आलोक भट्ट: आपत्तिजनक पोस्ट, छिपाया गया एक्स हैंडल और द पैंफलेट से जुड़ाव पर सवाल

बीजेपी के आईटी सेल में आलोक भट्ट की नियुक्ति उनके पुराने सोशल मीडिया रिकॉर्ड और ऐसी संस्थाओं से संभावित जुड़ाव के सवालों के बीच हुई है, जिनकी संरचना, फंडिंग और वित्तीय गतिविधियों को लेकर सार्वजनिक जानकारी सीमित है.

‘ऑल्ट न्यूज़’ की शिंजिनी मजूमदार ने बीजेपी की नई सोशल मीडिया टीम में आलोक भट्ट की नियुक्ति और उनके पुराने सोशल मीडिया रिकॉर्ड के साथ-साथ द पैंफलेट और सावित्र एनालिटिक्स मीडिया एंड रिसर्च फाउंडेशन से उनके संभावित संबंधों की पड़ताल की है.

17 अगस्त को भारतीय जनता पार्टी ने अपनी नई सोशल मीडिया टीम की घोषणा की. दीपक म्हास्के को राष्ट्रीय सोशल मीडिया संयोजक और प्रीति गांधी, शिवानंद द्विवेदी, आलोक भट्ट तथा अरुण यादव को सह-संयोजक बनाया गया. घोषणा के तुरंत बाद प्रीति गांधी, शिवानंद द्विवेदी और अरुण यादव ने अपने एक्स अकाउंट निजी कर दिए, जबकि आलोक भट्ट का एक्स अकाउंट इंटरनेट पर दिखाई देना ही बंद हो गया.

बाद में अन्य पदाधिकारी एक्स पर लौटे, लेकिन पुराने पोस्ट हटाने के बाद. आलोक भट्ट का एक्स हैंडल एक महीने से अधिक समय बाद भी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है. उनके ऑनलाइन रिकॉर्ड के नाम पर पुराने पोस्ट के स्क्रीनशॉट और ओपइंडिया, ऑर्गनाइज़र तथा स्वराज्य जैसे दक्षिणपंथी मीडिया संस्थानों में प्रकाशित उनके लेख ही प्रमुख रूप से उपलब्ध हैं.

पुराने सोशल मीडिया रिकॉर्ड पर सवाल

रिपोर्ट में पुराने पोस्ट के स्क्रीनशॉट के आधार पर कहा गया है कि भट्ट ने अतीत में सेक्सिस्ट, इस्लामोफोबिक और अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया था. एक्स ने उनके अकाउंट पर कम से कम तीन बार कार्रवाई की थी.

2018 में भट्ट ने कश्मीर में पंडितों की हत्या, पंडितों से बलात्कार, आतंकवाद, गोधरा और मुंबई बम धमाकों जैसी घटनाओं को मुसलमानों से जोड़ते हुए इस्लाम को समस्या बताया था. इसके बाद उनके अकाउंट को सीमित किया गया.

2019 में उन्होंने कार्यकर्ता शेहला राशिद को लेकर भी आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया और उनके खिलाफ पुलिस कार्रवाई की मांग की. इसके बाद उनका अकाउंट निलंबित हुआ था. 2020 में भी उनके अकाउंट पर दोबारा कार्रवाई हुई.

भट्ट ने 2020 में अंतरजातीय और अंतरधार्मिक विवाहों को बढ़ावा देने वाले उत्तराखंड के एक जिला अधिकारी के प्रेस नोट पर विवाद के दौरान भी टिप्पणी की थी. उन्होंने कहा था कि बीजेपी सरकार में कोई भी व्यक्ति अंतरधार्मिक विवाह को बढ़ावा देने वाली ऐसी किसी चीज का समर्थन नहीं करेगा.

आलोक भट्ट कौन हैं?

भट्ट खुद को देहरादून का निवासी बताते हैं. उनके लिंक्डइन प्रोफाइल के मुताबिक उन्होंने उत्तराखंड के हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय से पढ़ाई की और एनआईआईटी यूनिवर्सिटी में अप्रैल 2010 तक वित्त नियंत्रक के रूप में काम किया.

2010 में उन्होंने नेचर कनेक्ट आउटडोर्स नाम की शिक्षा और एडवेंचर आधारित गैर-लाभकारी संस्था शुरू की. संस्था ट्रेकिंग, कैंपिंग, राफ्टिंग और आउटडोर शिक्षा से जुड़े कार्यक्रम चलाती है.

ज़ौबा कॉर्प के रिकॉर्ड के मुताबिक भट्ट चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं और मई 2021 में बनी आरएसएसी एंड कंपनी एलएलपी के साझेदार हैं. वे उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के आर्थिक सलाहकार भी रह चुके हैं. हालांकि, उनके कार्यकाल की शुरुआत और समाप्ति की सटीक तारीख स्पष्ट नहीं है.

बीजेपी से पुराना जुड़ाव

भट्ट का एक्स हैंडल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा फॉलो किया जाता था. 2024 में मोदी ने भट्ट की एक पोस्ट को रीट्वीट भी किया था, जिसमें उन्होंने लोगों से फिल्म 'द साबरमती रिपोर्ट' देखने की अपील की थी.

भट्ट की प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह में मौजूदगी के भी प्रमाण सामने आए हैं. 2015 की एक पोस्ट में उनकी प्रधानमंत्री मोदी के साथ तस्वीर दिखाई देती है. 2022 में दक्षिणपंथी सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर शेफाली वैद्य ने भी उत्तराखंड में भट्ट से मुलाकात की तस्वीर साझा की थी.

सावित्र एनालिटिक्स और द पैंफलेट का कनेक्शन

रिपोर्ट की सबसे महत्वपूर्ण पड़ताल 2022 में बनी सावित्र एनालिटिक्स मीडिया एंड रिसर्च फाउंडेशन से जुड़ी है. अप्रैल 2022 में बनी इस कंपनी में शुरुआत में आलोक भट्ट और आशीष नौटियाल निदेशक थे. कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय में दाखिल दस्तावेजों के मुताबिक भट्ट के पास कंपनी के 9,500 शेयर यानी 95 प्रतिशत हिस्सेदारी है, जबकि नौटियाल के पास 5 प्रतिशत हिस्सेदारी है.

आशीष नौटियाल दक्षिणपंथी मीडिया प्लेटफॉर्म द पैंफलेट के संस्थापक संपादक भी रहे हैं.

सावित्र एनालिटिक्स के पास कोई वेबसाइट या स्पष्ट ऑनलाइन मौजूदगी नहीं है. कंपनी ने 2024-25 में 2.7 करोड़ रुपये का परिचालन राजस्व दर्ज किया. 2022-23 और 2023-24 के दस्तावेजों में अनुदान या चंदे से संबंधित कॉलम खाली थे. कंपनी ने अपनी गतिविधियों में भारतीय संस्कृति और विरासत, शिक्षा, शोध, सामाजिक कल्याण, धर्म, कला, विज्ञान और पर्यावरण जैसे क्षेत्रों का उल्लेख किया है.

कंपनी के खर्चों में भी बड़ा बदलाव दिखाई देता है. 2022-23 में पेशेवर खर्च के तौर पर 41.48 लाख रुपये दर्ज किए गए, जिसे बाद में 'कंटेंट प्रोडक्शन खर्च' के रूप में दर्ज किया गया. यह खर्च 2023-24 में 95.36 लाख और 2024-25 में 1.38 करोड़ रुपये रहा.

द पैंफलेट से जुड़े दूसरे नाम

रिपोर्ट में ऋधिका अग्रवाल का भी उल्लेख है, जिन्होंने अगस्त 2023 तक सावित्र एनालिटिक्स में कंटेंट राइटर के रूप में काम करने की जानकारी लिंक्डइन पर दी थी. उनके पुराने सोशल मीडिया रिकॉर्ड से पता चलता है कि उन्होंने सावित्र में काम करने के दौरान द पैंफलेट के लिए कम से कम तीन लेख लिखे थे, हालांकि वे लेख अब वेबसाइट पर उपलब्ध नहीं हैं.

सावित्र एनालिटिक्स के दूसरे निदेशक शिव कुमार मिश्रा अप्रैल 2023 में कंपनी से जुड़े. इससे कुछ ही समय पहले मार्च 2023 में उन्हें द पैंफलेट का सीईओ घोषित किया गया था.

इस तरह कंपनी के तीन निदेशकों में से दो ऐसे लोग रहे हैं, जिनके द पैंफलेट के साथ वरिष्ठ स्तर पर संबंध रहे हैं. दोनों संस्थाओं में उनकी नियुक्तियां भी लगभग एक-दूसरे के आसपास हुईं. इसके बावजूद दोनों संस्थाओं के बीच औपचारिक संबंध सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं किया गया है.

द पैंफलेट की शुरुआत अप्रैल 2022 में हुई थी, उसी समय जब सावित्र एनालिटिक्स की स्थापना हुई. शुरुआती दौर में देहरादून में इसका कार्यालय था और तस्वीरों से कम से कम 20 लोगों की टीम दिखाई देती है.

फंडिंग और स्वामित्व को लेकर पारदर्शिता का सवाल

द पैंफलेट खुद को स्वतंत्र डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म बताता है, लेकिन उसकी वेबसाइट पर किसी पैरेंट कंपनी, मालिकाना संरचना, संपादकीय टीम, निदेशक मंडल या फंडिंग स्रोत की जानकारी नहीं दी गई है. सार्वजनिक रूप से दिखाई देने वाला एकमात्र स्पष्ट वित्तीय स्रोत यूट्यूब सदस्यता है, जिसकी फीस 119 से 3,199 रुपये प्रति माह तक बताई गई है.

रिपोर्ट के मुताबिक द पैंफलेट की सामग्री में सरकार समर्थक नैरेटिव दिखाई देते हैं. सीजेपी प्रदर्शनों से जुड़ी कुछ रिपोर्टों में सरकार के आलोचकों और प्रदर्शनकारियों को निशाना बनाया गया. कुछ वीडियो के थंबनेल में आलोचकों के चेहरे को नकारात्मक रूप में दिखाने के लिए एआई से तैयार तस्वीरों का इस्तेमाल किया गया.

अगस्त 2026 में द पैंफलेट, अभिजीत अय्यर-मित्र, लॉ बीट, द जयपुर डायलॉग्स और द संडे गार्डियन को दिल्ली हाईकोर्ट ने एक निजता संबंधी मुकदमे में समन किया था. सीजेपी प्रवक्ता सौरव दास ने आरोप लगाया था कि उनकी निजी जानकारी और घर का पता ऑनलाइन सार्वजनिक किया गया.

सवाल पूछे गए, लेकिन स्पष्ट जवाब नहीं मिला

3 सितंबर को द पैंफलेट से सावित्र एनालिटिक्स और उसके बीच संबंध तथा आलोक भट्ट की भूमिका को लेकर सवाल पूछे गए. साथ ही फंडिंग स्रोतों के बारे में भी जानकारी मांगी गई.

द पैंफलेट ने जवाब में सवालों का सीधा उत्तर देने के बजाय ऑल्ट न्यूज़ से उसके अपने फंडिंग और संस्थापकों से जुड़े सवालों के जवाब मांगे. आशीष नौटियाल ने बताया कि ओपइंडिया की संपादक नूपुर शर्मा ने उन्हें ऑल्ट न्यूज़ को कोई टिप्पणी या जानकारी न देने की सलाह दी थी.

द पैंफलेट की संपादक निर्वा मेहता ने भी लंबा जवाब भेजा, लेकिन भट्ट और सावित्र एनालिटिक्स से जुड़े मूल सवालों का उत्तर नहीं दिया. इसके बाद दोनों पक्षों के बीच पत्राचार समाप्त हो गया.

सोशल मीडिया पोस्ट क्या संकेत देते हैं?

रिपोर्ट में सोशल मीडिया पर मौजूद कई पोस्ट का हवाला देते हुए कहा गया है कि भट्ट और द पैंफलेट के बीच संबंध पूरी तरह अनजाना नहीं था. जनवरी 2026 में अभिजीत अय्यर-मित्र ने द पैंफलेट की टीम को द पैंफलेट पंचायत में आमंत्रित करने के लिए धन्यवाद दिया. इस पोस्ट में संपादक निर्वा मेहता, एंकर श्रेया अरोड़ा और आलोक भट्ट का नाम साथ दिखाई देता है.

दिल्ली शब्दोत्सव 2026 में भी भट्ट की मौजूदगी की तस्वीरें मिलीं. एक अन्य एक्स बातचीत में अय्यर-मित्र ने निर्वा मेहता को द पैंफलेट और आलोक भट्ट का 'स्टाफ' बताते हुए संबोधित किया. मेहता ने इस संदर्भ पर आपत्ति नहीं जताई.

2023 की एक पोस्ट में भी आशीष नौटियाल के साथ तस्वीर साझा करने वाले एक व्यक्ति ने भट्ट और शिव मिश्रा को टैग करते हुए एक 'बेहतरीन टीम' तैयार करने के लिए उनकी तारीफ की थी. इन सार्वजनिक संकेतों से भट्ट और द पैंफलेट के बीच पेशेवर संबंध की संभावना पर सवाल उठते हैं, हालांकि संस्थाओं ने इस संबंध की औपचारिक प्रकृति सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं की है.

बीजेपी की नई नियुक्ति और पारदर्शिता का सवाल

आलोक भट्ट की बीजेपी सोशल मीडिया टीम में नियुक्ति के बाद उनके पुराने सोशल मीडिया रिकॉर्ड और पेशेवर संबंधों की जांच फिर चर्चा में आई है. मामला केवल पुराने आपत्तिजनक पोस्ट तक सीमित नहीं है. सावित्र एनालिटिक्स में उनकी 95 प्रतिशत हिस्सेदारी, कंपनी के सीमित सार्वजनिक रिकॉर्ड, उसके अन्य निदेशकों के द पैंफलेट से संबंध और द पैंफलेट की स्वामित्व तथा फंडिंग को लेकर सार्वजनिक जानकारी की कमी ने अतिरिक्त सवाल खड़े किए हैं.

सबसे अहम सवाल यह है कि यदि भट्ट और द पैंफलेट के बीच पेशेवर संबंध रहा है, तो उसे सार्वजनिक रूप से स्पष्ट क्यों नहीं किया गया. उपलब्ध सोशल मीडिया पोस्ट इस संबंध की ओर संकेत करते हैं, लेकिन दोनों संस्थाओं के बीच औपचारिक कॉरपोरेट संबंध का निर्णायक सार्वजनिक प्रमाण रिपोर्ट में सामने नहीं रखा गया है.

ऐसे में बीजेपी की नई सोशल मीडिया टीम में भट्ट की भूमिका के संदर्भ में उनके पुराने सोशल मीडिया आचरण के साथ-साथ पेशेवर संबद्धताओं और संस्थागत पारदर्शिता से जुड़े सवाल भी सार्वजनिक बहस का हिस्सा बन गए हैं.

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