मोदी की मितव्ययिता अपील: दूरदर्शिता या आर्थिक विफलता का संकेत?

‘द साउथ फर्स्ट’ के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया “मितव्ययिता” अपील ने देश में नई राजनीतिक और आर्थिक बहस छेड़ दी है. हैदराबाद में अपने संबोधन में उन्होंने लोगों से कोविड काल जैसी आदतें अपनाने की अपील की — जैसे सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल, कारपूलिंग, सोने की खरीद कम करना, विदेशी यात्राओं में कटौती और “मेड इन India” उत्पादों को प्राथमिकता देना. सरकार ने इसे “आर्थिक देशभक्ति” बताया, लेकिन विपक्ष और आलोचकों ने इसे आर्थिक प्रबंधन की कमजोरी का संकेत माना है.

दरअसल, पश्चिम एशिया संकट और बढ़ती कच्चे तेल की कीमतों ने भारत पर दबाव बढ़ा दिया है. भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है. तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जाने के बाद चालू खाते के घाटे और रुपये पर दबाव बढ़ने की आशंका है. साथ ही, खाद्य तेल और सोने के आयात ने विदेशी मुद्रा भंडार पर अतिरिक्त बोझ डाला है.

आलोचकों का कहना है कि 12 वर्षों के शासन के बाद भी भारत वैश्विक तेल संकटों के प्रति इतना संवेदनशील क्यों बना हुआ है. “आत्मनिर्भर भारत” का नारा देने वाली सरकार ऊर्जा आत्मनिर्भरता, निर्यात विविधीकरण और घरेलू उत्पादन को अपेक्षित गति से मजबूत नहीं कर पाई. नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं की घोषणाएँ तो हुईं, लेकिन जमीन पर उनका प्रभाव सीमित रहा.

मोदी सरकार पर यह आरोप भी लग रहा है कि उसने संरचनात्मक सुधारों की बजाय “नैरेटिव मैनेजमेंट” पर अधिक भरोसा किया. बड़े-बड़े इवेंट, हाई-प्रोफाइल विदेश यात्राएँ और चुनावी अभियान जारी रहे, जबकि अब आम नागरिकों से सादगी अपनाने की अपील की जा रही है. यही कारण है कि विपक्ष इसे “जनता पर जिम्मेदारी डालने” की कोशिश बता रहा है.

हालांकि भारत तत्काल किसी आर्थिक संकट के कगार पर नहीं है. विदेशी मुद्रा भंडार अभी भी मजबूत है और सेवा क्षेत्र से आय बनी हुई है. लेकिन लगातार बाहरी झटकों से अर्थव्यवस्था की कमजोरी उजागर होती रही है. बढ़ती महंगाई, रुपये में गिरावट और आयात निर्भरता लंबे समय से चिंता का विषय हैं.

यदि सरकार वास्तव में इस अपील को विश्वसनीय बनाना चाहती है, तो उसे प्रतीकात्मक संदेशों से आगे बढ़कर ठोस कदम उठाने होंगे. ऊर्जा आत्मनिर्भरता, सरकारी खर्चों में पारदर्शिता और शीर्ष स्तर पर वास्तविक सादगी दिखाना आवश्यक होगा. केवल नैतिक अपीलों से नहीं, बल्कि स्थायी नीतियों से ही जनता का विश्वास जीता जा सकता है.

 

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