मॉब लिंचिंग के दोषियों को सजा सुनाने के बाद जज सांप्रदायिक मुहिम के निशाने पर

जज तबस्सुम खान ने जबसे ट्रक ड्राइवर शेख लाला नजीर अहमद की मॉब लिंचिंग (हत्या) के मामले में 14 लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाई है, तब से उन पर सांप्रदायिक टिप्पणियां, धमकियां और उनकी धार्मिक पहचान को केंद्र में रखकर एक अभियान चलाया जा रहा है.

 ‘न्यूज़ लॉन्ड्री’ में अवधेश कुमार की रिपोर्ट के अनुसार, यह मामला 2-3 अगस्त 2022 की रात का है, जब मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम जिले के बरखड़ गांव में भीड़ ने मवेशी ले जा रहे ट्रक ड्राइवर शेख लाला नजीर अहमद पर बेरहमी से हमला किया था, जिससे उसकी मौत हो गई थी. 12 जून 2026 को नर्मदापुरम की अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश तबस्सुम खान ने इस मॉब लिंचिंग को "अत्यंत क्रूर" मानते हुए 14 आरोपियों को आईपीसी की विभिन्न गंभीर धाराओं के तहत दोषी पाकर उम्रकैद की सजा सुनाई.

सजा सुनाए जाने के बाद से ही कुछ दक्षिणपंथी कार्यकर्ताओं और गोरक्षक समूहों द्वारा इस अदालती फैसले को जानबूझकर हिंदू-मुस्लिम रंग देने की कोशिश की जा रही है. फैसला सुनाने वाली जज के मुस्लिम होने के कारण उन्हें "हिंदू विरोधी" बताया जा रहा है. सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ अभद्र, लैंगिक और सांप्रदायिक टिप्पणियां की जा रही हैं, तथा उनके पुतले फूंके जा रहे हैं. यहाँ तक कि 'सुदर्शन न्यूज' के मालिक सुरेश चव्हाणके ने इस फैसले को "न्यायिक लिंचिंग" करार दिया.

यह विरोध केवल मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पंजाब (मोहाली), उत्तर प्रदेश (ललितपुर) और आगरा तक फैल गया है. कई संगठनों ने दोषियों की रिहाई की मांग को लेकर प्रदर्शन किए हैं. सोशल मीडिया पर वायरल कुछ वीडियो में जज खान को "खून-खराबे" की सीधी धमकी दी जा रही है और फैसला बदलने का दबाव बनाया जा रहा है.

सिवनी मालवा पुलिस ने सोशल मीडिया पर सांप्रदायिक टिप्पणी और धमकी देने वाले दो व्यक्तियों के खिलाफ स्वतः संज्ञान लेते हुए बीएनएस की धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की है.

बार एसोसिएशन के अध्यक्ष हजारी लाल गुर्जर ने महिला जज को मिल रही "जान से मारने की धमकियों" पर चिंता जताई और हाई कोर्ट द्वारा अवमानना की कार्रवाई न किए जाने पर सवाल उठाए.

न्यायाधीश तबस्सुम खान ने "न्यायिक मर्यादा" का पालन करते हुए इस पूरे विवाद पर किसी भी प्रकार की टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.

पूर्व मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट और अन्य वकीलों का मानना है कि यह विरोध अज्ञानता के कारण हो रहा है. यदि कोई फैसले से असहमत है, तो उसके पास ऊपरी अदालत में अपील करने का वैध कानूनी रास्ता उपलब्ध है, न कि जज पर व्यक्तिगत हमले करने का.

 

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