डॉ. राजेंद्र चट्टोपाध्याय | बिश्नोई गैंग और बॉलीवुड पर बढ़ता उसका साया

फिल्मी दुनिया में हर कुछ महीनों में गोलीबारी या धमकी की कोई नई घटना लॉरेंस बिश्नोई गैंग को फिर सुर्खियों में ले आती है. इस बार अभिनेता टाइगर श्रॉफ को कथित तौर पर निशाना बनाए जाने की खबर सामने आई है. इसकी टाइमिंग ने कई सवाल खड़े किए हैं. देशभर में युवा रोजगार और अवसरों की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं. ऐसे समय में सनसनीखेज आपराधिक घटनाएं लोगों का ध्यान सड़कों पर उठ रहे सवालों से हटाकर पर्दे की दुनिया की ओर मोड़ सकती हैं. यह महज संयोग है या इसके पीछे कोई दूसरी वजह है, इसका स्पष्ट जवाब मिलना जरूरी है.

कुछ तथ्य चिंता बढ़ाते हैं. लॉरेंस बिश्नोई कई वर्षों से जेल में बंद है और गुजरात की साबरमती जेल में रखा गया है. इसके बावजूद उससे जुड़े नेटवर्क की गतिविधियां जारी रहने के आरोप सामने आते रहे हैं. सितंबर 2025 में कनाडा ने बिश्नोई गैंग को आतंकवादी संगठन घोषित किया था. इससे इस नेटवर्क की अंतरराष्ट्रीय पहुंच को लेकर वहां की सरकार की गंभीरता का संकेत मिलता है. सवाल यह है कि जेल में बंद एक व्यक्ति कथित तौर पर कई शहरों और देशों में फैले नेटवर्क से कैसे जुड़ा रह सकता है.

अप्रैल 2024 में सलमान खान के बांद्रा स्थित आवास के बाहर गोलीबारी हुई थी. मुंबई पुलिस ने इस मामले में लॉरेंस बिश्नोई और उसके भाई अनमोल बिश्नोई को वांछित आरोपी बताया था. खबरों के अनुसार, गोलीबारी करने वाले दोनों हमलावर उनसे निर्देश ले रहे थे. बाद की कुछ घटनाओं के बाद सोशल मीडिया पर गैंग से जुड़े लोगों के खातों से जिम्मेदारी लेने वाले संदेश भी सामने आए. रोहित शेट्टी के जुहू स्थित आवास के बाहर गोलीबारी के बाद कथित तौर पर किए गए एक पोस्ट में घटना को “ट्रेलर” बताते हुए बॉलीवुड के दूसरे लोगों को भी चेतावनी दी गई थी. गैंग ने कनाडा में कपिल शर्मा के कैफे पर हमले की जिम्मेदारी भी ली है. सिद्धू मूसेवाला और बाबा सिद्दीकी की हत्याओं की जांच में भी इस नेटवर्क से जुड़े नाम सामने आए हैं.

सलमान खान को 1998 के काले हिरण शिकार मामले के कारण वर्षों से धमकियां मिलती रही हैं. बिश्नोई समुदाय में काले हिरण का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है. रणवीर सिंह और एपी ढिल्लों जैसी अन्य चर्चित हस्तियों को भी कथित तौर पर धमकियों या उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है. इन घटनाओं में निशाना बनाए गए कई कलाकार मुस्लिम या सिख हैं. इस पैटर्न की जांच तथ्यों के आधार पर होनी चाहिए. इसे बिना प्रमाण किसी निष्कर्ष तक पहुंचने का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए, लेकिन इसे नजरअंदाज करना भी उचित नहीं होगा.

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जेल में बंद गैंग सरगना अपना नेटवर्क कैसे चला रहा है. जेलों का उद्देश्य ऐसे संपर्कों को रोकना भी है. यदि मोबाइल फोन, संदेशों या बिचौलियों के माध्यम से बाहर संपर्क कायम किया जा रहा है, तो यह जेल प्रशासन की गंभीर विफलता है. इसे रोकने की जिम्मेदारी केंद्र और संबंधित राज्य सरकारों की भी है. केवल कार्रवाई का आश्वासन देना पर्याप्त नहीं है. जनता जानना चाहती है कि कौन-से कदम उठाए गए, किसने उन्हें लागू किया और उनसे क्या परिणाम निकले.

दूसरा सवाल अलग-अलग राज्यों की पुलिस और जांच एजेंसियों के बीच समन्वय का है. खबरों के अनुसार, पंजाब की आम आदमी पार्टी सरकार को बिश्नोई की हिरासत और स्थानांतरण से जुड़े मामलों में कानूनी सहयोग हासिल करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है. महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब और दिल्ली में फैली जांचों को आगे बढ़ाने के लिए संबंधित एजेंसियों के बीच तालमेल जरूरी है. जब आपराधिक मामले कई राज्यों तक फैले हों, तो जिम्मेदारी की अस्पष्टता और जांच में देरी का लाभ आरोपियों को मिल सकता है.

तीसरा सवाल संवेदनशील है: क्या टाइगर श्रॉफ से जुड़ी कथित घटना और युवाओं के विरोध प्रदर्शनों के बीच कोई संबंध है? इस संबंध में कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया है, इसलिए किसी पर आरोप लगाना उचित नहीं होगा. हालांकि, बड़ी आपराधिक घटनाएं राष्ट्रीय चर्चा की दिशा बदल सकती हैं. ऐसी स्थिति में सरकार की जिम्मेदारी है कि वह पारदर्शी जांच के जरिए किसी भी संदेह को दूर करे. यदि टाइगर श्रॉफ पर गोलीबारी की घटना हुई है और उसका संबंध गैंग से है, तो जांच के निष्कर्ष स्पष्ट रूप से सामने आने चाहिए. यदि ऐसा संबंध नहीं है, तो यह भी साफ बताया जाना चाहिए.

इसका अर्थ यह नहीं है कि सरकार या पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की. पिछले मामलों में गिरफ्तारियां हुई हैं और कई शहरों की पुलिस जांच कर रही है. जमीनी स्तर पर काम करने वाले अधिकारियों को कठिन परिस्थितियों में जिम्मेदारी निभानी पड़ती है. सवाल उनके प्रयासों का नहीं, बल्कि नतीजों और पारदर्शिता का है. इतने वर्षों बाद भी यदि नेटवर्क सक्रिय होने के आरोप सामने आ रहे हैं, तो जनता को बताया जाना चाहिए कि ऐसा क्यों हो रहा है.

सरकार और अधिकारियों की ओर से कई बार गैंग को “खत्म” करने जैसे दावे किए गए हैं, लेकिन ऐसी घोषणाओं से समस्या का समाधान नहीं होता. असली कसौटी है कि मुकदमों में दोषसिद्धि हो, जेलों से अवैध संपर्क पूरी तरह रोके जाएं और प्रशासनिक विफलताओं के लिए जिम्मेदारी तय हो. जब तक ये परिणाम सामने नहीं आते, तब तक सख्त कार्रवाई के दावे खोखले लगते रहेंगे और अटकलों को जगह मिलती रहेगी.

नागरिकों को भरोसा होना चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आतंकवादी संगठन घोषित किए जा चुके आपराधिक नेटवर्क से निपटने में सरकार गंभीर है और किसी राजनीतिक सुविधा के हिसाब से काम नहीं कर रही. यदि बिश्नोई के मामले में देरी के कानूनी या प्रशासनिक कारण हैं, तो सरकार को उन्हें स्पष्ट करना चाहिए. हिरासत या स्थानांतरण में कोई बाधा है, तो उसका विवरण और समाधान भी सामने आना चाहिए. चुप्पी से अटकलें बढ़ती हैं, जबकि पारदर्शिता तथ्यों को सामने लाने में मदद करती है.

देश के युवा रोजगार, समान अवसर और अपनी बात सुने जाने की मांग कर रहे हैं. वे यह भी देख रहे हैं कि सरकार कठिन सवालों का जवाब देती है या उम्मीद करती है कि समय के साथ लोग उन्हें भूल जाएंगे.

इसलिए मांग स्पष्ट है: टाइगर श्रॉफ से जुड़ी घटना की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच हो, निष्कर्ष सार्वजनिक किए जाएं और बताया जाए कि जेल में बंद व्यक्ति का नेटवर्क सक्रिय कैसे रह सकता है. यदि व्यवस्था में खामियां हैं, तो उन्हें स्वीकार कर दूर किया जाए. जवाबदेही से बचने के बजाय ठोस जानकारी देना ही जनता का भरोसा कायम रखने का रास्ता है.

(मूल अंग्रेजी लेख में काउंटरकरंट्स पर पढ़ा जा सकता है.)

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