असम सरकार ने चार महीने पहले दो महिलाओं को बांग्लादेश भेजा, परिवारों को अब तक नहीं पता उनका ठिकाना

विदेशी घोषित किए जाने के बाद मुमताज बेगम और जहांआरा बेगम को अपील का मौका मिलने से पहले ही सीमा पार भेज दिया गया. गुवाहाटी हाईकोर्ट ने माना कि राज्य की कार्रवाई के कारण उन्हें न्यायाधिकरण के फैसलों को चुनौती देने का उचित अवसर नहीं मिला. चार महीने बाद भी उनके परिवारों को उनकी कोई जानकारी नहीं है.

'आर्टिकल 14' में साहिल हुसैन चौधरी की रिपोर्ट के मुताबिक, 14 जून 2026 की आधी रात के कुछ समय बाद असम के कछार जिले में भारत-बांग्लादेश सीमा के एक रास्ते से मुमताज बेगम और जहांआरा बेगम को बांग्लादेश भेज दिया गया. सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक, दोनों महिलाओं को विदेशी न्यायाधिकरण, पुलिस थानों और कई हिरासत केंद्रों से होते हुए सीमा तक पहुंचाया गया. चार महीने बीत जाने के बाद भी उनके परिवारों को नहीं पता कि वे कहां हैं.

43 वर्षीय मुमताज नगांव जिले के जुरिया इलाके के ढिंग गांव की निवासी थीं. वह चार बच्चों की मां हैं. वहीं, 47 वर्षीय जहांआरा इसी इलाके के बगरिगुड़ी गांव में रहती थीं. उनके बेटे मोमरुज अली और मोहम्मद मुजाहिदुल इस्लाम का कहना है कि मई में पुलिस द्वारा उनकी मां को हिरासत में लिए जाने के बाद से उनका उनसे कोई संपर्क नहीं हुआ है.

7 अक्टूबर को 'द टाइम्स ऑफ इंडिया' ने खबर दी कि असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने मुमताज के सुरक्षित होने और रोजाना अपने बेटे से बात करने की जानकारी दी थी. हालांकि, मुमताज के बेटे मोमरुज अली ने इस दावे को खारिज किया. उन्होंने कहा कि उनकी मां से उनकी कोई बात नहीं हुई है और न ही पुलिस या किसी सरकारी विभाग ने उनके ठिकाने की जानकारी दी है. उन्होंने कहा, “हमें राजनीति नहीं चाहिए. हमें सिर्फ यह जानना है कि हमारी मां कहां हैं.”

गुवाहाटी हाईकोर्ट ने 7 अक्टूबर के आदेश में दर्ज किया कि विदेश मंत्रालय से मिले निर्देशों और एक पत्र के अनुसार, दोनों महिलाओं का पता लगाने के लिए जांच की जा रही है. केंद्र सरकार ने इसके लिए और समय मांगा है. हालांकि, अदालत के सार्वजनिक आदेशों में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि महिलाओं को तलाशने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं या भारत ने बांग्लादेश से औपचारिक रूप से संपर्क किया है या नहीं.

दोनों महिलाओं को पहली बार 2019 में नगांव जिले के एक विदेशी न्यायाधिकरण ने विदेशी घोषित किया था. असम में ऐसे 100 न्यायाधिकरण हैं, जो विदेशी (न्यायाधिकरण) आदेश, 1964 के तहत गठित किए गए हैं. मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के विधानसभा में दिए गए बयान के मुताबिक, 31 मई 2026 तक इन न्यायाधिकरणों ने 1,72,673 लोगों को विदेशी घोषित किया था और 73,759 मामले लंबित थे.

मुमताज और जहांआरा ने 2019 के फैसलों को गुवाहाटी हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. अप्रैल 2026 में अदालत ने दोनों फैसलों को रद्द कर दिया. मुमताज के मामले में अदालत ने पाया कि न्यायाधिकरण ने उनके सभी साक्ष्यों पर विचार नहीं किया था. वहीं, जहांआरा के मामले में चार में से तीन गवाहों की गवाही पर ध्यान नहीं दिया गया था. अदालत ने मामलों को नए सिरे से विचार के लिए न्यायाधिकरण के पास भेज दिया, लेकिन दोनों महिलाओं को भारतीय नागरिक घोषित नहीं किया.

जहांआरा 29 मई और मुमताज 30 मई को दोबारा न्यायाधिकरण के सामने पेश हुईं. न्यायाधिकरण ने फिर दोनों को विदेशी घोषित कर दिया. असम पुलिस ने नए आदेशों की प्रतियां दिए बिना ही उन्हें हिरासत में ले लिया और बाद में सीमा पुलिस के हवाले कर दिया. परिवारों ने 2 जून को आदेशों की प्रमाणित प्रतियों के लिए आवेदन किया और 5 जून को उन्हें ये दस्तावेज मिले. लेकिन तब तक दोनों महिलाओं को हिरासत केंद्रों से दूसरी जगह भेजा जा चुका था.

जहांआरा के बेटे मुजाहिदुल 2 जून को गोलपाड़ा स्थित मटिया हिरासत केंद्र में उनसे मिले थे. 5 जून को जब वह वकालतनामा पर अपनी मां के हस्ताक्षर लेने पहुंचे, ताकि वकील उनकी ओर से अदालत में पैरवी कर सके, तब तक उन्हें वहां से हटा दिया गया था. मुमताज का परिवार भी 5 जून को मटिया पहुंचा, लेकिन उन्हें भी वहां नहीं पाया. दोनों महिलाओं को 3 जून को करीब 400 किलोमीटर दूर श्रीभूमि स्थित दूसरे हिरासत केंद्र में भेज दिया गया था. 13 जून को असम सीमा पुलिस ने उन्हें बीएसएफ के हवाले किया और अगली रात उन्हें बांग्लादेश भेज दिया गया.

विदेशी न्यायाधिकरण के फैसले के खिलाफ कोई सामान्य वैधानिक अपील नहीं होती. संबंधित व्यक्ति को हाईकोर्ट में याचिका दायर कर फैसले की वैधता को चुनौती देनी होती है. इसके लिए महिलाओं का पता लगाना, उनसे निर्देश लेना और कानूनी प्रतिनिधित्व की व्यवस्था करना जरूरी था. लेकिन राज्य की हिरासत में रहते हुए उन्हें लगातार अलग-अलग स्थानों पर भेजा जाता रहा.

3 सितंबर को गुवाहाटी हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य की सरकारी मशीनरी ने मिलकर दोनों महिलाओं को समय पर अदालत पहुंचने और नए आदेशों को चुनौती देने से रोका. अदालत ने महिलाओं को 24 घंटे के भीतर अपनी मर्जी से भारत छोड़ने का दिया गया निर्देश 'दिखावटी' करार दिया, क्योंकि उस समय वे पहले से ही सरकारी हिरासत में थीं. अदालत ने असम सरकार को मुमताज के पति और जहांआरा के बेटे को दो-दो लाख रुपये अंतरिम मुआवजा देने का निर्देश भी दिया. हालांकि, 8 अक्टूबर तक दोनों परिवारों को यह राशि नहीं मिली थी. मुमताज के परिवार ने कानूनी कार्यवाही और यात्रा पर करीब 1.5 लाख रुपये खर्च किए हैं.

'द टाइम्स ऑफ इंडिया' की पत्रकार इस्मत आरा ने बांग्लादेश में भी महिलाओं की तलाश शुरू की. 29 सितंबर को प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, अखबार की ओर से अधिकारियों से संपर्क किए जाने के बाद बांग्लादेश के गृह मंत्रालय ने मुमताज की तलाश शुरू की थी. सिलहट पुलिस ने उनकी खोज की, लेकिन कोई सुराग नहीं मिला. उनकी तस्वीर और पहचान संबंधी जानकारी बांग्ला अखबारों में भी प्रकाशित की गई. बांग्लादेशी अधिकारियों ने बताया था कि वे भारत की ओर से औपचारिक सूचना मिलने का इंतजार कर रहे हैं.

हाईकोर्ट ने 14 अक्टूबर को विदेश मंत्रालय और असम सरकार को दोनों महिलाओं का पता लगाने के लिए फिर निर्देश दिया. मामले की अगली सुनवाई 6 नवंबर को होनी है. इससे पहले भी बांग्लादेश भेजे गए लोगों की वापसी के उदाहरण सामने आए हैं. 2025 में असम सरकार पूर्व शिक्षक खैरुल इस्लाम को भारत वापस लाई थी, क्योंकि उनकी याचिका सुप्रीम कोर्ट में लंबित थी. इसी तरह, कलकत्ता हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद पश्चिम बंगाल के छह लोगों को भी बांग्लादेश से वापस लाया गया था.

जहांआरा के वकील जाहिदुल हक ने बताया कि वह खुद मोबाइल फोन का इस्तेमाल नहीं कर सकतीं, इसलिए उनके लिए परिवार से संपर्क करना मुश्किल है. उनके पति दूसरी शादी कर अलग रहते हैं और उनका बेटा मुजाहिदुल ही उनकी कानूनी लड़ाई लड़ रहा है. वकील के मुताबिक, पुलिस ने 29 मई को दोपहर करीब एक बजे सुनवाई के बाद जहांआरा को हिरासत में ले लिया था, जबकि न्यायाधिकरण का लिखित आदेश शाम चार से साढ़े चार बजे के बीच तैयार हुआ था.

हाईकोर्ट ने असम सरकार से दोनों आदेशों के तैयार होने की तारीख और समय बताने को कहा था, ताकि यह पता लगाया जा सके कि महिलाओं को हिरासत में लेने से पहले फैसले तैयार हुए थे या नहीं. 7 अक्टूबर को अदालत ने चेतावनी दी कि अगली सुनवाई तक जानकारी नहीं दी गई तो वह मानेगी कि हिरासत में लिए जाने से पहले आदेश तैयार नहीं थे. 14 अक्टूबर को असम सरकार ने बताया कि उसे दोनों मामलों की जांच रिपोर्ट मिल गई है और उन्हें दाखिल करने के लिए समय चाहिए. अदालत ने इसकी अनुमति दे दी.

हाईकोर्ट ने अभी यह तय नहीं किया है कि मुमताज और जहांआरा भारतीय नागरिक हैं या नहीं. न्यायाधिकरण के नए फैसले न्यायिक जांच के बाद बरकरार भी रह सकते हैं. लेकिन दोनों महिलाओं को उन फैसलों को चुनौती देने का प्रभावी अवसर क्यों नहीं मिला और बांग्लादेश भेजे जाने के बाद उनके साथ क्या हुआ, इन सवालों के जवाब अब भी नहीं मिले हैं.

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