श्रवण गर्ग | नॉर्वे ने भारत के प्रेस नहीं, लोकतंत्र के घाव को खोल दिया
‘हरकारा डीप डाइव’ के इस लाइव इंटरव्यू में वरिष्ठ पत्रकार निधीश त्यागी और वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यूरोप यात्रा, प्रेस की आज़ादी, भारतीय लोकतंत्र, मीडिया की जवाबदेही और विदेशों में भारत की छवि को लेकर विस्तार से चर्चा की. बातचीत की शुरुआत नॉर्वे में उस घटना से हुई, जहां एक महिला पत्रकार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सवाल पूछने की कोशिश की, लेकिन वे बिना जवाब दिए वहां से चले गए. इस घटना को लेकर दुनिया भर में चर्चा हुई और भारत में प्रेस की स्थिति पर नए सवाल उठे.
श्रवण गर्ग ने कहा कि नॉर्वे प्रेस स्वतंत्रता के मामले में दुनिया के सबसे आगे रहने वाले देशों में है, जबकि भारत बहुत नीचे पहुंच चुका है. उन्होंने कहा कि भारत में लंबे समय से प्रधानमंत्री खुली प्रेस वार्ताओं से बचते रहे हैं और सवाल पूछने की परंपरा लगभग खत्म कर दी गई है. उनके अनुसार विदेशों में जब भारतीय प्रधानमंत्री से कठिन सवाल पूछे जाते हैं तो भारतीय कूटनीतिक तंत्र असहज दिखाई देता है.
बातचीत में विदेश मंत्रालय के अधिकारियों के व्यवहार का भी उल्लेख हुआ. श्रवण गर्ग ने कहा कि जब विदेशी पत्रकारों ने भारत में मानवाधिकार, अल्पसंख्यकों की स्थिति और प्रेस की आज़ादी को लेकर सवाल किए, तब सीधे जवाब देने के बजाय भारत की सभ्यता, योग और विकास मॉडल की लंबी व्याख्या की गई. उन्होंने इसे सवालों से बचने की रणनीति बताया.
इंटरव्यू में भारतीय मीडिया की भूमिका पर भी तीखी टिप्पणी हुई. श्रवण गर्ग ने कहा कि देश का बड़ा हिस्सा सत्ता से सवाल पूछने के बजाय उसका बचाव करता दिखाई देता है. उन्होंने कहा कि भारत में मीडिया की स्वतंत्रता लगातार कमजोर हुई है और आलोचनात्मक पत्रकारिता को हाशिए पर धकेला जा रहा है. उनके अनुसार आज स्थिति ऐसी हो गई है कि सत्ता सवाल पूछे जाने को ही अपने खिलाफ हमला मानने लगी है.
बातचीत में सर्वोच्च न्यायालय, प्रेस परिषद और मीडिया संस्थानों का भी जिक्र आया. श्रवण गर्ग ने कहा कि भारत में एक ऐसा माहौल बन गया है, जहां पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और सवाल पूछने वालों को संदेह की नजर से देखा जाता है. उन्होंने कहा कि लोकतंत्र केवल चुनाव से नहीं चलता, बल्कि जवाबदेही और स्वतंत्र संस्थाओं से मजबूत होता है.
यूरोप और भारत की तुलना करते हुए श्रवण गर्ग ने कहा कि नॉर्वे, स्वीडन और नीदरलैंड जैसे देशों में नागरिक अधिकारों और प्रेस की आज़ादी को लोकतंत्र का आधार माना जाता है. उनके अनुसार वहां प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला सीधे लोकतंत्र पर हमला माना जाता है, जबकि भारत में इसे महत्वहीन बनाने की कोशिश हो रही है.
बातचीत के अंत में उन्होंने कहा कि भारत केवल प्रेस की आज़ादी के संकट से नहीं गुजर रहा, बल्कि नागरिक स्वतंत्रता, अल्पसंख्यकों के अधिकार और लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं. इंटरव्यू का समापन इस अपील के साथ हुआ कि लोगों को सवाल पूछने की संस्कृति को बचाना चाहिए, क्योंकि लोकतंत्र में चुप्पी अंततः सत्ता को और अधिक निरंकुश बनाती है..पूरी वीडियो यहाँ देखी जा सकती है.

