ईरान युद्ध के कारण खाड़ी देशों को बासमती का निर्यात प्रभावित, भारत के चावल निर्यात में गिरावट

साल 2026 के पहले चार महीनों में भारत के चावल निर्यात में पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में मामूली गिरावट आई है. इसकी मुख्य वजह अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध के कारण खाड़ी के बाजारों में प्रीमियम बासमती चावल की खेप (शिपमेंट्स) का बाधित होना है.

‘रॉयटर्स’ में राजेंद्र जाधव की रिपोर्ट के अनुसार, विश्व के चावल निर्यात में 40% से अधिक की हिस्सेदारी रखने वाला भारत, आमतौर पर अगले तीन सबसे बड़े आपूर्तिकर्ताओं—थाईलैंड, वियतनाम और पाकिस्तान—के कुल संयुक्त निर्यात से भी अधिक चावल निर्यात करता है. निर्यात में इस गिरावट से भारतीय घरेलू कीमतों पर दबाव और बढ़ेगा, जो इस साल चावल की रिकॉर्ड पैदावार के बाद पहले ही 5% से अधिक गिर चुकी हैं.

अधिकारियों ने बताया कि जनवरी से अप्रैल के दौरान देश का चावल निर्यात एक साल पहले की तुलना में 1.3% गिरकर 8.39 मिलियन (83.9 लाख) मीट्रिक टन रह गया. इस अवधि के दौरान बासमती चावल का निर्यात 7% गिरकर 2.3 मिलियन (23 लाख) मीट्रिक टन रह गया, क्योंकि ईरान सहित अन्य बाजारों में इसकी खेप भेजने में कमी आई. वहीं, गैर-बासमती (नॉन-बासमती) चावल का निर्यात पिछले वर्ष के 6.03 मिलियन टन से थोड़ा बढ़कर 6.09 मिलियन टन हो गया.

नई दिल्ली के एक निर्यातक ने बताया कि ईरान युद्ध समाप्त होने तक निर्यात के सामान्य स्तर से नीचे रहने की आशंका है. उन्होंने कहा कि संघर्ष के कारण ईरान, इराक, कतर और सऊदी अरब जाने वाले चावल के जहाज रास्ते में ही फंसे या लेट हो रहे हैं, जिसके चलते खरीदार और निर्यातक नए सौदे करने से बच रहे हैं.

भारत मुख्य रूप से बांग्लादेश, बेनिन, आइवरी कोस्ट, गिनी और कैमरून जैसे देशों को गैर-बासमती चावल भेजता है, जबकि इसका प्रीमियम बासमती चावल मुख्य रूप से सऊदी अरब, इराक, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के खरीदारों के पास जाता है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले साल तक ईरान भारतीय बासमती चावल का सबसे बड़ा बाजार था, लेकिन इसके बाद सऊदी अरब इससे आगे निकल गया.

ईरान पर अमेरिका-इजरायल के हवाई हमलों (एयरस्ट्राइक) से युद्ध शुरू होने के बाद से शिपिंग बीमा (इंश्योरेंस) और माल ढुलाई (फ्रेट) की लागत बढ़ गई है, जिससे होर्मुज जलडमरू मध्य के रास्ते समुद्री यातायात बाधित हुआ है. इसका असर अफ्रीकी खरीदारों की ओर से आने वाली गैर-बासमती चावल की मांग पर भी पड़ा है. वैश्विक चावल बाजार में भारत की प्रतिस्पर्धा थाईलैंड, वियतनाम, म्यांमार और पाकिस्तान से होती है.

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