भारत में सड़क हादसे के शिकार: मुआवज़े के लिए सालों की लड़ाई, क़ानून काग़ज़ पर ही
पुणे में कूड़ा बीनने का काम करने वाली 55 वर्षीया शोभा क्षीरसागर की ज़िंदगी नवंबर 2024 में एक रात में बदल गई, जब उनके 35 साल के बेटे सनी सदाशिव को एक डंपर ट्रक ने टक्कर मार दी और उसकी एड़ी कुचल दी. एक निजी अस्पताल ने पैसे न होने की वजह से इलाज से मना कर दिया. बाद में सर्जरी हुई, धातु की छड़ डाली गई, लेकिन महीनों बाद भी वे ठीक से चल नहीं सकते. परिवार शोभा, बेटा, बहू और दो पोते ने इलाज पर 2.75 लाख रुपये ख़र्च किए. उनके ठेके में बीमा है, लेकिन कवरेज मात्र 30,000 रुपये है और प्रति घटना केवल 15,000 रुपये मिलते हैं. तीसरे पक्ष के बीमे का दावा अभी अदालत में लंबित है. परिवार ने घर किराए पर देकर ख़ुद छोटी जगह किराए पर ले ली और शोभा अपनी सामूहिक बचत में से 200-300 रुपये मासिक निकाल-निकालकर गुज़ारा कर रही हैं.
इंडियास्पेंड की रिपोर्टर प्राची साल्वे की यह रिपोर्ट एक व्यापक सच्चाई उजागर करती है. 2023 में भारत में 4,80,583 सड़क दुर्घटनाएँ हुईं, जिनमें 1,72,890 मौतें और 4,62,825 घायल हुए 2022 से 2.6 प्रतिशत अधिक. इनमें दो-तिहाई मौतें 18 से 45 साल के कामकाजी उम्र के लोगों की थीं. सड़क दुर्घटनाएँ जीडीपी के 3 से 7 प्रतिशत के बराबर नुक़सान पहुँचाती हैं.
क़ानून में तीसरे पक्ष का बीमा, मोटर वाहन दुर्घटना कोष और 'गोल्डन ऑवर' में मुफ़्त इलाज की व्यवस्था है. लेकिन ज़मीन पर स्थिति बेहद निराशाजनक है. विश्व बैंक के 2021 के एक अध्ययन के मुताबिक़, निम्न-आय वर्ग के केवल 64 प्रतिशत पीड़ित दुर्घटना में बचते हैं, जबकि उच्च-आय वर्ग में यह आँकड़ा 87.5 प्रतिशत है. 25 प्रतिशत से भी कम निम्न-आय पीड़ितों को मुआवज़े और बीमा प्रक्रियाओं की जानकारी है, और उनमें से भी बहुत कम को वास्तव में भुगतान मिलता है. निम्न-आय परिवारों में अस्पताल और दवाओं पर 78,824 रुपये ख़र्च होते हैं जो उनकी सालाना आय का 52 प्रतिशत है, जबकि उच्च-आय परिवारों के लिए यही ख़र्च आय का 30.5 प्रतिशत है.
गुड़गाँव में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करने वाली मिताली (बदला हुआ नाम) 2025 में देर रात एक हिट-एंड-रन का शिकार हुईं. कई फ्रैक्चर हुए, महीनों बैसाखी पर रहीं, छह महीने की छुट्टी के बाद नौकरी छोड़नी पड़ी. कुल नुक़सान 10-12 लाख रुपये. एफआईआर के बाद ट्रिब्यूनल प्रक्रिया का पता चला, वकील ने 30 प्रतिशत कन्टिन्जेंसी फ़ीस माँगी, और मामला 2026 में अदालत पहुँचा. वह अभी लंबित है.
क्रैशफ़्री इंडिया के जनवरी 2026 के शोध के अनुसार, 2022-23 में 25,000 हिट-एंड-रन दुर्घटनाओं के मुक़ाबले मात्र 205 दावे दायर हुए. यह संख्या अगले साल 3,000 हुई, लेकिन यह भी बेहतर प्रशासनिक प्रक्रिया की वजह से, दुर्घटनाओं में कमी से नहीं. क्रैशफ़्री इंडिया की रिसर्च लीड केसर कंझलिया बताती हैं कि एफआईआर देर से या कभी दर्ज ही नहीं होती, ज़िला अधिकारी जागरूकता नहीं फैलाते और हर स्तर पर प्रक्रिया अटकती है. जुलाई 2024 तक 1,026 में से 921 लंबित दावे (90 प्रतिशत) दस्तावेज़ों की कमी से रुके थे. औसत मुआवज़ा प्रक्रिया में 3.6 साल लगते हैं और कई मामले 8-10 साल तक खिंचते हैं. देशभर में मई 2024 तक 10.5 लाख मामले और 80,455 करोड़ रुपये लंबित थे, जबकि मुंबई, गुजरात और गोवा हाई कोर्ट में कुल 1,102 करोड़ रुपये मुआवज़े के फ़ंड बिना बाँटे पड़े हैं. पारिसर संस्था के प्रोग्राम डायरेक्टर रंजीत गाडगिल का कहना है, "असली मुद्दा राशि नहीं, पहुँच है. जब तक मुआवज़ा मिलता है, परिवार पहले ही ऊँचे ब्याज़ पर क़र्ज़ ले चुका होता है."

