अजय कुमार मिश्रा | भारत के शहरी परिवहन में सार्वजनिक और निजी साधनों की उपयोगिता कैसे तय करते हैं समय, भौगोलिक बनावट और वर्ग

सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (एमओएसपीआई) के राष्ट्रीय घरेलू यात्रा सर्वेक्षण (एनएचटीएस) के अनुसार, भारत में केवल 9 प्रतिशत लोग काम पर जाने के लिए सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करते हैं. इसके मुकाबले 43 प्रतिशत लोग दोपहिया वाहनों और 3 प्रतिशत लोग कारों से यात्रा करते हैं. ये आंकड़े निजी परिवहन पर बढ़ती निर्भरता को दर्शाते हैं.

भारत के छोटे शहरों में बसों का इंतजार, देरी, अनियमित समय-सारणी और सड़कों का खराब संपर्क लोगों को निजी वाहनों की ओर धकेल रहा है. अनियोजित शहरी विकास के कारण गलियां और सड़कें संकरी होती जा रही हैं. इससे सार्वजनिक परिवहन की पहुंच सीमित हो रही है और यात्रियों का इंतजार बढ़ रहा है. परिणामस्वरूप, जिन लोगों के पास निजी वाहन खरीदने की क्षमता है, वे सार्वजनिक परिवहन छोड़ रहे हैं, जबकि बड़ी आबादी को खराब सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था पर निर्भर रहना पड़ता है.

इस स्थिति में सार्वजनिक और निजी परिवहन की उपयोगिता को केवल वाहनों की उपलब्धता के आधार पर नहीं समझा जा सकता. इसके लिए समय, शहरों की भौगोलिक बनावट और सामाजिक-आर्थिक वर्गों की भूमिका को भी देखना जरूरी है. किसी इलाके में बस सेवा की उपलब्धता केवल सड़कों की संख्या पर निर्भर नहीं करती, बल्कि उनकी चौड़ाई और आपसी संपर्क पर भी निर्भर करती है, ताकि बसें आसानी से वहां पहुंच सकें.

सार्वजनिक परिवहन से दूरी, निजी वाहनों की ओर रुझान

सार्वजनिक परिवहन में देरी और अनिश्चितता से कामकाजी लोगों की उत्पादकता प्रभावित होती है. ऐसे में वे समय बचाने के लिए निजी वाहनों का विकल्प चुनते हैं. अर्थशास्त्री अल्बर्ट हिर्शमैन ने अपनी प्रसिद्ध 'एग्जिट और वॉयस' अवधारणा में बताया था कि किसी सेवा की गुणवत्ता गिरने पर उपभोक्ता या तो उसकी बेहतरी के लिए आवाज उठाते हैं या उसे छोड़कर दूसरा विकल्प अपना लेते हैं.

बिजली की अनियमित आपूर्ति लोगों को इन्वर्टर और जनरेटर खरीदने के लिए प्रेरित करती है. पानी की समस्या के कारण बोरवेल और टैंकर का इस्तेमाल बढ़ता है. इसी तरह, सार्वजनिक परिवहन की खराब व्यवस्था लोगों को निजी वाहनों की ओर ले जाती है.

निजी वाहन रखने वाले लोग सार्वजनिक परिवहन में सुधार की मांग करने के बजाय उससे दूरी बना लेते हैं. इससे व्यवस्था को बेहतर बनाने का दबाव भी कम होता है. हालांकि, जब बड़ी संख्या में लोग निजी वाहन अपनाते हैं, तो सड़कें जाम हो जाती हैं. इस तरह व्यक्तिगत सुविधा सामूहिक परेशानी में बदल जाती है. यह स्थिति निजी विकल्पों की सामूहिक विफलता को दर्शाती है.

सार्वजनिक और निजी परिवहन में समय और पैसे का विरोधाभास

निजी परिवहन अपनाने का एक प्रमुख कारण समय बचाना है, लेकिन निजी वाहनों की बढ़ती संख्या अंततः यात्रा को महंगा और धीमा बना देती है. अधिक वाहन सड़कों पर जाम बढ़ाते हैं, जिससे ईंधन की खपत, यात्रा खर्च और प्रदूषण में वृद्धि होती है.

राष्ट्रीय घरेलू यात्रा सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में एक निश्चित कार्यस्थल पर जाने वाले कर्मचारी का औसत मासिक यात्रा खर्च 785 रुपये है. शहरी कर्मचारियों के लिए यह खर्च 1,044 रुपये, जबकि ग्रामीण कर्मचारियों के लिए 612 रुपये है.

इसके विपरीत, सार्वजनिक परिवहन से ईंधन खर्च, कार्बन उत्सर्जन और सड़कों पर दबाव कम किया जा सकता है. लेकिन अनियोजित शहरी विकास ने कई भारतीय शहरों में निजी वाहनों के इस्तेमाल को अधिक सुविधाजनक बना दिया है. संकरी सड़कों और लंबे बस मार्गों के कारण सार्वजनिक बसों का इंतजार बढ़ता है. कई गलियों में बसें पहुंच ही नहीं पातीं. ऐसे में लोग निजी परिवहन को प्राथमिकता देते हैं.

परिवहन के चुनाव में वर्गीय असमानता

भारत में सार्वजनिक परिवहन की खराब स्थिति का असर सभी वर्गों पर समान रूप से नहीं पड़ता. कामकाजी और आर्थिक रूप से कमजोर तबके के लोग रोजमर्रा की यात्रा के लिए सार्वजनिक परिवहन पर निर्भर हैं. दूसरी ओर, संपन्न वर्ग अपनी सुविधा और क्षमता के अनुसार निजी वाहन चुन सकता है.

सार्वजनिक सड़कों पर निजी कारों की बढ़ती संख्या गरीब और वंचित तबकों के लिए उपलब्ध सड़क स्थान को भी सीमित करती है. इससे वर्ग और जाति आधारित असमानताएं गहरी होती हैं. विशेष रूप से दिहाड़ी मजदूरों और असंगठित क्षेत्र के कामगारों के लिए यात्रा में लगने वाला समय उनकी आर्थिक स्थिति को प्रभावित करता है. इसके बावजूद उत्पादन लागत की गणना में उनके यात्रा समय और उससे होने वाले नुकसान को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता.

नतीजतन, नियमित वेतन पाने वाले लोग सार्वजनिक परिवहन छोड़कर निजी वाहनों की ओर बढ़ते हैं, जबकि दिहाड़ी और अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों के पास खराब सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करने के अलावा सीमित विकल्प बचते हैं. इस तरह परिवहन का चुनाव व्यक्तिगत सुविधा से आगे बढ़कर वर्ग आधारित असमानता का रूप ले लेता है. संपन्न लोगों के पास निजी परिवहन चुनने का विकल्प है, जबकि गरीब तबके को अक्सर अविश्वसनीय सार्वजनिक परिवहन पर निर्भर रहना पड़ता है.

निष्कर्ष और नीतिगत सुझाव

अनियमित सार्वजनिक परिवहन लोगों को निजी वाहनों की ओर धकेलता है. निजी वाहनों की बढ़ती संख्या सड़कों पर जाम पैदा करती है और अंततः सार्वजनिक तथा निजी, दोनों तरह के परिवहन को प्रभावित करती है. अनियोजित शहरी विकास इस समस्या को और गंभीर बनाता है. इसके साथ ही, श्रमिकों के यात्रा समय और उससे होने वाली उत्पादकता की हानि को उत्पादन लागत में शामिल न करना भी इस समस्या को बनाए रखता है.

इस स्थिति से निपटने के लिए सार्वजनिक परिवहन को सस्ता, भरोसेमंद और सुलभ बनाना जरूरी है. नीतियां बनाते समय यात्रा में लगने वाले समय और उससे होने वाली उत्पादकता की हानि को भी आर्थिक लागत के रूप में शामिल किया जाना चाहिए.

छोटे शहरों में ऐसी बहु-माध्यमीय परिवहन व्यवस्था विकसित करने की जरूरत है, जिसमें छोटी बसें उन मोहल्लों तक पहुंच सकें जहां बड़ी बसें नहीं जा पातीं. ई-रिक्शा, साझा ऑटो और दूसरे छोटे वाहनों को भी बेहतर नियमन के साथ सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था का हिस्सा बनाया जाना चाहिए. इससे मुख्य सड़कों और अंदरूनी इलाकों के बीच संपर्क मजबूत हो सकता है. साथ ही, पैदल यात्रियों और साइकिल चालकों के लिए सुरक्षित और सुविधाजनक रास्ते विकसित करना भी जरूरी है.

अंततः, भारत की शहरी परिवहन व्यवस्था को केवल वाहनों की संख्या या सड़क निर्माण के आधार पर नहीं देखा जा सकता. समय, भौगोलिक बनावट और वर्गीय असमानता को ध्यान में रखे बिना सार्वजनिक परिवहन को प्रभावी नहीं बनाया जा सकता. यदि सरकारें इन पहलुओं पर ध्यान नहीं देतीं, तो निजी वाहनों पर निर्भरता बढ़ेगी और शहरी यातायात की समस्या आम नागरिकों के लिए और गंभीर होती जाएगी.

(अजय कुमार मिश्रा दरभंगा स्थित ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र पढ़ाते हैं. यह ‘काउंटरकरंट्स’ प्रकाशित उनके मूल अंग्रेजी लेख का हिंदी में अनुदित अंश है,)

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