पुशबैक' की क्रूर नीति: बंदूक की नोंक पर 'बेवतन' बनाने का हिंदुत्ववादी प्रोजेक्ट 

‘स्क्रोल’ की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में बंगाली भाषी मुस्लिम आबादी इस समय एक बड़े संकट और नागरिकता छिन जाने के गहरे डर के साये में जी रही है. जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक हर्ष मंडर के इस लेख में यह रेखांकित किया गया है कि किस प्रकार भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकारें और हिंदुत्ववादी विचारधारा राज्य मशीनरी का उपयोग करके इस आबादी को निशाना बना रही हैं. पश्चिम बंगाल के चुनावों में भाजपा की हालिया जीत के बाद से यह संकट और गहरा गया है क्योंकि अब बांग्लादेश से सटी भारत की आधी से अधिक सीमा पर इन 'पुशबैक' (जबरन सीमा पार धकेलने) की कार्रवाइयों को बढ़ाने का रास्ता साफ हो गया है.

भाषाई और सांस्कृतिक पहचान पर संकट

भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाला देश है जहाँ लगभग 20 करोड़ मुस्लिम रहते हैं. हिंदी के बाद बंगाली भारत में बोली जाने वाली दूसरी सबसे बड़ी भाषा है. इसके बावजूद आज के दौर में केवल बंगाली बोलना, पारंपरिक लुंगी पहनना या मछली-मांस पकाना किसी कामकाजी मुस्लिम को संदिग्ध और अपराधी की श्रेणी में खड़ा कर देता है.

मुंबई में काम करने वाले एक बंगाली मजदूर अनवर अली की आपबीती इस दर्द को बयां करती है. उनके ठेकेदार ने उन्हें फोन पर सलाह दी कि वे लुंगी पहनना छोड़ दें और हिंदी बोलना सीखें क्योंकि बंगाली बोलना खतरनाक हो चुका है. अनवर का यह सवाल बेहद मार्मिक है कि कोई अपनी पोशाक तो बदल सकता है, लेकिन अपनी मातृभाषा को कैसे बदल दे.

'पुशबैक' की नीति और अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन

'पुशबैक' एक ऐसी न्यायेतर प्रक्रिया है जिसके तहत राज्य द्वारा संदिग्ध करार दिए गए लोगों को बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के बंदूक की नोंक पर अंतरराष्ट्रीय सीमा के पार धकेल दिया जाता है. यह पूरी प्रक्रिया मुख्य रूप से मुस्लिम पहचान वाले लोगों को लक्षित कर रही है. जब किसी व्यक्ति से उसकी नागरिकता का अधिकार छीन लिया जाता है, तो वह भारतीय संविधान द्वारा दिए गए मौलिक अधिकारों से वंचित हो जाता है. वह न तो वोट दे सकता है और न ही सरकारी राशन, आवास या पेंशन जैसी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ उठा सकता है. वह व्यक्ति अपने ही देश में 'बेवतन' यानी स्टेटलेस हो जाता है.

अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत किसी भी संप्रभु राष्ट्र को अवैध रूप से रह रहे विदेशियों को उनके देश वापस भेजने  का अधिकार है, लेकिन इसकी एक तय कानूनी और राजनयिक प्रक्रिया होती है. उदाहरण के लिए, जब अमेरिका का ट्रंप प्रशासन किसी भारतीय नागरिक को वापस भेजता है, तो वह भारतीय दूतावास को इसकी पूरी जानकारी देता है और नागरिकता की पुष्टि होने पर ही सम्मानजनक तरीके से वापस भेजा जाता है.

इसके विपरीत, भारत में होने वाले 'पुशबैक' में बांग्लादेश सरकार को न तो कोई सूचना दी जाती है और न ही संबंधित व्यक्ति की नागरिकता की पुष्टि करने का अवसर दिया जाता है. बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय और वहां की सेना ने भारत की इस 'पुश-इन' नीति पर कड़ा विरोध दर्ज कराया है. बांग्लादेशी सैन्य अधिकारियों का कहना है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह से अस्वीकार्य है और वे केवल राजनयिक चैनलों के माध्यम से पुष्टि किए गए नागरिकों को ही स्वीकार करेंगे.

2025 का नया कानून और कानूनी औपचारिकता

भारत सरकार ने इस न्यायेतर प्रक्रिया को कानूनी जामा पहनाने के लिए वर्ष 2025 में 'इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स एक्ट 2025' पारित किया है. इस कानून ने इस पूरी दमनकारी व्यवस्था को और आसान और क्रूर बना दिया है.

पुलिस या प्रशासन केवल संदेह के आधार पर किसी भी बंगाली भाषी मुस्लिम को हिरासत में लेकर 'होल्डिंग सेंटर' में डाल सकता है. संदेह का आधार क्या होगा, यह कानून में स्पष्ट नहीं है. इस कानून ने 'बर्डन ऑफ प्रूफ'  को उलट दिया है. अब राज्य को यह साबित करने की जरूरत नहीं है कि पकड़ा गया व्यक्ति विदेशी है, बल्कि उस गरीब, अनपढ़ और लाचार मजदूर को 30 दिनों के भीतर यह साबित करना होगा कि वह भारत का नागरिक है. पहले नागरिकता से जुड़े मामलों की सुनवाई 'फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल' में होती थी जहाँ अपील का अधिकार था. अब यह अधिकार पूरी तरह से स्थानीय नौकरशाही (ब्यूरोक्रेसी) को दे दिया गया है. जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस अधिकारी ही अब जज और जांचकर्ता दोनों बन गए हैं.

असम और त्रिपुरा में जमीनी हकीकत

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने इसे एक उपलब्धि की तरह पेश किया कि उनकी सरकार ने फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल को बाईपास करके सैकड़ों लोगों को सीधे बांग्लादेश धकेल दिया है. उन्होंने यह भी घोषणा की कि यदि किसी व्यक्ति का नाम नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस (NRC) में भी है, तो भी उसे संदिग्ध पाए जाने पर निकाला जा सकता है. इसके साथ ही, गैर-मुस्लिमों के लिए लंबित मामलों में आम माफी की घोषणा की गई, जो इस नीति के खुले तौर पर पक्षपातपूर्ण होने का प्रमाण है.

त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक साहा ने भी राज्य विधानसभा में आंकड़े पेश करते हुए बताया कि पिछले कुछ वर्षों में हजारों कथित अवैध प्रवासियों को हिरासत में लिया गया और उनमें से अधिकांश को वापस धकेल दिया गया. ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट के अनुसार, इन कार्रवाइयों में मानवाधिकारों और उचित कानूनी प्रक्रिया की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं.

ओडिशा, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों से भी बंगाली मजदूरों की धरपकड़ और उनके घरों को ध्वस्त करने की खबरें लगातार आ रही हैं. अहमदाबाद में हजारों झुग्गियों को केवल इस संदेह में बुलडोजर से उड़ा दिया गया कि वहां 'बांग्लादेशी घुसपैठिए' रहते थे, जबकि वे लोग वहां पिछले 40 वर्षों से रह रहे थे.

'बेवतन' बनाने का प्रोजेक्ट

हर्ष मंडर के अनुसार, यह पूरी कवायद केवल प्रवासियों को रोकने की प्रशासनिक कोशिश नहीं है, बल्कि यह हिंदुत्व के उस वृहद वैचारिक एजेंडे का हिस्सा है जो भारत में मुस्लिमों को दोयम दर्जे का नागरिक बनाना चाहता है. एनआरसी , नागरिकता संशोधन अधिनियम और अब 2025 का यह नया इमिग्रेशन कानून मिलकर देश के लाखों गरीब बंगाली मुस्लिमों को अपनी ही धरती पर पराया और 'बेवतन' बनाने का एक सुनियोजित ढांचा तैयार कर रहे हैं. वरिष्ठ टिप्पणीकार समर हलर्नकर ने इसे ठीक ही 'नैतिक नरसंहार' की संज्ञा दी है.

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