सत्य सागर | भारत में लोकतंत्र का तख्तापलट?

‘हरकारा डीप डाइव’ के लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी ने लेखक और विश्लेषक सत्य सागर के साथ भारतीय लोकतंत्र, संवैधानिक व्यवस्था, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की वैचारिक परियोजना और देश में सत्ता के बदलते स्वरूप पर विस्तार से बातचीत की.

सत्य सागर का तर्क है कि भारत की मौजूदा राजनीतिक स्थिति को केवल ‘अघोषित आपातकाल’ या ‘साइलेंट इमरजेंसी’ कहना पर्याप्त नहीं है. उनके मुताबिक, देश में सत्ता और संवैधानिक व्यवस्था के बीच संतुलन में ऐसे बदलाव हुए हैं, जिन्हें समझने के लिए लोकतंत्र को केवल चुनावों तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता. वह भारतीय लोकतंत्र की स्थिति को ‘आईसीयू’ में बताते हैं. साथ ही, वह सत्ता के तीन रूपों—स्टेट पावर, स्ट्रीट पावर और सब्स्टेंटिव पावर—के जरिए मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था का विश्लेषण करते हैं.

बातचीत में आरएसएस की दीर्घकालिक वैचारिक और राजनीतिक भूमिका, बाबरी मस्जिद विध्वंस, अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले, जम्मू-कश्मीर का पूर्ण राज्य से केंद्रशासित प्रदेश में रूपांतरण और संघवाद से जुड़े सवालों पर चर्चा हुई. सत्य सागर ने यह समझाने की कोशिश की कि संवैधानिक अधिकारों, संस्थाओं की भूमिका और सत्ता के केंद्रीकरण से जुड़े सवाल भारतीय लोकतंत्र के भविष्य को किस तरह प्रभावित करते हैं.

चर्चा में जाति, वर्ग और मध्यवर्ग की राजनीतिक भूमिका पर भी बात हुई. सत्य सागर के अनुसार, किसी राजनीतिक व्यवस्था को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि सत्ता से किन सामाजिक समूहों को लाभ मिलता है. उन्होंने यह भी चर्चा की कि भय, दबाव और केंद्रीय जांच एजेंसियों की कार्रवाई जैसे कारक राजनीतिक विरोध को किस तरह प्रभावित कर सकते हैं.

बातचीत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा विपक्ष और जनआंदोलनों के सामने मौजूद चुनौतियों पर केंद्रित रहा. सवाल यह है कि लोकतंत्र और संविधान की रक्षा की मांग को रोजगार, आर्थिक सुरक्षा, आवास, सामाजिक न्याय, स्वच्छ हवा और पानी जैसे रोजमर्रा के मुद्दों से कैसे जोड़ा जाए. क्या विपक्ष और नागरिक आंदोलन ऐसी वैकल्पिक राजनीतिक और आर्थिक दृष्टि विकसित कर सकते हैं, जो व्यापक जनसमर्थन जुटा सके?

सत्य सागर ने भारत की सांस्कृतिक विविधता और लोकतांत्रिक मूल्यों को बचाए रखने की जरूरत पर भी जोर दिया. पूरी चर्चा इस सवाल के इर्द-गिर्द रही कि लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए केवल चुनाव पर्याप्त हैं या सत्ता के संतुलन, संस्थाओं की स्वतंत्रता और नागरिक भागीदारी को भी सुनिश्चित करना जरूरी है.

पूरी बातचीत हरकारा रोज़ाना के यूट्यूब चैनल पर सुन सकते हैं.

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