राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार: सिनेमा के सम्मान से सत्ता के पसंदीदा आख्यानों तक?
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार कभी भारतीय सिनेमा में प्रतिष्ठा के सबसे बड़े प्रतीकों में गिने जाते थे. अलग-अलग भाषाओं, क्षेत्रों और सीमित संसाधनों में बनने वाली फिल्मों को राष्ट्रीय पहचान दिलाने की उनकी भूमिका उन्हें दूसरे फिल्म पुरस्कारों से अलग बनाती थी. लेकिन फिल्म समीक्षक और पत्रकार अन्ना एम.एम. वेट्टिकाड का तर्क है कि नरेंद्र मोदी के दौर में इन पुरस्कारों की विश्वसनीयता लगातार कमजोर हुई है. उनके मुताबिक हाल के वर्षों में पुरस्कारों में ऐसी फिल्मों की मौजूदगी बढ़ी है, जो भाजपा सरकार, हिंदुत्व और बहुसंख्यकवादी राजनीतिक आख्यानों के अनुकूल दिखाई देती हैं.
'द केरल स्टोरी' से 'आर्टिकल 370' तक
वेट्टिकाड के मुताबिक 2023 के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में 'द केरल स्टोरी' को सर्वश्रेष्ठ निर्देशन और सर्वश्रेष्ठ सिनेमैटोग्राफी का सम्मान मिलना इस बदलाव का प्रमुख उदाहरण था. फिल्म पर 'लव जिहाद' की अवधारणा को बढ़ावा देने और केरल की हजारों महिलाओं के धर्मांतरण को लेकर अप्रमाणित दावा पेश करने के आरोप लगे थे.
फिल्म के टीजर में 32,000 महिलाओं के धर्मांतरण और उनके सीरिया-यमन पहुंचने का दावा किया गया था. फिल्म की टीम इस आंकड़े का प्रमाण पेश नहीं कर सकी. बाद में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद फिल्म में डिस्क्लेमर जोड़ा गया कि 32,000 या किसी अन्य निश्चित संख्या के समर्थन में प्रामाणिक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं. इसके बावजूद 2023 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फिल्म का उल्लेख किया था.
अब 2024 के लिए घोषित राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में 'आर्टिकल 370' को सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म, सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री और सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशन सहित तीन सम्मान मिले हैं. वेट्टिकाड इसे जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के तहत मिले विशेष दर्जे को खत्म करने के केंद्र सरकार के 2019 के फैसले के पक्ष में तैयार राजनीतिक आख्यान के रूप में देखती हैं.
बहस पुरस्कारों पर नहीं, उनके बदलते चरित्र पर
फिल्म पुरस्कारों के फैसलों पर असहमति कोई नई बात नहीं है. वेट्टिकाड 1997 की 'दिल तो पागल है' के लिए करिश्मा कपूर को सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का पुरस्कार मिलने जैसे पुराने विवादों का उदाहरण देती हैं. इसी तरह मिथुन चक्रवर्ती, डिंपल कपाड़िया और सनी देओल को एक ही वर्ष प्रमुख अभिनय पुरस्कार मिलने पर हिंदी सिनेमा की ओर झुकाव के आरोप भी लगे थे.
लेकिन वेट्टिकाड के अनुसार मौजूदा समस्या सिर्फ यह नहीं है कि किसी फिल्म या कलाकार को पुरस्कार मिलना चाहिए था या नहीं. उनका आरोप है कि 2014 के बाद ऐसे कार्यों को लगातार सम्मान मिला है जो सरकार की छवि मजबूत करते हैं, इतिहास की एक खास व्याख्या पेश करते हैं या धार्मिक ध्रुवीकरण से जुड़े राजनीतिक आख्यानों को आगे बढ़ाते हैं.
'रॉकेट्री' और इतिहास से गायब नेहरू
आर. माधवन की 'रॉकेट्री: द नंबी इफेक्ट' को भी वेट्टिकाड इसी संदर्भ में रखती हैं. इस फिल्म को सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था. फिल्म इसरो वैज्ञानिक एस. नंबी नारायणन की कहानी पर आधारित है, जिन पर 1990 के दशक में जासूसी के आरोप लगे थे और बाद में उन्हें इन आरोपों से राहत मिली.
वेट्टिकाड फिल्म की गुणवत्ता पर अपनी असहमति को व्यक्तिगत समीक्षा मानती हैं, लेकिन एक राजनीतिक चयन की ओर ध्यान दिलाती हैं. उनके अनुसार फिल्म 1960 के दशक से 2010 के दशक तक की कहानी बताती है, लेकिन भारत के शुरुआती अंतरिक्ष कार्यक्रम में जवाहरलाल नेहरू की भूमिका का उल्लेख नहीं करती. इसके विपरीत फिल्म के अंत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आवाज और मौजूदगी को प्रमुखता मिलती है.
सावरकर की कहानी और हिंदुत्व का नायक
2024 में निर्देशक की सर्वश्रेष्ठ पहली फिल्म का पुरस्कार रणदीप हुड्डा की 'स्वातंत्र्य वीर सावरकर' को मिला. वेट्टिकाड इसे विनायक दामोदर सावरकर की महिमामंडित जीवनी मानती हैं. सावरकर को ब्रिटिश शासन ने जेल भेजा था, उन्होंने औपनिवेशिक सरकार को दया याचिकाएं लिखीं और कांग्रेस के भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया था. महात्मा गांधी की हत्या के मामले में उन पर सह-साजिशकर्ता होने का आरोप लगा, हालांकि अदालत ने उन्हें बरी कर दिया था.
वेट्टिकाड के मुताबिक फिल्म में कांग्रेस और गांधी की आलोचनात्मक छवि के साथ एक मुस्लिम जेलर को विशेष रूप से क्रूर दिखाना उस व्यापक राजनीतिक विमर्श से मेल खाता है जिसमें मुस्लिम समुदाय को विरोधी के रूप में पेश किया जाता है.
'उरी' से आक्रामक राष्ट्रवाद का विस्तार
आदित्य धर की 'उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक' को 2019 में राष्ट्रीय पुरस्कारों में बड़ी सफलता मिली थी और धर को सर्वश्रेष्ठ निर्देशक चुना गया. फिल्म पाकिस्तान के खिलाफ भारत की सैन्य कार्रवाई पर आधारित थी और उसमें "ये नया हिंदुस्तान है, ये घर में घुसेगा भी और मारेगा भी" जैसी पंक्ति आक्रामक राष्ट्रवाद के प्रतीक के रूप में उभरी.
अब धर द्वारा सह-लिखित और सह-निर्मित 'आर्टिकल 370' को तीन राष्ट्रीय पुरस्कार मिले हैं. फिल्म की अभिनेत्री यामी गौतम धर को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री चुना गया है. वेट्टिकाड इसे हाल के वर्षों में राष्ट्रीय पुरस्कारों में उभरी वैचारिक निरंतरता से जोड़ती हैं.
असली प्रतिभाओं पर राजनीतिक विवादों की छाया
इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा नुकसान उन फिल्मों और कलाकारों को होता है जिन्हें वास्तव में राष्ट्रीय मंच की जरूरत है. 'मिथ्या' और 'फेमिनिची फातिमा' जैसी फिल्मों को राष्ट्रीय पुरस्कारों में पहचान मिलना दिखाता है कि इस मंच की उपयोगिता अब भी खत्म नहीं हुई है.
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की सबसे बड़ी खासियत यही रही है कि वे तुलु, गढ़वाली, बोडो, खासी, कोंकणी और दूसरी अपेक्षाकृत छोटी फिल्म परंपराओं को भी राष्ट्रीय पहचान देते हैं. कॉरपोरेट और स्टार-केंद्रित पुरस्कार समारोहों में ऐसी फिल्मों के लिए जगह बेहद सीमित होती है.
वेट्टिकाड की चिंता यही है कि जब प्रतिभाशाली फिल्मकारों और कलाकारों को उसी मंच पर सम्मान मिलता है जहां राजनीतिक प्रचार, इतिहास की चयनात्मक व्याख्या और विभाजनकारी आख्यानों के आरोपों से घिरी फिल्मों को प्रतिष्ठित किया जाता है, तब पुरस्कार की विश्वसनीयता पर असर पड़ता है. राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों का महत्व अभी समाप्त नहीं हुआ है, लेकिन उनकी प्रतिष्ठा अब केवल अच्छे सिनेमा को पहचानने से नहीं, बल्कि इस सवाल से भी जुड़ गई है कि आखिर राष्ट्रीय मंच पर किस तरह के भारत और किस तरह की राजनीति को पुरस्कृत किया जा रहा है.

