भारत के युवा विद्रोही और उम्मीद से भरे हैं, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है — आगे कठिन और लंबे काम का पहाड़ खड़ा है 

‘आर्टिकल 14’ के मुताबिक, दिसंबर 1973 में गुजरात के कॉलेज छात्रों ने बढ़े हुए भोजन खर्च के खिलाफ प्रदर्शन शुरू किया था. जल्द ही यह आंदोलन खराब शिक्षा व्यवस्था, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़े राजनीतिक आंदोलन में बदल गया. ‘नवनिर्माण’ आंदोलन के दबाव में तत्कालीन मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल को इस्तीफा देना पड़ा. आधी सदी से ज्यादा समय बाद 2026 का ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ यानी सीजेपी आंदोलन उसी पुराने असंतोष का आधुनिक रूप दिखाई देता है. परिस्थितियां अलग हैं, लेकिन मूल समस्या वही है — खराब शिक्षा व्यवस्था, रोजगार के सीमित अवसर और युवाओं के भविष्य को लेकर बढ़ती बेचैनी.

इस बार आंदोलन को नीट परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक होने की घटना ने गति दी. करीब 23 लाख छात्रों को दोबारा परीक्षा देनी पड़ी और इस संकट के बीच करीब एक दर्जन छात्रों ने आत्महत्या की. दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर पुलिस कार्रवाई ने गुस्सा और बढ़ाया. सोशल मीडिया पर हास्य और व्यंग्य के जरिए आंदोलन को व्यापक समर्थन मिला. अंततः तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा आंदोलन की बड़ी उपलब्धि बना. सोनम वांगचुक ने इसे ‘लोकतंत्र की जीत’ कहा, जबकि अरविंद केजरीवाल ने इसे युवाओं की बड़ी जीत बताया.

लेकिन अशोक मोदी के अनुसार, एक मंत्री का इस्तीफा उस समस्या का समाधान नहीं है जो पांच दशक से अधिक समय से बनी हुई है. असली चुनौती शिक्षा और रोजगार की पूरी व्यवस्था को बदलना है.

भारत में हर साल करीब 2.5 करोड़ युवा स्कूल छोड़ने की उम्र तक पहुंचते हैं. इनमें करीब 40 प्रतिशत यानी एक करोड़ बच्चे हाई स्कूल पूरा करने से पहले पढ़ाई छोड़ देते हैं. कॉलेज पूरा करने से पहले लगभग 50 लाख और युवा बाहर हो जाते हैं. इस तरह करीब एक करोड़ युवा ही उच्च शिक्षा तक पहुंच पाते हैं.

इसके बाद अवसरों के लिए बेहद कठिन प्रतिस्पर्धा शुरू होती है. इस वर्ष करीब 23 लाख छात्रों ने नीट परीक्षा दी, लेकिन मेडिकल सीटें लगभग 1.5 लाख हैं. इंजीनियरिंग में करीब 15 लाख छात्रों ने प्रतिस्पर्धा की, जबकि आईआईटी में 20 हजार से भी कम और अन्य प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग संस्थानों में करीब 50 हजार सीटें हैं. सीयूईटी-यूजी में लगभग 12 लाख छात्रों ने परीक्षा दी, जबकि प्रमुख सार्वजनिक विश्वविद्यालयों में गैर-मेडिकल और गैर-इंजीनियरिंग पाठ्यक्रमों के लिए करीब तीन लाख सीटें हैं.

इसका मतलब है कि 2.5 करोड़ युवाओं की एक पीढ़ी में केवल करीब 52 लाख को ही अच्छे मेडिकल, इंजीनियरिंग या सामान्य उच्च शिक्षा कार्यक्रमों में जगह मिली. यानी हर 100 युवाओं में केवल करीब दो को ऐसा रास्ता मिला, जो अच्छे रोजगार की मजबूत संभावना देता है.

बाकी लाखों युवा कमजोर गुणवत्ता वाले दूसरे और तीसरे स्तर के विश्वविद्यालयों तथा निजी संस्थानों में चले जाते हैं. मानवविज्ञानी क्रेग जेफरी ने ऐसे युवाओं को ‘टाइमपास छात्र’ कहा था. वे एक के बाद एक डिग्रियां हासिल करते हैं और फिर सरकारी नौकरियों की प्रतियोगी परीक्षाओं में लाखों उम्मीदवारों के साथ प्रतिस्पर्धा करते हैं. झारखंड के छात्र आंदोलनों में ऐसे युवाओं की बड़ी संख्या दिखाई देती है, जिनकी जिंदगी स्थगित परीक्षाओं, रद्द भर्तियों और वर्षों की तैयारी में फंस गई है.

शिक्षा व्यवस्था की यह समस्या सीधे रोजगार संकट में बदलती है. भारत की कामकाजी उम्र की आबादी करीब एक अरब है और लगभग 40 प्रतिशत लोग न तो रोजगार में हैं और न ही रोजगार तलाश रहे हैं. काम करने वालों में बड़ी संख्या कृषि और अनौपचारिक क्षेत्र में है. करीब 90 प्रतिशत कार्यबल अनौपचारिक क्षेत्र में है, जहां आय कम और रोजगार असुरक्षित है.

इस संकट की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी गुणवत्तापूर्ण शिक्षक हैं. भारत में शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों की खराब गुणवत्ता और भ्रष्टाचार पर वर्षों से सरकारी समितियां सवाल उठाती रही हैं. आनंद सरूप समिति, सुदीप बनर्जी समिति, जस्टिस जेएस वर्मा आयोग और टीएसआर सुब्रमण्यम समिति ने शिक्षक प्रशिक्षण व्यवस्था की कमियों की ओर ध्यान दिलाया. कई रिपोर्टों में फर्जी प्रमाणपत्र और कमजोर प्रशिक्षण संस्थानों की समस्या सामने आई, लेकिन बुनियादी सुधार नहीं हुआ.

2026 में भी नीति आयोग ने शिक्षकों की स्थिति पर चिंता जताई है. सरकारी स्कूलों के शिक्षक पढ़ाने के अलावा सर्वेक्षण, चुनावी काम और प्रशासनिक जिम्मेदारियां निभाते हैं. इससे उनका शिक्षण समय कम होता है. कई शिक्षक कक्षा की वास्तविक जरूरतों के लिए पर्याप्त रूप से तैयार नहीं हैं. निजी स्कूलों में कम वेतन, सीमित सुविधाएं और नौकरी की असुरक्षा अलग समस्या है.

भारत ने शिक्षा सुधार के लिए निजी स्कूलों, कोचिंग और तकनीक पर भरोसा किया, लेकिन ये अच्छे शिक्षक का विकल्प नहीं बन सके. बायजूज जैसी एडटेक कंपनियों का संकट भी दिखाता है कि शिक्षा की मूल समस्या तकनीकी नहीं है. कमजोर शिक्षक कमजोर छात्रों को तैयार करते हैं और यह समस्या अगली पीढ़ी तक पहुंचती है.

शिक्षा और रोजगार सुधार की सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि इसका राजनीतिक लाभ तुरंत नहीं मिलता. अच्छे शिक्षक तैयार करने, बेहतर प्रशिक्षण देने, विश्वविद्यालयों में खाली पद भरने और रोजगार पैदा करने में वर्षों लगते हैं. इसके लिए शिक्षक भर्ती, वेतन, प्रशिक्षण, करियर, स्कूल नेतृत्व, पोषण, सुरक्षित वातावरण और संस्थागत जवाबदेही जैसे कई क्षेत्रों में एक साथ काम करना होगा.

राजनीति इसके बजाय दिखाई देने वाली समस्याओं पर तेजी से प्रतिक्रिया देती है. पेपर लीक हुआ तो उसे रोकने के लिए कड़े कानून और सजा की व्यवस्था की जाती है. सरकार ने 2026 में सार्वजनिक परीक्षाओं में अनुचित साधनों को रोकने के लिए कानून में संशोधन और परीक्षा व्यवस्था सुधारने के लिए उच्चस्तरीय समिति की दिशा में कदम उठाए हैं. लेकिन पेपर लीक केवल समस्या का एक लक्षण है. जब अच्छे कॉलेज और रोजगार के रास्ते बेहद सीमित हों, तो भ्रष्टाचार और शॉर्टकट की मांग बढ़ती है.

सीजेपी आंदोलन के बाद अभिजीत दीपके ने ‘क्या बोलती है पब्लिक’ अभियान शुरू किया है, जबकि राहुल गांधी ने ‘छात्रों की गूंज’ के जरिए पेपर लीक, महंगे निजी कॉलेज, कोचिंग संस्थानों और रोजगार की कमी जैसे मुद्दे उठाए हैं. लेकिन व्यापक शिक्षा सुधार का स्पष्ट और दीर्घकालिक राजनीतिक कार्यक्रम अभी दिखाई नहीं देता.

अशोक मोदी का तर्क है कि लोकतंत्र अपने आप व्यवस्था को ठीक नहीं करता. विरोध, चुनाव और सत्ता परिवर्तन तभी बदलाव ला सकते हैं, जब राजनीतिक व्यवस्था कठिन और लंबे समय वाले काम को प्राथमिकता दे. भारत में शिक्षा और रोजगार अक्सर चुनावी नारों में दिखाई देते हैं, लेकिन इनके लिए पीढ़ियों तक लगातार काम करने की राजनीतिक इच्छा कमजोर रही है.

इसलिए धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा युवाओं के लिए राजनीतिक जीत हो सकता है, लेकिन असली चुनौती इससे कहीं बड़ी है. भारत को गुणवत्तापूर्ण शिक्षक, मजबूत शिक्षा संस्थान, बेहतर उच्च शिक्षा और बड़े पैमाने पर अच्छे रोजगार पैदा करने होंगे. युवाओं में गुस्सा और उम्मीद दोनों हैं, लेकिन केवल उम्मीद पर्याप्त नहीं है. दशकों की उपेक्षा से खड़ा यह पहाड़ आसान नारों से नहीं, बल्कि लंबे, कठिन और लगातार किए जाने वाले काम से ही चढ़ा जा सकता है.

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