विश्लेषकों के मुताबिक़ एपेक में ट्रंप, शी और पुतिन की मुलाक़ात मॉस्को के लिए बड़ी कामयाबी होगी. लेकिन बीजिंग इसे लेकर कुछ ठंडा दिखता है. ‘अल जज़ीरा’ के लिए नील्स एडलर की रिपोर्ट कहती है कि इस महीने चीन के शेनझेन में एशिया प्रशांत आर्थिक सहयोग यानी एपेक का शिखर सम्मेलन होना है. इस मौक़े पर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच एक अभूतपूर्व त्रिपक्षीय मुलाक़ात हो सकती है.
चीन के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने बुधवार को बीजिंग में पत्रकारों से कहा, "चीन तीनों राष्ट्राध्यक्षों की बैठक को लेकर संबंधित पक्षों के संपर्क में है."
क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने मंगलवार को कहा, "ऐसी बैठक के तालमेल पर काम चल रहा है." उन्होंने यह भी जोड़ा, "हमें उम्मीद है कि अगले कुछ दिनों में इसे अंतिम रूप दे दिया जाएगा."
ट्रंप कह चुके हैं कि वे परमाणु हथियारों पर केंद्रित तीन तरफ़ा बातचीत के लिए तैयार हैं. पिछले महीने उन्होंने पत्रकारों से कहा था, "अगर राष्ट्रपति शी चाहें, तो मैं इसके लिए तैयार हूँ."
तीनों नेता अलग अलग मिल चुके हैं, पर उन्होंने कभी एक साथ औपचारिक बातचीत नहीं की है.
यह बैठक 18 और 19 नवंबर के लिए प्रस्तावित है. तो क्या यह वाक़ई होगी, और बाक़ी दुनिया के लिए इसका क्या मतलब होगा? अब तक जो पता है, वह इस तरह है.
कम से कम एक फ़ोटो का मौक़ा तो बनेगा
मॉस्को के पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक अलेक्ज़ेंडर ब्रातेर्स्की ने अल जज़ीरा से कहा, "यह एक बड़ा आयोजन है."
उन्होंने रूसी संसद की विदेश मामलों की समिति के अध्यक्ष प्योत्र तोलस्तोय का ज़िक्र किया. ब्रातेर्स्की के मुताबिक़ तोलस्तोय इस बैठक को एक नए याल्टा की ओर बढ़ता क़दम बता चुके हैं. याल्टा 1945 का वह सम्मेलन था, जिसमें सोवियत संघ, अमेरिका और ब्रिटेन के नेताओं ने युद्ध के बाद यूरोप की व्यवस्था तय की थी.
ब्रातेर्स्की ने कहा कि इससे मॉस्को को "बड़ी बातें करने" का मौक़ा मिलता है, और यूक्रेन किनारे हो जाता है.
उन्होंने कहा कि सिर्फ़ मेज़ पर बैठना ही पुतिन को "बराबर वालों में सबसे आगे" बना देगा. इससे उन्हें दुनिया को यह दिखाने का मौक़ा मिलेगा कि यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था तय करने वालों में वे भी शामिल हैं.
ब्रातेर्स्की ने कहा कि अगर बैठक से कोई नतीजा निकलता है, तो यह रूस पर चीन के असर को दिखाएगा.
उन्होंने कहा, "हमें ध्यान रखना चाहिए कि चुनावों के बाद हमारा सामना एक कहीं ज़्यादा कमज़ोर अमेरिकी नेता से है."
ब्रातेर्स्की ने समझाया कि विदेश नीति अब भी ट्रंप के हाथ में है. लेकिन इसी हफ़्ते मध्यावधि चुनाव में डेमोक्रेट्स ने कांग्रेस के दोनों सदनों पर नियंत्रण हासिल कर लिया है. अगर वे कीव को पैसा भेजना शुरू करते हैं, तो ट्रंप की सौदेबाज़ी की ताक़त घट जाएगी.
उन्होंने कहा, "बैठक अपने आप में कामयाबी होगी. पुतिन इसे घरेलू जनता के सामने भुना सकेंगे."
ब्रातेर्स्की के मुताबिक़ इससे कुछ निकलता है या नहीं, यह महीने भर में साफ़ हो जाना चाहिए. यह बैठक दिसंबर में मियामी में होने वाले जी20 शिखर सम्मेलन के दौरान एक और मुलाक़ात की राह भी खोल सकती है.
उन्होंने जोड़ा कि अगर क्रिसमस से पहले कुछ नहीं निकला, तो "यह बस फ़ोटो खिंचवाने का मौक़ा भर रह जाएगा."
ट्रंप क्या चाहते हैं?
छवि और सौदेबाज़ी की ताक़त.
लंदन की सिटी सेंट जॉर्जेस यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय राजनीति के प्रोफ़ेसर इंद्रजीत परमार ने अल जज़ीरा से कहा कि ट्रंप "एक निजी और नाटकीय मुलाक़ात" चाहते हैं. इससे वे दावा कर सकेंगे कि वे बाक़ी दो बड़ी ताक़तों से अपनी शर्तों पर "निपट" रहे हैं.
परमार ने कहा कि त्रिपक्षीय बैठक से ट्रंप ख़ुद को "ऐसे सौदागर के रूप में पेश कर सकेंगे, जिसके बिना काम नहीं चलता." वे यूक्रेन, व्यापार, ऊर्जा या हथियार नियंत्रण पर संभावित सौदों की बातें बढ़ा चढ़ाकर कर सकेंगे.
उन्होंने कहा, "मध्यावधि चुनावों के बाद विदेश नीति में एक 'जीत' की घरेलू राजनीतिक ज़रूरत असली है."
परमार ने कहा कि शी और पुतिन के साथ बैठे ट्रंप की कोई भी तस्वीर यह दिखाने के लिए इस्तेमाल हो सकती है कि मेज़ पर अब भी अमेरिका का दबदबा है, "भले ही उसमें ठोस बात कम हो या वह ज़्यादातर प्रतीकात्मक हो."
परमार ने कहा, "घरेलू दर्शक और उनका खिसकता मागा जनाधार, कम से कम उतना ही अहम है, जितना कूटनीतिक दर्शक."
चीन क्या चाहता है?
यूक्रेन पर शिखर बैठक तो नहीं.
जर्मनी की समाचार एजेंसी डीपीए के मुताबिक़ जर्मन राष्ट्रपति फ़्रैंक वाल्टर श्टाइनमायर ने बताया कि 30 अक्टूबर को बीजिंग में शी से मुलाक़ात के दौरान उन्होंने यूक्रेन पर चर्चा का विचार रखा था. उनके मुताबिक़ शी के चेहरे पर "हैरानी" साफ़ दिख रही थी.
श्टाइनमायर ने सरकारी प्रसारक एआरडी को बताया कि शी ने कहा कि तीनों राष्ट्रपति शायद शेनझेन में मिलेंगे, लेकिन यूक्रेन पर बात करने के लिए नहीं.
श्टाइनमायर के मुताबिक़ शी ने साफ़ कहा कि रूस यूक्रेन युद्ध एक यूरोपीय संघर्ष है, जिसमें "यूरोपीय देशों को मेज़ पर बैठना होगा."
बीजिंग परमाणु वार्ता के लिए ट्रंप के दबाव को भी शायद ठुकरा देगा.
पिछले महीने चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा था कि "इस चरण में चीन से तथाकथित त्रिपक्षीय परमाणु निरस्त्रीकरण वार्ता में शामिल होने को कहना न उचित है, न तर्कसंगत और न ही व्यावहारिक."
बाक़ी दुनिया के लिए इस बैठक का क्या मतलब होगा?
सहयोगी देश किनारे किए जा सकते हैं.
परमार ने कहा कि त्रिपक्षीय बैठक "1945 के बाद के तौर तरीक़े से साफ़ अलगाव" होगी. उस तौर तरीक़े में वॉशिंगटन मॉस्को या बीजिंग से बात करने से पहले अपने यूरोपीय और एशियाई सहयोगियों से क़रीबी तालमेल करता था.
उन्होंने कहा, "अपने आप में अलग से हुई त्रिपक्षीय बैठक से यह ख़तरा है कि सहयोगियों को दोयम दर्जे का खिलाड़ी मान लिया जाए, जिनके हितों को बाद में संभाल लिया जाएगा." उन्होंने यह भी जोड़ा कि उन हितों का सौदा भी किया जा सकता है.
परमार ने कहा कि यह "बड़ी ताक़तों की निजी कूटनीति" की ओर झुकाव होगा. लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि ट्रंप प्रशासन अब भी रूस और चीन के बीच दरार डालने की उम्मीद रखता है.
उन्होंने कहा कि "जी3" को लेकर डर "समझ में आता है, लेकिन संस्थागत लिहाज़ से बढ़ा चढ़ाकर आँका गया है." वजह यह है कि यूक्रेन, ताइवान, तकनीक और अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के नियमों पर तीनों राजधानियों के हित एक दूसरे से बहुत अलग हैं.
परमार ने कहा, "असली ख़तरा जी3 का कोई औपचारिक सचिवालय नहीं है. असली ख़तरा यह है कि सबसे ज़्यादा प्रभावित लोगों से बहुत कम सलाह लेकर बड़ी ताक़तों के सौदे आम बात बन जाएँ."
उन्होंने कहा, "इतिहास में ऐसे पलों की कई मिसालें हैं. इनसे शायद ही कभी स्थिर व्यवस्था बनती है, और अक्सर इसकी क़ीमत उन्हें चुकानी पड़ती है जिन्हें बाहर रखा गया."

