मोदी के भाषण और आचार संहिता पर विवाद, 700 नागरिकों की चिट्ठी से बढ़ी बहस, “टॉकिंग न्यूज़” में विस्तृत चर्चा
हरकारा के लाइव शो टॉकिंग न्यूज़ विद निधीश में वरिष्ठ पत्रकार राजेश चतुर्वेदी के साथ प्रधानमंत्री मोदी के हालिया भाषण और उनके ख़िलाफ़ 700 से अधिक नागरिकों, सेवानिवृत्त नौकरशाहों और समाजी कार्यकर्ताओं द्वारा दर्ज शिकायत पर बातचीत हुई. साथ ही कई गंभीर सवाल भी उठाए गए. चर्चा में बताया गया कि लोकसभा में संविधान संशोधन विधेयक के विफल होने के अगले दिन प्रधानमंत्री ने दूरदर्शन के सरकारी मंच से राष्ट्र के नाम संबोधन किया. आरोप है कि इस मंच का इस्तेमाल चुनावी उद्देश्यों के लिए किया गया, क्योंकि संबोधन में कांग्रेस का नाम करीब 58-59 बार लिया गया, जबकि विषय महिलाओं से जुड़ा बताया गया था. कार्यक्रम में यह भी कहा गया कि यदि उद्देश्य केवल महिलाओं पर बात करना था, तो उसी तक सीमित रहना चाहिए था.
इस भाषण के बाद 700 से अधिक नागरिकों, सेवानिवृत्त नौकरशाहों और एक्टिविस्टों ने इलेक्शन कमीशन को पत्र लिखकर शिकायत दर्ज कराई. पत्र में कहा गया कि जब पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में चुनाव चल रहे हैं, तब सरकारी प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर विपक्षी दलों पर हमला करना आचार संहिता का उल्लंघन है. साथ ही यह मांग भी की गई कि चुनाव आयोग इस मामले में कार्रवाई करे, विपक्षी दलों को भी सरकारी मीडिया पर समान अवसर मिले और चुनाव खत्म होने तक ऐसे डिजिटल कंटेंट को हटाया जाए. हालांकि भारतीय जनता पार्टी का कहना है कि इसमें कोई गलत काम नहीं किया गया.
चर्चा में प्रधानमंत्री के पिछले भाषणों का भी ज़िक्र हुआ, जिनमें “मंगलसूत्र छीनने”, “घुसपैठियों” और धार्मिक मुद्दों पर जैसे बयान शामिल हैं. 2024 के चुनावों का उदाहरण देते हुए कहा गया कि कई मौकों पर उन्होंने विपक्ष पर गंभीर आरोप लगाए, जैसे आदिवासियों की ज़मीन पर क़ब्ज़ा, बेटियों को निशाना बनाना या राम मंदिर को लेकर बयान, लेकिन इन दावों के समर्थन में ठोस तथ्य सामने नहीं रखे गए.
ह्यूमन राइट्स वॉच के हवाले से बताया गया कि 2024 में 110 से ज़्यादा भाषणों में ऐसे लफ़्ज़ों का इस्तेमाल किया गया , जो इस्लामॉफ़ोबिक थे. इतना ही नहीं बालाकोट और पुलवामा जैसे मौज़ू का भी चुनावी संधर्भ में इस्तेमाल हुआ, जिस पर विपक्ष ने ऐतराज़ ज़ाहिर किया था. ऐसे में चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाना अनिवार्य हो जाता है. राजेश चतुर्वेदी ने पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई.कुरैशी के बयान का ज़िक्र किया, जिसमे उन्होंने कहा था कि पहले प्रधानमंत्री कार्यालय आचार संहिता से जुड़े मामलों पर आयोग से सलाह लेता था, लेकिन हाल के वर्षों में ऐसा नहीं देखा गया है. यह भी आरोप लगाया गया कि आयोग की कार्रवाई में असमानता दिखती है, जैसे कभी व्यक्तियों की बजाय पार्टियों को नोटिस दिया जाता है, जबकि विपक्षी नेताओं को सीधे नोटिस भेजे जाते हैं. इसके अलावा आयकर विभाग, ईडी जैसी एजेंसियों की चुनाव के दौरान सक्रियता को भी “कॉम्बो प्रभाव” बताया गया, जिससे राजनीतिक माहौल प्रभावित होता है.
चर्चा में पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के चुनावों की तुलना भी की गई. बताया गया कि बंगाल में दो चरणों में चुनाव हो रहे हैं और भारी संख्या में केंद्रीय बल तैनात हैं, जिससे माहौल तनावपूर्ण दिखाई देता है. वहीं तमिलनाडु में एक ही चरण में मतदान हो रहा है. यह सवाल उठाया गया कि क्या ऐसे माहौल में मतदाता बिना डर के स्वतंत्र रूप से मतदान कर पाएंगे. यह चुनाव केवल राज्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके नतीजों का असर पूरे देश की राजनीति और आने वाले चुनावों पर भी पड़ेगा.

