए.

