2050 का भारत: दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और प्रति व्यक्ति आय में सौवें स्थान के आसपास का देश
फरवरी 2017 में वैश्विक पेशेवर सेवा कंपनी पीडब्ल्यूसी ने वर्ष 2050 तक दुनिया की अर्थव्यवस्था की संभावित तस्वीर पेश करने वाली एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट जारी की थी. उस समय यह रिपोर्ट काफी चर्चा में रही, लेकिन समय के साथ इसकी चर्चा कम हो गई. अब जबकि 2050 ज्यादा दूर नहीं है, यह देखना महत्वपूर्ण हो जाता है कि उस रिपोर्ट में भारत के लिए किए गए अनुमान क्या संकेत देते हैं और उनका आम भारतीय के जीवन पर क्या असर पड़ सकता है.
‘साउथ फर्स्ट’ में प्रकाशित बिक्शम गुज्जा और अनिल के. सूद के विश्लेषण के अनुसार, यदि ये अनुमान सही साबित होते हैं तो भारत 2050 तक दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है. लेकिन इसके साथ एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि इतनी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के बावजूद प्रति व्यक्ति आय के मामले में भारत दुनिया के अपेक्षाकृत निचले देशों में बना रह सकता है.
बड़ी तस्वीर: बदलती वैश्विक व्यवस्था
रिपोर्ट के अनुसार 2050 तक चीन दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होगा, जबकि भारत दूसरे और अमेरिका तीसरे स्थान पर होगा. वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में भारत की हिस्सेदारी मौजूदा लगभग सात प्रतिशत से बढ़कर करीब 15 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है. यह किसी भी बड़े देश के मुकाबले सबसे तेज वृद्धि मानी गई है.
अनुमान है कि 2050 तक चीन और भारत मिलकर दुनिया की कुल आर्थिक गतिविधियों का लगभग 35 प्रतिशत हिस्सा होंगे. दूसरी ओर यूरोपीय संघ की हिस्सेदारी लगातार घटेगी. इंडोनेशिया तेजी से उभरने वाली अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होगा, जबकि फ्रांस शीर्ष 10 अर्थव्यवस्थाओं से बाहर हो सकता है और ब्रिटेन दसवें स्थान तक खिसक सकता है. रिपोर्ट के अनुसार भविष्य की आर्थिक वृद्धि का सबसे बड़ा केंद्र दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया होगा.
विकास की कोई गारंटी नहीं
पीडब्ल्यूसी ने स्पष्ट किया है कि उसके अनुमान कुछ महत्वपूर्ण शर्तों पर आधारित हैं. इनमें विकास समर्थक आर्थिक नीतियां, संरक्षणवाद से दूरी और किसी बड़े वैश्विक संकट का न होना शामिल है.
रिपोर्ट के अनुसार उभरती अर्थव्यवस्थाओं को व्यापक आर्थिक स्थिरता बनाए रखनी होगी, संरचनात्मक सुधार करने होंगे, अपनी अर्थव्यवस्थाओं में विविधता लानी होगी और राजनीतिक तथा कानूनी संस्थाओं को मजबूत बनाना होगा.
लेखकों का कहना है कि भारत के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण संदेश है. यदि देश सामाजिक तनाव, राजनीतिक अस्थिरता या संस्थागत कमजोरी का सामना करता है तो 2050 तक के अनुमान वास्तविकता में बदलना मुश्किल हो सकता है. आर्थिक विकास और मजबूत संस्थागत व्यवस्था एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं.
अमीर देश, लेकिन अमीर नागरिक नहीं: प्रति व्यक्ति आय की चुनौती
रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि किसी देश की कुल अर्थव्यवस्था का आकार और उसके नागरिकों की समृद्धि अलग-अलग बातें हैं.
2050 तक दुनिया की शीर्ष 10 अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने के बावजूद भारत, चीन, इंडोनेशिया, ब्राजील, रूस और मेक्सिको जैसे देशों की प्रति व्यक्ति आय विकसित देशों की तुलना में काफी कम रहने का अनुमान है. यानी देश आर्थिक रूप से शक्तिशाली होगा, लेकिन उसके अधिकांश नागरिक विकसित देशों के नागरिकों जैसी आय नहीं प्राप्त कर पाएंगे.
2016 से 2026 के बीच भारत और चीन दोनों ने क्रय शक्ति समता के आधार पर उल्लेखनीय आर्थिक वृद्धि दर्ज की है. चीन की प्रति व्यक्ति आय लगभग 13,800 डॉलर से बढ़कर 31,600 डॉलर तक पहुंच गई, जबकि भारत की प्रति व्यक्ति आय लगभग 6,760 डॉलर से बढ़कर 12,800 डॉलर हो गई.
भारत के विकसित भारत 2047 लक्ष्य के अनुसार यदि आर्थिक वृद्धि की यही रफ्तार बनी रहती है तो 2050 तक भारत की प्रति व्यक्ति आय लगभग 26,000 से 28,000 डॉलर तक पहुंच सकती है. इसके मुकाबले चीन की प्रति व्यक्ति आय 43,000 से 44,000 डॉलर के बीच रहने का अनुमान है.
आज भारत प्रति व्यक्ति आय के आधार पर दुनिया में लगभग 119वें स्थान पर है. रिपोर्ट का अनुमान है कि 2050 तक यह रैंकिंग सुधरकर लगभग 100वें स्थान तक पहुंच सकती है. यानी दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के बावजूद प्रति व्यक्ति आय के मामले में भारत वैश्विक स्तर पर अपेक्षाकृत काफी पीछे रहेगा.
रिपोर्ट के दो बड़े निष्कर्ष
लेखकों के अनुसार इस रिपोर्ट से भारत के लिए दो बड़े निष्कर्ष निकलते हैं.
पहला, भारत 2050 तक दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की क्षमता रखता है, जो ऐतिहासिक उपलब्धि होगी.
दूसरा, प्रति व्यक्ति आय के आधार पर भारत तब भी दुनिया में लगभग 100वें स्थान पर रहेगा. चीन के साथ अंतर कम होगा, लेकिन समाप्त नहीं होगा, जबकि विकसित देशों से दूरी काफी बनी रहेगी.
रिपोर्ट यह भी बताती है कि यह अंतर केवल आंकड़ों का नहीं, बल्कि भारत की विशाल आबादी का भी परिणाम है. यही आबादी कुल अर्थव्यवस्था को बड़ा बनाती है और प्रति व्यक्ति आय की वृद्धि को सीमित भी करती है.
भारत को क्या करना होगा
लेखकों का मानना है कि भारत के नीति-निर्माताओं के सामने दोहरी चुनौती है. पहली, ऐसी आर्थिक और संस्थागत परिस्थितियां बनाना जिनसे देश वास्तव में इन अनुमानों तक पहुंच सके. इसके लिए व्यापक आर्थिक स्थिरता, मजबूत संस्थाएं, कानून का शासन और निवेश के अनुकूल वातावरण जरूरी होगा.
दूसरी चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि आर्थिक विकास का लाभ केवल सकल घरेलू उत्पाद तक सीमित न रहे, बल्कि आम नागरिक की आय और जीवन स्तर में भी दिखाई दे. इसके लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक बुनियादी ढांचे और कौशल विकास में लगातार निवेश करना होगा.
लेखकों के अनुसार आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं. समावेशी विकास, सामाजिक सौहार्द और सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार केवल आदर्श नहीं, बल्कि भारत के आर्थिक भविष्य की बुनियादी आवश्यकता हैं.
बिक्शम गुज्जा और अनिल के. सूद का निष्कर्ष है कि 2050 का भारत केवल दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की कहानी नहीं होगा. असली सवाल यह होगा कि क्या इस आर्थिक प्रगति का लाभ आम भारतीय तक पहुंचेगा. किसी भी देश की वास्तविक सफलता केवल उसकी अर्थव्यवस्था के आकार से नहीं, बल्कि उसके नागरिकों के जीवन स्तर, अवसरों और समृद्धि से तय होती है.

