‘मकतूब मीडिया’ के मुताबिक, पश्चिम बंगाल में चर्चों, प्रार्थना सभाओं और पूजा स्थलों पर हो रहे हमलों के विरोध में गुरुवार को ईसाई समुदाय के सैकड़ों लोगों ने कोलकाता में मार्च निकाला. प्रदर्शनकारियों ने पिछले पांच महीनों में समुदाय को निशाना बनाकर हुई घटनाओं पर चिंता जताई और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने के साथ-साथ धार्मिक स्थलों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की. बंगीय क्रिस्टिया परिषद (बीसीपी) के अनुसार, मई से अब तक राज्य में ईसाई प्रार्थना सभाओं और पूजा स्थलों पर हमलों की कम से कम 48 घटनाएं सामने आई हैं, लेकिन इनमें से केवल 15 मामलों में प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज की गई है.
मार्च का समापन एस्प्लेनेड में हुआ, जहां प्रदर्शनकारियों ने चर्चों और ईसाई समुदाय के अन्य धार्मिक स्थलों पर कथित हमलों, तोड़फोड़ और धमकियों के खिलाफ आवाज उठाई. संगठन के मुताबिक, इन 48 घटनाओं में से सात मुख्यधारा के ईसाई संप्रदायों के चर्चों से जुड़ी थीं. इनमें छह कैथोलिक चर्च और एक चर्च ऑफ नॉर्थ इंडिया (सीएनआई) का चर्च शामिल है.
इससे पहले 1 नवंबर को बीसीपी ने एस्प्लेनेड स्थित रानी रश्मोनी रोड पर एक बड़ी प्रार्थना रैली आयोजित की थी. इसमें कोलकाता और आसपास के जिलों से लोग शामिल हुए थे. कई समूहों ने सियालदह, बिड़ला तारामंडल और हावड़ा से मार्च करते हुए रैली में हिस्सा लिया और ईसाई समुदाय के प्रति एकजुटता जताई.
गुरुवार को बीसीपी के पांच सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की पश्चिम बंगाल इकाई के प्रमुख जिष्णु बसु से मुलाकात की. बैठक में चर्चों और ईसाई प्रार्थना सभाओं पर हो रहे हमलों का मुद्दा उठाया गया. बीसीपी के मुलिक के मुताबिक, बसु ने कहा कि धार्मिक स्थलों पर हमले और उनमें तोड़फोड़ अस्वीकार्य हैं तथा किसी भी परिस्थिति में इन्हें उचित नहीं ठहराया जा सकता.
यह मुलाकात दक्षिण 24 परगना जिले के बासंती में एक नवनिर्मित चर्च में हुई तोड़फोड़ के कुछ दिन बाद हुई. आरोप है कि हिंदू संगठनों से जुड़ी भीड़ ने चर्च पर हमला किया था, जिसमें कई पादरी और चर्च के बिशप घायल हो गए थे. इसी दिन मालदा जिले के हरिश्चंद्रपुर में एक प्रार्थना सभा पर भी हमले की खबर सामने आई, हालांकि वहां किसी के घायल होने की सूचना नहीं मिली. इससे पहले 5 जुलाई को दक्षिण 24 परगना के सुभाषग्राम में एक निर्माणाधीन चर्च में भीड़ ने तोड़फोड़ की थी.
कोलकाता में आयोजित प्रदर्शन में कई ईसाई धर्मगुरु और धार्मिक संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हुए. इनमें ऑल इंडिया क्रिश्चियन काउंसिल और नेशनल फेडरेशन ऑफ चर्चेज के अध्यक्ष आर्चबिशप जोसेफ डिसूजा, बिशप श्यामल बोस, बिशप निर्मल गोम्स, बिशप सुबोध मंडल और नेशनल काउंसिल ऑफ बैपटिस्ट चर्चेज, ओडिशा के रेवरेंड समरेश नाइक शामिल थे.
कांग्रेस सांसद नसीर हुसैन ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि भाजपा-आरएसएस की धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति को अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकारों को कमजोर करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए. उन्होंने पश्चिम बंगाल सरकार से ईसाइयों और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा सुनिश्चित करने, हमलों के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने और प्रत्येक नागरिक को बिना किसी भय के अपने धर्म का पालन करने का अधिकार देने की मांग की.
पश्चिम बंगाल में ईसाई परिवारों, प्रार्थना सभाओं और चर्चों को निशाना बनाए जाने की अन्य घटनाएं भी सामने आई हैं. इससे पहले पश्चिम मेदिनीपुर जिले में तीन ईसाई परिवारों को कथित तौर पर बजरंग दल के सदस्यों ने परेशान किया और धमकाया था. क्षेत्र में काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुसार, इन परिवारों को जबरन धर्म परिवर्तन कराकर हिंदू धर्म अपनाने के लिए मजबूर किया गया. कार्यकर्ताओं ने यह आरोप भी लगाया कि परिवारों की महिलाओं, जिनमें एक नाबालिग लड़की भी शामिल थी, के साथ यौन उत्पीड़न किया गया और उनके कपड़े फाड़े गए.
इन घटनाओं के बीच ईसाई समुदाय के प्रतिनिधि पुलिस कार्रवाई, जवाबदेही और धार्मिक स्थलों की सुरक्षा की मांग कर रहे हैं. बीसीपी के आंकड़ों के मुताबिक, मई से अब तक सामने आई 48 घटनाओं में से केवल 15 मामलों में एफआईआर दर्ज की गई है. प्रदर्शनकारियों ने इसी स्थिति पर चिंता जताते हुए राज्य सरकार से प्रभावी कार्रवाई करने की मांग की है.

