सुशांत सिंह | मजबूत भारत के लिए संस्थानों पर कब्जे को पलटना जरूरी
‘द मॉर्निंग कॉन्टेक्स्ट’ में सुशांत सिंह लिखते हैं कि सत्तारूढ़ दल का सरकारी संस्थानों पर नियंत्रण अब सामान्य शासन व्यवस्था जैसा दिखाई देने लगा है. भारत के संवैधानिक लोकतंत्र को बहाल करने के लिए संस्थानों की स्वतंत्रता पर हुए इस कब्जे को पलटना जरूरी है.
स्टीवन लेवित्स्की और डैनियल ज़िब्लाट ने अपनी पुस्तक हाउ डेमोक्रेसीज़ डाई में लिखा है कि लोकतंत्र हमेशा सैन्य जनरलों के हाथों नहीं मरता, बल्कि निर्वाचित नेता भी उसे कमजोर कर सकते हैं. कई बार यह प्रक्रिया तेजी से होती है, लेकिन अक्सर लोकतंत्र धीरे-धीरे और ऐसे कदमों के जरिए कमजोर होता है, जिनका असर तुरंत दिखाई नहीं देता.
भारत में लोकतांत्रिक संकट किसी घोषित आपातकाल या सैन्य तख्तापलट के रूप में सामने नहीं आया है. इसके संकेत मतदाता सूची से नाम हटाए जाने, सुनवाई में देरी, कर नोटिस, आधी रात को गिरफ्तारियों, मीडिया संस्थानों की चुप्पी, राज्यपालों द्वारा विधेयकों को रोकने, विपक्षी नेताओं के खिलाफ जांच और संवैधानिक पदों पर ऐसी नियुक्तियों में दिखाई देते हैं, जिनसे सत्तारूढ़ दल को लाभ मिल सकता है.
इन घटनाओं को अलग-अलग देखने के बजाय उनके साझा प्रभाव को समझना जरूरी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार पर आरोप है कि उसने संवैधानिक ढांचे को खत्म किए बिना उन संस्थानों की स्वतंत्रता, विश्वसनीयता और नैतिक अधिकार को लगातार कमजोर किया है, जिन्हें सत्ता पर नियंत्रण रखने की जिम्मेदारी दी गई है.
चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर सवाल
चुनाव आयोग में नियुक्तियों के नियम बदलने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के बहुमत वाली समिति ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की. इनमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार भी शामिल हैं. वह एक सेवानिवृत्त नौकरशाह हैं, जिन्होंने जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाने और अयोध्या में बाबरी मस्जिद के ध्वंस स्थल पर राम मंदिर निर्माण जैसी महत्वपूर्ण राजनीतिक परियोजनाओं में भूमिका निभाई थी.
ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल में 13 करोड़ मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने का दावा किया गया है. आलोचकों ने इस प्रक्रिया को अपारदर्शी और गैरकानूनी बताया है. मतदाताओं के नाम शामिल करने में बूथ स्तर के अधिकारियों की वैधानिक शक्तियों को कथित तौर पर दिल्ली स्थित चुनाव आयोग की आईटी इकाई द्वारा संचालित केंद्रीकृत डिजिटल प्रक्रिया से कमजोर किया गया.
पश्चिम बंगाल में न्यायिक अधिकारियों ने जिन मतदाताओं के नाम बहाल किए, उनके आदेशों को चुनाव आयोग की ओर से केंद्रीय स्तर पर डिजिटल तरीके से तैयार अपीलों के जरिए चुनौती दी गई. कई राज्यों में भाजपा ने फॉर्म-7 के तहत बड़ी संख्या में आपत्तियां दर्ज कर मुस्लिम मतदाताओं की नागरिकता पर सवाल उठाए. इन प्रक्रियाओं में भी डिजिटल माध्यमों की भूमिका रही.
मीडिया रिपोर्टों और विरोध प्रदर्शनों के बाद चुनाव आयोग ने सुधारात्मक कदम उठाए, लेकिन अब मतदाता सूची से नाम कटने वाले व्यक्ति को फॉर्म-6 भरने के लिए कहा जा रहा है. यह वही फॉर्म है, जिसका इस्तेमाल नए मतदाता पंजीकरण के लिए होता है. यानी पहले से पंजीकृत व्यक्ति को ऐसे आवेदन के लिए मजबूर किया जा रहा है, मानो उसका नाम पहले कभी सूची में था ही नहीं. इससे नाम हटाए जाने के बाद उसे दोबारा शामिल कराने की जिम्मेदारी मतदाता पर आ जाती है. इस स्थिति के खिलाफ देशभर में प्रदर्शन हुए और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग उठी.
न्यायपालिका और संस्थागत जवाबदेही
चुनाव आयोग पर राजनीतिक नियंत्रण बढ़ने की प्रक्रिया में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका पर भी सवाल उठे हैं. पिछले दशक में अदालत ने कई मामलों में कार्यपालिका की शक्ति पर प्रभावी अंकुश नहीं लगाया, संवैधानिक महत्व की सुनवाइयों में देरी हुई या नुकसान हो जाने के बाद सीमित राहत दी गई.
मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश वाले निष्पक्ष पैनल के जरिए होनी चाहिए. लेकिन बाद में सरकार कानून में संशोधन करके मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा चुने गए केंद्रीय मंत्री को ले आई. सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून पर रोक नहीं लगाई और न ही उसे रद्द किया. इससे चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर कार्यपालिका का नियंत्रण फिर मजबूत हो गया.
कानूनविद् तरुणाभ खेतान ने अपनी 2019 की अकादमिक शोधपत्र में इस प्रक्रिया को ‘हजारों कट लगाकर संविधान की हत्या’ की संज्ञा दी थी. लोकतंत्र में जवाबदेही के तीन प्रमुख माध्यम हैं—मतदाताओं और संसद के प्रति जवाबदेही, अदालतों और स्वतंत्र संस्थानों के जरिए निगरानी तथा मीडिया, विश्वविद्यालयों और नागरिक समाज की सार्वजनिक आलोचना. आरोप है कि मोदी सरकार ने दक्षता, सुशासन और अतिराष्ट्रवाद की भाषा का इस्तेमाल करते हुए इन तीनों माध्यमों को धीरे-धीरे कमजोर किया.
जांच एजेंसियों और संसद की भूमिका
प्रवर्तन निदेशालय, केंद्रीय जांच ब्यूरो और आयकर विभाग जैसी संस्थाओं को वित्तीय अपराध, भ्रष्टाचार और कर चोरी की जांच करनी होती है. लेकिन विपक्षी नेताओं के खिलाफ छापे, गिरफ्तारियां, लंबी जांच और वित्तीय दबाव के इस्तेमाल को लेकर पक्षपात के आरोप लगे हैं. लेख में अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र एवं निर्वाचन सहायता संस्थान (इंटरनेशनल आइडिया) की रिपोर्ट का उल्लेख है, जिसमें भारत में न्यायिक स्वतंत्रता और राजनीतिक दलों की स्वतंत्रता में गिरावट दर्ज की गई है. रिपोर्ट के मुताबिक, 2014 के बाद प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई का सामना करने वाले 90 प्रतिशत से अधिक राजनीतिक व्यक्ति विपक्षी दलों से जुड़े रहे हैं. इसके उलट, भाजपा में शामिल होने वाले कुछ नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच रुकने या समाप्त होने के आरोप भी लगाए गए हैं.
संसद की भूमिका भी कमजोर होने की बात कही गई है. 2019 के बाद से लोकसभा में उपाध्यक्ष का चुनाव नहीं हुआ है. भूमि अधिकारों, श्रम कानूनों, आपराधिक प्रक्रिया और राज्यों की सीमाओं से जुड़े बड़े विधेयक सीमित बहस, संसदीय समितियों की जांच को दरकिनार करके और कई बार ध्वनिमत से पारित किए गए. विपक्षी सांसदों के सामूहिक निलंबन के कारण भी कई कानूनों पर पर्याप्त संसदीय चर्चा नहीं हो सकी.
केंद्र की वित्तीय शक्तियों के इस्तेमाल, योजना आयोग को समाप्त करने, अनुदानों के वितरण, जीएसटी मुआवजे को लेकर विवाद और राज्यपालों के जरिए राज्य सरकारों के कामकाज में बाधा डालने को भी संघीय व्यवस्था में बदलाव के संकेत के रूप में देखा गया है. भारत राज्यों का संघ है, लेकिन आरोप है कि केंद्र में चुनावी जीत को राज्य सरकारों पर राजनीतिक वर्चस्व के अधिकार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है.
मीडिया और नागरिक स्वतंत्रता पर असर
भारत में स्वतंत्र पत्रकारिता अब भी मौजूद है, लेकिन कई पत्रकारों और संस्थानों को पेशेवर तथा व्यक्तिगत जोखिम उठाने पड़ते हैं. ‘द कारवां’, ‘द वायर’, ‘स्क्रोल’, ‘आर्टिकल 14’ और ‘द न्यूज मिनट’ जैसे संस्थान सत्ता के दुरुपयोग से जुड़े मामलों को सामने लाते रहे हैं.
दूसरी ओर, मीडिया में कॉरपोरेट स्वामित्व का केंद्रीकरण, सरकारी विज्ञापनों पर निर्भरता, मंत्रियों और अधिकारियों तक चुनिंदा पहुंच, नए कानूनों के जरिए नियामकीय दबाव, पत्रकारों के खिलाफ आपराधिक मामले, कर छापे और ऑनलाइन उत्पीड़न ने स्वतंत्र पत्रकारिता के माहौल को प्रभावित किया है. इसका परिणाम पूर्ण सेंसरशिप के बजाय आत्म-सेंसरशिप, संपादकीय संकोच और सरकारी दावों को सामान्य रूप से स्वीकार करने के रूप में सामने आया है.
फ्रीडम हाउस की 2026 की रिपोर्ट में भारत को 100 में 62 अंकों के साथ ‘आंशिक रूप से स्वतंत्र’ बताया गया है. वी-डेम की रिपोर्ट भारत को ‘चुनावी निरंकुशता’ की श्रेणी में रखती है, जबकि इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट इसे ‘त्रुटिपूर्ण लोकतंत्र’ मानती है. ये रेटिंग अंतिम निर्णय नहीं हैं, लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थिति को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दर्ज चिंताओं के संकेतक हैं.
भारत की संवैधानिक व्यवस्था की कीमत
संविधान की मूल भावना यह है कि कानून सभी पर समान रूप से लागू हो, चाहे व्यक्ति की पार्टी, धर्म, जाति, लिंग, संपत्ति या विचारधारा कुछ भी हो. चुनाव आयोग का काम मतदाता की रक्षा करना है, जांच एजेंसियों का काम सबूतों के आधार पर अपराध की जांच करना है, राज्यपालों को निर्वाचित सरकारों का सम्मान करना चाहिए और न्यायपालिका को सरकार की पसंद से स्वतंत्र होकर काम करना चाहिए.
लेकिन आलोचकों का कहना है कि 2014 के बाद यह भरोसा कमजोर हुआ है. अल्पसंख्यकों, असहमति जताने वालों, कार्यकर्ताओं, छात्रों और विपक्षी समर्थकों को सरकारी शक्ति का सामना अक्सर पक्षपातपूर्ण दमन के रूप में करना पड़ता है.
भाजपा की बहुसंख्यकवादी राजनीति इस संस्थागत नियंत्रण को सामाजिक आधार देती है. हिंदुत्व केवल संस्कृति या धर्म से जुड़ा वैचारिक कार्यक्रम नहीं है, बल्कि इसके जरिए ‘असली राष्ट्र’ और ‘संदिग्ध नागरिक’ के बीच विभाजन भी बनाया जाता है. आलोचकों को राष्ट्रविरोधी, विपक्ष को विकास में बाधा और मुस्लिम नागरिकों को जनसांख्यिकीय या सुरक्षा समस्या के रूप में पेश किया जा सकता है. इस भाषा के जरिए संवैधानिक नियंत्रणों को राष्ट्रीय हित के खिलाफ बाधा बताना आसान हो जाता है.
इसका अंतरराष्ट्रीय असर भी पड़ा है. भारत दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश, बड़ी अर्थव्यवस्था और अमेरिका तथा यूरोप का रणनीतिक साझेदार है. वह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और स्वयं को वैश्विक दक्षिण की आवाज बताता है. लेकिन लोकतांत्रिक विश्वसनीयता भारत की सॉफ्ट पावर का अहम हिस्सा रही है. जब अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं लोकतांत्रिक संस्थानों के कमजोर होने की बात करती हैं, तो चीन की निरंकुश व्यवस्था के मुकाबले भारत के लोकतांत्रिक विकल्प होने के दावे को बनाए रखना कठिन हो जाता है.
राजनीतिक निष्ठा को योग्यता और संस्थागत ईमानदारी से ऊपर रखने पर प्रशासनिक क्षमता भी कमजोर होती है. मनमाने नियामकीय फैसले, राजनीतिक जांच और कमजोर न्यायपालिका विदेशी निवेशकों के लिए कानूनी अनिश्चितता पैदा कर सकते हैं.
संस्थानों की स्वतंत्रता बहाल करने की चुनौती
स्थिति गंभीर होने के बावजूद भारत ऐसे बिंदु पर नहीं पहुंचा है, जहां लोकतांत्रिक सुधार असंभव हो गए हों. 2024 के चुनाव में मतदाताओं ने भाजपा का पूर्ण संसदीय बहुमत छीन लिया और गठबंधन राजनीति का महत्व फिर सामने आया. दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और अन्य शहरों में युवाओं के हालिया प्रदर्शन भी सार्वजनिक असहमति की मौजूदगी दिखाते हैं.
हालांकि, केवल किसी एक प्रदर्शन या भविष्य के चुनाव से संस्थागत नुकसान अपने आप ठीक नहीं होगा. इसके लिए पारदर्शी नियुक्तियां, कानून में स्पष्ट सुरक्षा उपाय, न्यायपालिका की त्वरित कार्रवाई, स्वतंत्र मीडिया, संघीय व्यवस्था का सम्मान और जांच एजेंसियों की जवाबदेही बहाल करनी होगी.
सबसे जरूरी यह सुनिश्चित करना है कि राज्य किसी एक राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं है. मोदी सरकार के दौर में संस्थानों पर नियंत्रण को सामान्य शासन व्यवस्था की तरह पेश किया गया है. भारत के सामने संवैधानिक लोकतंत्र की रक्षा के लिए इस प्रक्रिया को स्पष्ट रूप से पहचानने, शांतिपूर्ण तरीके से उसका विरोध करने और कानून के दायरे में संस्थानों की स्वतंत्रता बहाल करने की चुनौती है.

