युद्ध, महंगाई और बाजार संकट के बीच गुजरात के मछुआरे

स्क्रोल के अनुसार, लगातार दो गर्मियों से युद्धों की मार झेल रहे गुजरात के मछुआरे अब गहरे आर्थिक संकट में फंसते जा रहे हैं. एक तरफ पश्चिम एशिया में जारी युद्ध ने समुद्री उत्पादों के निर्यात बाजार को लगभग बंद कर दिया है, वहीं दूसरी तरफ डीजल, जाल और नावों की लागत तेजी से बढ़ गई है. मछलियों के दाम गिर रहे हैं और खर्च बढ़ते जा रहे हैं. ऐसे में गुजरात का मत्स्य उद्योग दोहरी मार झेल रहा है.

पिछले साल भारत-पाकिस्तान तनाव के दौरान गुजरात मत्स्य विभाग ने समुद्र में गई नौकाओं को वापस बुला लिया था. इस साल मछुआरे मानसून प्रतिबंध से पहले आखिरी बार समुद्र में उतर रहे हैं, लेकिन पश्चिम एशिया युद्ध ने उनके सामने नया संकट खड़ा कर दिया है.

द्वारका जिले के सालाया गांव के फिशरमेन बोट एसोसिएशन के प्रमुख सिद्दीक जसाराया के मुताबिक, “घोल मछली के दाम 2,000 से 3,000 रुपये प्रति किलो तक गिर गए हैं.” कभी 12,000 रुपये प्रति किलो तक बिकने वाली यह मछली अब औने-पौने दामों पर बिक रही है.

जूनागढ़ के मछुआरे दामोदर चामुडिया बताते हैं कि यूरोप में 500 रुपये प्रति किलो बिकने वाला स्क्विड अब 250 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया है. निर्यात बंद होने से मछुआरों को अपना माल घरेलू बाजार में बेचना पड़ रहा है, जहां उन्हें काफी कम कीमत मिल रही है.

गुजरात देश के कुल समुद्री निर्यात का लगभग 17 प्रतिशत हिस्सा देता है. राज्य में करीब 27 हजार मशीनीकृत नौकाएं हैं. इनमें ट्रॉलर, गिल नेट बोट और फाइबर ग्लास नौकाएं शामिल हैं. सबसे ज्यादा असर इन्हीं बड़ी नौकाओं पर पड़ा है क्योंकि इनकी पकड़ सीधे निर्यात बाजार पर निर्भर करती है.

निर्यातकों का कहना है कि युद्ध के कारण समुद्री रास्ते प्रभावित हुए हैं और सामान पहुंचाने में देरी हो रही है. खराब होने वाले उत्पादों के कारण जोखिम बढ़ गया है. ऐसे में कई निर्यातकों ने शिपमेंट रोक दिए हैं या रद्द कर दिए हैं.

वेरावल के मछुआरे वेलजीभाई कहते हैं, “जो व्यापारी हमसे मछली खरीदकर विदेश भेजते थे, वे अब अच्छे दाम नहीं दे रहे. उनका कहना है कि माल आगे निर्यात नहीं हो पा रहा.”

मछलियों के दाम गिरने के साथ-साथ मछली पकड़ने का खर्च तेजी से बढ़ा है. युद्ध के कारण पेट्रोकेमिकल उत्पादों की आपूर्ति प्रभावित हुई है. जाल, फाइबर ग्लास और नावों में इस्तेमाल होने वाली रेजिन जैसी सामग्री महंगी हो गई है.

पहले जो फाइबर ग्लास नाव 40 लाख रुपये में बनती थी, उसकी लागत अब 55 से 60 लाख रुपये तक पहुंच गई है. नावों की मरम्मत भी महंगी हो चुकी है. रेजिन की कीमत में 70 से 80 रुपये प्रति किलो तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है.

मछली पकड़ने वाले जालों की कीमत भी लगभग दोगुनी हो गई है. सालाया के जसाराया बताते हैं कि पहले एक किलो जाल 190 रुपये में मिलता था, अब वही 350 रुपये तक पहुंच गया है. मछली रखने वाले इंसुलेटेड बॉक्स की कीमत 600 रुपये से बढ़कर 900 रुपये तक हो गई है.

डीजल की कीमत को लेकर भी मछुआरों में चिंता है. मार्च में भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड ने डीजल की कीमत में 22.43 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की थी. हालांकि विरोध के बाद राज्य सरकार ने इसे वापस ले लिया. लेकिन मछुआरों को डर है कि आने वाले समय में फिर कीमतें बढ़ सकती हैं.

एक ट्रॉलर को समुद्र में एक यात्रा के दौरान 3,000 से 4,000 लीटर डीजल की जरूरत पड़ती है. ऐसे में डीजल महंगा होने का मतलब सीधे कारोबार बंद होने की स्थिति बनना है.

गुजरात का मत्स्य उद्योग पहले से अमेरिकी टैरिफ की मार भी झेल रहा है. 2025 में अमेरिका द्वारा लगाए गए शुल्क के बाद भारत से जमे हुए झींगा निर्यात में भारी गिरावट आई थी. अमेरिका भारत के समुद्री उत्पादों का सबसे बड़ा बाजार है.

मछुआरों का कहना है कि निर्यात उद्योग अब तक पूरी तरह सामान्य नहीं हो पाया है. कच्छ के मछुआरे अब्दुल्ला बापू जाखो कहते हैं, “अभी भी अधिकतर माल को कोल्ड स्टोरेज में रखना पड़ रहा है.”

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर जल्द सरकारी सहायता नहीं मिली तो संकट और गहरा सकता है. नेशनल फेडरेशन ऑफ स्मॉल स्केल फिशवर्कर्स से जुड़े सिद्धार्थ चक्रवर्ती का कहना है कि सरकार को डीजल कीमतों पर नियंत्रण, कम ब्याज वाले कर्ज और आय सहायता जैसी योजनाएं शुरू करनी चाहिए.

मछुआरे किसान क्रेडिट कार्ड योजना के तहत कर्ज सीमा बढ़ाने और लंबित डीजल सब्सिडी जारी करने की भी मांग कर रहे हैं. उनका कहना है कि बिना सरकारी मदद के अगले सीजन में आधी नौकाएं समुद्र में नहीं उतर पाएंगी.

गुजरात के समुद्र तटों पर आज मछुआरों की सबसे बड़ी चिंता सिर्फ मछली पकड़ना नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व को बचाए रखना बन चुकी है.

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