24 साल बाद भी इंसाफ का इंतजार: डेरा प्रमुख पर लिखने वाले पत्रकार की हत्या का मामला

‘स्क्रोल’ में सफवत जरगर की रिपोर्ट के मुताबिक, डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह के खिलाफ बलात्कार के आरोपों को प्रकाशित करने वाले पत्रकार रामचंदर छत्रपति की हत्या के 24 साल बाद भी उनके परिवार की कानूनी लड़ाई जारी है. पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट द्वारा 2019 की हत्या की सजा पलटे जाने के खिलाफ छत्रपति के बेटे अंशुल ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की है, जिस पर नवंबर में सुनवाई होनी है.

सच लिखने की कीमत

रामचंदर छत्रपति ने 2002 में ‘पूरा सच’ नाम से शाम का अखबार शुरू किया था. मई 2002 में एक महिला शिष्या का प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को लिखा तीन पन्नों का गुमनाम पत्र सिरसा में चर्चा का विषय बना. पत्र में गुरमीत राम रहीम पर बलात्कार का आरोप लगाया गया था.

30 मई को छत्रपति ने अपने अखबार में इस पत्र पर खबर प्रकाशित की. इसके बाद वह लगातार मामले से जुड़ी घटनाओं की रिपोर्टिंग करते रहे. डेरा समर्थकों की ओर से पत्र बांटने वालों और उसकी प्रतियां निकालने वाली दुकानों को निशाना बनाए जाने की घटनाओं की भी उन्होंने खबरें प्रकाशित कीं. जुलाई 2002 में उन्होंने सिरसा के पुलिस अधीक्षक को धमकी भरे फोन और संदिग्ध लोगों की गतिविधियों की शिकायत की.

सितंबर 2002 में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने मामले का संज्ञान लिया और केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई से जांच कराने का आदेश दिया. 23 अक्टूबर को छत्रपति ने डेरा की उस याचिका के खारिज होने की खबर प्रकाशित की, जिसमें सीबीआई जांच रोकने की मांग की गई थी. अगले दिन उनके घर के बाहर दो हमलावरों ने उन्हें पांच गोलियां मारीं. नवंबर 2002 में दिल्ली के अस्पताल में 52 वर्ष की उम्र में उनकी मौत हो गई.

सीबीआई जांच और लंबी कानूनी लड़ाई

पुलिस ने शुरुआत में हत्या को संपत्ति विवाद बताया, लेकिन मौके से एक हमलावर कुलदीप सिंह पकड़ा गया, जो डेरा समर्थक था. बाद में उसका रिश्तेदार निर्मल सिंह भी गिरफ्तार हुआ. उनके पास डेरा से जुड़ा वॉकी-टॉकी और डेरा प्रबंधक कृष्ण लाल के नाम पर लाइसेंसी पिस्तौल मिलने की बात सामने आई.

छत्रपति परिवार ने डेरा प्रमुख की भूमिका की जांच के लिए सीबीआई जांच की मांग की. नवंबर 2003 में हाई कोर्ट ने दोबारा सीबीआई जांच का आदेश दिया. सुप्रीम कोर्ट में चुनौती के कारण जांच शुरू होने में और समय लगा.

2007 में सीबीआई ने गुरमीत राम रहीम, कृष्ण लाल और दोनों हमलावरों के खिलाफ हत्या और आपराधिक साजिश का आरोपपत्र दाखिल किया. जांच में डेरा के पूर्व चालक खट्टा सिंह की गवाही महत्वपूर्ण बनी. उन्होंने दावा किया था कि राम रहीम ने छत्रपति को चुप कराने के लिए हत्या का आदेश दिया था. हालांकि, 2012 में वह अदालत में अपने बयान से पलट गए. 2017 में राम रहीम को बलात्कार के मामले में सजा होने के बाद खट्टा सिंह ने दोबारा गवाही देने की कोशिश की.

जनवरी 2019 में सीबीआई की विशेष अदालत ने राम रहीम और तीन अन्य को छत्रपति की हत्या का दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई.

हाई कोर्ट से राहत, अब सुप्रीम कोर्ट

मार्च 2026 में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने राम रहीम को हत्या के मामले में बरी कर दिया. अदालत ने खट्टा सिंह की गवाही को अविश्वसनीय मानते हुए कहा कि उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता. मई 2024 में हाई कोर्ट राम रहीम को उसके पूर्व प्रबंधक और अनुयायी रणजीत सिंह की हत्या के मामले में भी बरी कर चुका है.

हालांकि, राम रहीम बलात्कार के मामलों में मिली 20 साल की सजा काट रहा है. रिपोर्ट के मुताबिक, 2017 में जेल जाने के बाद उसे नौ वर्षों में 17 बार पैरोल मिल चुकी है और कई बार ये रिहाइयां चुनावों के आसपास हुई हैं.

अंशुल छत्रपति के लिए पिता की हत्या के बाद न्याय की लड़ाई ही जीवन का केंद्र बन गई. वह कॉलेज की पढ़ाई पूरी नहीं कर सके और परिवार को दशकों तक पुलिस सुरक्षा में रहना पड़ा. अब उनकी अपील पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई नवंबर में होगी. 24 साल बाद भी उनका कहना है कि न्याय की लड़ाई खत्म नहीं हुई है.


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