आसिम अली | ‘राक्षसी’ बनाई गई एक आवाज़

सोशल मीडिया पर हाल ही में शर्जील इमाम के मामले को लेकर नया बवंडर तब खड़ा हुआ जब 'द प्रिंट' में 'इब्न खल्दून भारती' उपनाम से एक लेख छपा. इस लेख में लेखक ने उदारवादियों पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि उन्होंने शर्जील इमाम के उन खतरनाक "इस्लामवादी" विचारों के लिए उसकी आलोचना नहीं की, जो उसने 'द क्विंट' को दिए एक विस्तृत साक्षात्कार में व्यक्त किए थे. 'भारती' ने इमाम के विचारों का सार इन शब्दों में निकाला था: "बिना किसी शर्म के उदारवाद-विरोधी, धर्मनिरपेक्षता-विरोधी, लोकतंत्र-विरोधी, संविधान-विरोधी—एक शब्द में कहें तो, राष्ट्र-विरोधी."

इस पूरे प्रकरण की विडंबना और जटिल प्रकृति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. शर्जील इमाम पिछले छह साल से सलाखों के पीछे है.  उस पर मुख्य रूप से बिना किसी हिंसा के आह्वान वाले केवल एक 'चक्का जाम' के भाषण का आरोप है, और साथ ही दिल्ली दंगे भड़काने का वह बेतुका आरोप भी है जो उन दंगों के एक महीने पहले से ही जेल में बंद होने के बावजूद लगाया गया था. अपने साक्षात्कार में इमाम ने यह तर्क पूरी ताकत से रखा है कि उसकी यह लंबी कैद और कुछ नहीं, बल्कि बहुसंख्यकवादी राज्य द्वारा शाहीन बाग आंदोलन के मुख्य शिल्पकार के रूप में उसकी भूमिका की सजा है—वह आंदोलन जिसने देशव्यापी सीएए/एनआरसी विरोधी प्रदर्शनों को जन्म दिया और सरकार को एनआरसी वापस लेने के लिए मजबूर किया.

आसिम अली के अनुसार, इमाम को "राष्ट्र-विरोधी" करार देना पूरी तरह बेतुका है. लेकिन सवाल यह है कि क्या वह "उदारवाद-विरोधी, धर्मनिरपेक्षता-विरोधी और संविधान-विरोधी" है? यह कहना शायद उचित होगा कि इमाम पारंपरिक अर्थों में खुद को उदारवादी, धर्मनिरपेक्ष या संविधानवादी नहीं कहेगा, जैसा कि भारत में इन शब्दों का उपयोग होता है. लेकिन क्या वह एक लोकतंत्रवादी है? निश्चित रूप से. और क्या हर किसी के लिए समानता और स्वतंत्रता की पैरवी करने वाली एक कट्टरपंथी लोकतांत्रिक परियोजना में उसके जैसे व्यक्ति के लिए कोई जगह है? इसका उत्तर भी 'हाँ' है.

अली कहते हैं कि इमाम के विचारों और साक्षात्कारों को सही संदर्भ में समझने के लिए उसकी व्यक्तिगत पृष्ठभूमि को डिकोड करना जरूरी है. जैसा कि वह खुद उन लोगों से कहता है जो उसके विचारों को "अगम्य" मानते हैं: “मैंने अपना जीवन भारत में मुस्लिम समस्या के अध्ययन में बिताया है; बिहार के एक ग्रामीण राजनेता के बेटे के रूप में, फिर आईआईटी के एक विरले मुस्लिम छात्र के रूप में, कॉरपोरेट जगत के हिस्से के रूप में, और अंततः मुसलमानों के खिलाफ संगठित हिंसा और विभाजन के इतिहास के एक शोधकर्ता के रूप में.”

लेखक के मुताबिक, सोशल मीडिया पर युवा और शिक्षित मुसलमानों के बीच इमाम को जो भारी समर्थन मिलता है, उसकी जड़ें जर्मन इतिहासकार रेनहार्ट कोसेलेक के उस विचार में छिपी हैं जिसे उन्होंने साझा "अनुभव का स्थान" कहा है. इसका अर्थ है संचित अतीत की वे स्मृतियां, जिनके आधार पर कोई समुदाय अपने वर्तमान को समझता और व्याख्यायित करता है. इमाम जैसे मुसलमानों के अनुभव के दायरे में केवल उनके व्यक्तिगत भेदभाव के संस्मरण ही नहीं आते, बल्कि सांप्रदायिक नरसंहारों का इतिहास, आतंकवाद के झूठे मामलों में मुस्लिम युवकों का फंसना और पुलिस की बर्बरता जैसी घटनाएं भी शामिल हैं.

इस इतिहास को आत्मसात करने के लिए किसी को अकादमिक शोध की जरूरत नहीं है. 1980 के दशक में मेरठ और मुरादाबाद जैसे शहरों में पुलिस द्वारा किए गए नरसंहारों के दस्तावेज—जैसे एम.जे. अकबर की पुस्तक “रायट आफ्टर रायट” में मिलते हैं—यह बताने के लिए काफी हैं कि पुरानी कांग्रेस व्यवस्था का बहुसंख्यकवादी चरित्र क्या था और संवैधानिक व्यवस्थाएं मुसलमानों के जीवन व संपत्ति की रक्षा करने में कितनी लाचार साबित हुईं. 13 अगस्त 1980 को मुरादाबाद के ईदगाह मैदान में ईद की नमाज के दौरान हुए नरसंहार के लिए आज तक किसी पुलिसकर्मी को सजा नहीं मिली है.

मुसलमानों के ऐतिहासिक अनुभवों को लेकर इमाम के दावे अकादमिक जगत के विश्लेषणों से मेल खाते हैं. भारतीय संविधान में राजनीतिक प्रतिनिधित्व के सुरक्षा उपायों की कमी पर रोचना बाजपेयी, फैसल देवजी या प्रतिनाव अनिल के लेखन को देखा जा सकता है. 1980 के दशक के उत्तर भारत में दंगों को हवा देने में कांग्रेस की रणनीति पर स्टीवन विल्किंसन और काजुया नाकामोज़ो के अध्ययन मौजूद हैं. वहीं, यह समझने के लिए कि 1990 के दशक में दंगों के थमने के पीछे संविधान की ताकत नहीं, बल्कि मंडल राजनीति के उभार और मुस्लिम मतदाताओं के बढ़ते राजनीतिक विकल्पों का हाथ था, विल्किंसन की पुस्तक 'वोट्स एंड वायलेंस' पढ़ी जा सकती है.

इसी तरह, द्वैपायन भट्टाचार्य ने पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा द्वारा मुस्लिम प्रतिनिधित्व की उपेक्षा और उसके नुकसानदायक परिणामों का विस्तृत जिक्र किया है. इसके विपरीत, केरल के मालाबार क्षेत्र में आईयूएमएल की भूमिका यह दर्शाती है कि कैसे एक स्वायत्त मुस्लिम नेतृत्व समुदाय की मतदान शक्ति को शिक्षा और विकास के संसाधनों में बदल सकता है.

बेशक, औपनिवेशिक काल की राजनीति पर इमाम के कुछ दृष्टिकोण अत्यधिक विकृत हैं—जैसे कांग्रेस को केवल अभिजात वर्ग और जमींदारों का हितैषी बताना (जबकि मुस्लिम लीग भी कम नहीं थी), या गांधीजी को फासीवादी और जिन्ना को महान लोकतंत्रवादी बताना. ये सारे दावे उस राष्ट्रवादी मिथक-निर्माण के उलट एक प्रतिक्रियावादी अतिरेक हैं जिसे इमाम ध्वस्त करना चाहता है. लेकिन इतिहास के उसके इन विवादास्पद पाठों के आधार पर उसे भविष्य की किसी भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया से खारिज नहीं किया जा सकता.

अली मानते हैं कि इमाम जिस राजनीतिक भूमिका की कल्पना करता है, उसमें मध्यम वर्ग के मुस्लिम कार्यकर्ताओं का एक ऐसा बौद्धिक दबाव समूह शामिल है जो पारंपरिक रूढ़िवादी मौलवी तंत्र को विस्थापित कर सके. यह समूह विकेंद्रीकरण, आनुपातिक प्रतिनिधित्व, स्वायत्त संस्थानों, दलित मुसलमानों व ईसाइयों की पहचान और पिछड़े वर्गों के लिए कोटे जैसी मांगों को मजबूती से रखे. साथ ही, यह चुनावों के बीच शाहीन बाग जैसे मॉडलों के जरिए सामूहिक संगठन बनाए और समान विचारधारा वाले क्षेत्रीय व लोकतांत्रिक दलों के साथ मिलकर चुनावी सौदेबाजी की ताकत बढ़ाए.

यह ढांचा अर्नेस्टो लाक्लाउ और शंतल मुफ द्वारा प्रतिपादित कट्टरपंथी और बहुलवादी लोकतांत्रिक राजनीति के सिद्धांत के बिल्कुल अनुकूल है.  उनके अनुसार, किसी भी साझा लोकतांत्रिक संघर्ष में भाग लेने वाले समूहों को पहले अपनी विशिष्ट पहचान और अस्मिता से जुड़ी मांगों के लिए संघर्ष करना पड़ता है, और संवाद के जरिए ही वे अपनी स्वायत्तता खोए बिना एक व्यापक 'सामान्यता' का निर्माण करते हैं.

यह दृष्टिकोण उस खोखले गांधीवादी-उदारवाद के बिल्कुल विपरीत है, जहां सद्भाव और आम सहमति ही एकमात्र लक्ष्य बन जाती है और सत्ता तथा धन की संरचनात्मक असमानताओं की पूरी उपेक्षा कर दी जाती है. आजादी उपरांत की कांग्रेस व्यवस्था ने न केवल हिंदू राष्ट्रवाद के विस्तार को मौन स्वीकृति दी, बल्कि अपने राजनीतिक हितों के लिए दंगों की राजनीति का भी सहारा लिया.

अली के लेख का निष्कर्ष कहता है कि आज हमें एक ऐसी कट्टरपंथी लोकतांत्रिक राजनीति की आवश्यकता है जो समानता और स्वतंत्रता को सिर्फ कागजी संवैधानिक व्यवस्था तक सीमित न रखे, बल्कि उन्हें लोकतंत्र का वास्तविक और जीवंत ध्येय बनाए. शर्जील इमाम जैसे राजनीतिक कार्यकर्ताओं को इसी व्यापक और न्यायसंगत लोकतांत्रिक संघर्ष का हिस्सा बनाया जाना चाहिए.

(आसिम अली एक राजनीतिक शोधकर्ता और स्तंभकार हैं. यह हिंदी में अनूदित और संपादित लेख है. अंग्रेजी में उनका मूल लेख यहां पढ़ा जा सकता है.)

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