सरकार के लिए अगली चुनौती: ‘बिना किसी नेता’ वाली भीड़ को दोबारा एकजुट होने से कैसे रोका जाए

यद्यपि केंद्र सरकार सुरक्षा बलों की भारी तैनाती के माध्यम से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा मांग रहे प्रदर्शनकारियों को शनिवार (10 अक्टूबर, 2026) को जंतर-मंतर पर एकत्र होने से रोकने में सफल रही, लेकिन उसकी अगली चुनौती आने वाले दिनों में इस काफी हद तक ‘बिना किसी नेता’ वाली भीड़ को दोबारा एकजुट होने से रोकना प्रतीत हो रही है. उधर, सुरुचि कुमारी ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि युवा समूहों ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे तक विरोध प्रदर्शन जारी रखने का संकल्प लिया है और कहा है कि वे 'कल (रविवार, 11 अक्टूबर) फिर वापस आएंगे'.

विजयेता सिंह की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में लगे प्रतिबंधों के संबंध में शुक्रवार (9 अक्टूबर, 2026) को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के बाद सरकार ने 'कॉकरोच जनता पार्टी' (सीजेपी) के आयोजकों को प्रदर्शन के लिए एक वैकल्पिक स्थल के रूप में रामलीला मैदान की पेशकश करने पर विचार किया था. लेकिन, न तो सीजेपी और न ही आंदोलन में भाग ले रहे वामपंथी युवा समूहों ने इसके लिए कोई अनुरोध किया.

सुरक्षा संबंधी दुविधा

सरकारी अधिकारियों ने बताया कि आने वाले दिनों में शनिवार (10 अक्टूबर) जैसे बड़े पैमाने पर सुरक्षा व्यवस्था जुटाना संभव नहीं होगा, और प्रदर्शनकारियों को 24 घंटे से अधिक समय तक हिरासत में रखना कानूनी रूप से सही नहीं होगा.

अधिकारियों ने कहा कि देश के सबसे व्यस्त व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में से एक कनॉट प्लेस ब्लॉक, जिसे पुलिस के अनुरोध पर शनिवार (10 अक्टूबर) को बंद कर दिया गया था, को अनिश्चित काल के लिए बंद नहीं रखा जा सकता है. जंतर-मंतर की ओर जाने वाली प्रत्येक सड़क को बैरिकेड्स लगाकर बंद कर दिया गया था, और प्रत्येक स्थान पर 20-30 सशस्त्र पुलिस और सुरक्षा बल के जवानों को तैनात किया गया था.

एक अधिकारी ने कहा, "इस तरह के संसाधन अनिश्चित काल के लिए उपलब्ध नहीं हो सकते हैं. लगातार कई दिनों तक पूरे इलाके को बंद रखना असंभव है."

अधिकारियों का तर्क है कि आने वाले दिनों में इलाके में सुरक्षा बलों की मौजूदगी बनी रह सकती है, लेकिन इस मुद्दे के लिए एक राजनीतिक समाधान की आवश्यकता है और इसे केवल "कानून और व्यवस्था" की स्थिति के रूप में नहीं देखा जा सकता.

एक अन्य सरकारी अधिकारी ने कहा, "सीजेपी द्वारा 20 जुलाई को बुलाए गए विरोध प्रदर्शन से सबक लेते हुए इस बार कई सावधानियां बरती गईं. हालांकि भीड़ का एक वर्ग गैर-राजनीतिक था, लेकिन आम आदमी पार्टी और वामपंथी समूहों के कैडरों की भी काफी मौजूदगी थी, और हिंसा होने की आशंका जताई गई थी."

बड़ी चुनौती

अधिकारी ने कहा कि प्रशासन के लिए तात्कालिक चुनौतियों में से एक ऐसी भीड़ थी जो किसी नेता या बड़ी शख्सियत की अगुवाई का इंतजार नहीं कर रही थी. शनिवार सुबह दिल्ली हवाई अड्डे पर एयर इंडिया की फ्लाइट उतरते ही सीजेपी नेताओं अभिजीत दिपके, आशुतोष रांका और सौरव दास को पुलिस द्वारा हिरासत में लिए जाने का जमीन पर कोई खास असर नहीं पड़ा.

पश्चिम दिल्ली के पीतमपुरा की कानून की छात्रा खुशबू, जो शनिवार को कनॉट प्लेस पहुँचने के लिए मीलों पैदल चलीं और मेट्रो, ऑटो-रिक्शा व बस के बीच चक्कर लगाती रहीं, ने कहा, "यह जरूरी नहीं है कि हमारा कोई नेता हो. हम उस उद्देश्य को जानते हैं जिसके लिए हम यहाँ आए हैं. अंग्रेजों ने भी लोगों को जेल में डाला था. अगर आप (सरकार) हमारी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं, तो आपको हमें सुरक्षा देनी चाहिए, न कि हमें पिंजरे में बंद करने की कोशिश करनी चाहिए. हमने पुलिस से कहा कि हम किताबें खरीदने जा रहे हैं."

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