श्रवण गर्ग | छात्रों की गूंज में सिर्फ राजनीति नहीं, बेचैनी भी है
'हरकारा डीप डाइव' में निधीश त्यागी ने वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग के साथ राहुल गांधी के 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम, युवाओं के बीच दिखाई दे रही नाराजगी, दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव और विरोध प्रदर्शनों से निपटने के तरीके पर चर्चा की. बातचीत का केंद्र यह सवाल रहा कि क्या छात्रों और युवाओं के बीच उभर रही बेचैनी को सिर्फ किसी राजनीतिक दल या चुनावी समर्थन के नजरिए से देखा जाना चाहिए, या इसके पीछे व्यापक सामाजिक और राजनीतिक असंतोष के संकेत भी हैं.
इंदौर में हुए 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम का जिक्र करते हुए श्रवण गर्ग ने कहा कि यह इस श्रृंखला का पांचवां आयोजन था. इससे पहले कोटा, देहरादून, प्रयागराज और पुणे में ऐसे कार्यक्रम हो चुके हैं. उनके मुताबिक, इन सभी आयोजनों में एक समान पैटर्न दिखाई देता है. आयोजन की अनुमति, स्थल और प्रशासनिक स्तर पर पैदा की जाने वाली अड़चनें एक तरफ हैं, जबकि दूसरी तरफ बड़ी संख्या में छात्रों की मौजूदगी यह दिखाती है कि युवाओं के बीच कई मुद्दों को लेकर असंतोष मौजूद है.
उन्होंने इस नाराजगी को सीधे तौर पर किसी चुनावी जनादेश या कांग्रेस के पक्ष में समर्थन के रूप में देखने से सावधान किया. उनके मुताबिक, युवाओं में दिखाई दे रहा असंतोष फिलहाल गैर-राजनीतिक प्रकृति का है. छात्रों के कार्यक्रम में सिर्फ किसी पार्टी के पक्ष में वोट मांगने की बात नहीं हो रही, बल्कि परीक्षा, भर्ती, रोजगार और शिक्षा से जुड़े अनुभवों और समस्याओं को सामने रखा जा रहा है.
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव के नतीजों को लेकर भी चर्चा हुई. एनएसयूआई को कोई सीट नहीं मिलने और एक बागी उम्मीदवार के जीतने को श्रवण गर्ग ने कांग्रेस की संगठनात्मक समस्या के संदर्भ में देखा. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि इन नतीजों को 'छात्रों की गूंज' जैसे आयोजनों में दिखाई दे रही युवाओं की नाराजगी का सीधा खंडन नहीं माना जा सकता. छात्र राजनीति के चुनाव और व्यापक सामाजिक असंतोष दो अलग-अलग घटनाक्रम हो सकते हैं.
बातचीत का एक बड़ा हिस्सा विरोध प्रदर्शनों से निपटने के प्रशासनिक तरीकों पर रहा. श्रवण गर्ग ने 20 जुलाई के जंतर-मंतर प्रदर्शन का संदर्भ देते हुए कहा कि शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांग रखने वाले छात्रों से राजनीतिक संवाद होना चाहिए. उनका तर्क था कि प्रशासनिक प्रतिबंध और पुलिस कार्रवाई किसी मुद्दे को खत्म करने के बजाय उसे और व्यापक चर्चा का विषय बना सकते हैं.
इसी संदर्भ में उन्होंने इंदौर में कार्यक्रम के लिए अनुमति और सुरक्षा से जुड़ी शर्तों का भी उल्लेख किया. उनका सवाल था कि अलग-अलग शहरों में आयोजित कार्यक्रमों के साथ प्रशासन का व्यवहार समान क्यों नहीं रहा. उन्होंने कहा कि अगर युवाओं की मांगों को राजनीतिक तरीके से संबोधित किया जाए और उनसे बातचीत की जाए, तो टकराव की स्थिति पैदा होने से बच सकती है.
बातचीत में पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, असम, उत्तराखंड और अन्य राज्यों में विपक्ष और विरोध प्रदर्शनों से जुड़े घटनाक्रमों का भी उल्लेख आया. श्रवण गर्ग ने इन घटनाओं को एक व्यापक चिंता के संदर्भ में रखा और कहा कि विपक्ष तथा नागरिक आंदोलनों से निपटने में प्रशासनिक शक्ति के इस्तेमाल को लेकर सवाल उठ रहे हैं. उन्होंने इसे लोकतांत्रिक संवाद और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में देखने की जरूरत बताई.
उन्होंने युवाओं की बदलती राजनीतिक और सामाजिक अभिव्यक्ति का उदाहरण सोशल मीडिया और नए दौर के कॉमेडियन, कलाकारों और डिजिटल क्रिएटर्स के जरिए भी दिया. उनके मुताबिक, युवा पीढ़ी अब पारंपरिक राजनीतिक भाषणों से आगे जाकर अपनी भाषा और माध्यमों में असहमति व्यक्त कर रही है. यह बदलाव राजनीतिक दलों और सरकारों के लिए समझने योग्य संकेत हो सकता है.
बातचीत में छात्रों की समस्याओं को सामने लाने वाले कार्यक्रमों की एक खास बात पर भी चर्चा हुई. श्रवण गर्ग ने कहा कि इन आयोजनों में नेताओं के भाषण से ज्यादा छात्रों की अपनी आवाज सुनाई दे रही है. परीक्षा नहीं दे पाने, भर्ती नहीं होने, अवसर छूट जाने और शिक्षा से जुड़ी परेशानियों को छात्र स्वयं सामने रख रहे हैं. उनके मुताबिक, इन आवाजों को केवल राजनीतिक प्रचार के नजरिए से देखने के बजाय उनके वास्तविक अनुभवों पर भी ध्यान देना चाहिए.
इसी क्रम में उन्होंने सरकार और विपक्ष दोनों के लिए संवाद की जरूरत पर जोर दिया. सवाल यह है कि युवाओं और छात्रों के बीच नाराजगी बढ़ने पर राजनीतिक व्यवस्था किस तरह प्रतिक्रिया देती है. क्या सरकारें प्रशासनिक शक्ति के जरिए असहमति को नियंत्रित करेंगी या राजनीतिक संवाद के जरिए इन शिकायतों का समाधान तलाशेंगी, यही इस पूरी बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा है.
अंत में बातचीत इस सवाल पर पहुंची कि 'छात्रों की गूंज' जैसे आयोजनों का प्रभाव किस तरह मापा जाए. दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव के नतीजों को इसके प्रभाव का अंतिम प्रमाण मानना उचित नहीं होगा. छात्र राजनीति, युवाओं के मुद्दे और व्यापक सामाजिक असंतोष अलग-अलग स्तरों पर काम करते हैं. इंदौर के आयोजन से सामने आई तस्वीर यह जरूर दिखाती है कि छात्रों की एक बड़ी संख्या अपने अनुभवों और समस्याओं को सार्वजनिक रूप से व्यक्त करने के लिए मंच तलाश रही है.
पूरी बातचीत हरकारा रोज़ाना के यूट्यूब चैनल पर सुन सकते हैं.

