‘नमामि गंगे’ पर हजारों करोड़ खर्च, फिर भी गंदा बह रहा है गंगा का पानी
उत्तराखंड में गंगा को स्वच्छ बनाने के लिए केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना ‘नमामि गंगे’ पर भारी धनराशि खर्च किए जाने के बावजूद नदी को प्रदूषण से मुक्त नहीं किया जा सका है. भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की ताजा ऑडिट रिपोर्ट बताती है कि राज्य में स्थापित एक-तिहाई से अधिक सीवेज शोधन संयंत्र बिना शोधन किए हुए गंदे पानी को सीधे गंगा में छोड़ रहे हैं. रिपोर्ट के अनुसार योजना के क्रियान्वयन, निगरानी और रखरखाव में गंभीर खामियों के कारण गंगा में अशोधित सीवेज गिरने से रोकने का मुख्य लक्ष्य हासिल नहीं हो पाया.
‘डाउन टू अर्थ’ की रिपोर्ट के मुताबिक, गंगा प्रदूषण को नियंत्रित करने के उद्देश्य से वर्ष 2014 में नमामि गंगे कार्यक्रम शुरू किया गया था. इसके तहत गंगा बेसिन के राज्यों को सीवेज शोधन संयंत्र स्थापित करने, सीवर नेटवर्क विकसित करने और अपशिष्ट जल के उपचार की व्यवस्था बनाने के लिए धन उपलब्ध कराया गया. वर्ष 2017 में हुए ऑडिट में भी गंगा के विभिन्न हिस्सों में प्रदूषण के उच्च स्तर पाए गए थे और कई सुधारात्मक सुझाव दिए गए थे. लेकिन सीएजी की नई रिपोर्ट बताती है कि उत्तराखंड सरकार ने नगर निकायों के कचरे के वैज्ञानिक निपटान, सीवेज शोधन संयंत्रों की क्षमता वृद्धि और अन्य प्रमुख सुधारात्मक उपायों को प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया.
रिपोर्ट के अनुसार राज्य के 44 सीवेज शोधन संयंत्रों में से 12 गंगा में बिना उपचारित सीवेज छोड़ रहे हैं. ऋषिकेश, कीर्तिनगर, रुद्रप्रयाग और श्रीकोट के कुछ संयंत्रों में उपचार क्षमता अपर्याप्त होने के कारण गंदा पानी सीधे नदी में पहुंच रहा है. वहीं रुद्रप्रयाग, गोपेश्वर और कर्णप्रयाग में नालों को संयंत्रों तक ले जाने वाली प्रणालियों में रिसाव और क्षति की समस्या सामने आई है.
सीएजी ने संयंत्रों के संचालन और रखरखाव को भी गंभीर चिंता का विषय बताया है. राज्य की सीवेज अवसंरचना के रखरखाव के लिए जिम्मेदार उत्तराखंड जल संस्थान ने निर्माण, सुरक्षा और संचालन संबंधी कमियों का हवाला देते हुए 18 संयंत्रों का प्रभार लेने से इनकार कर दिया. रिपोर्ट में निगरानी की विफलता का भी उल्लेख है. वर्ष 2023 में ऋषिकेश में एक ठेकेदार द्वारा बिना उपचारित सीवेज सीधे गंगा में छोड़े जाने का मामला सामने आया था, लेकिन उसके खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की गई.
नदी में प्रदूषण के स्तर का आकलन करने के लिए सीएजी ने मलजनित जीवाणुओं की मात्रा का अध्ययन किया. इसकी स्वीकार्य सीमा प्रति 100 मिलीलीटर पानी में 1,000 इकाई मानी जाती है. लेकिन 28 संयंत्रों के नमूनों में यह स्तर 1,700 से लेकर 2,400 अरब इकाई तक दर्ज किया गया. जांच में जस्ता और कैडमियम जैसी भारी धातुओं की मौजूदगी भी पाई गई. अधिकांश संयंत्र राष्ट्रीय हरित अधिकरण और पर्यावरण मंत्रालय द्वारा निर्धारित मानकों को पूरा नहीं कर रहे हैं. रिपोर्ट में केंद्रीय और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों के आंकड़ों में भी विसंगतियां दर्ज की गई हैं.
वित्तीय पक्ष पर नजर डालें तो वर्ष 2018 से 2023 के बीच उत्तराखंड के लिए 1,149 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए थे. राज्य को वास्तविक रूप से 985.98 करोड़ रुपये प्राप्त हुए, जिनमें से 873.17 करोड़ रुपये खर्च कर दिए गए. इसके बावजूद सीवर नेटवर्क का विस्तार और घरों को उससे जोड़ने का काम अधूरा है. नंदप्रयाग, कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग और जोशीमठ सहित सात कस्बों के 21 संयंत्र आज भी कार्यशील सीवर प्रणाली से नहीं जुड़े हैं.
रिपोर्ट यह भी बताती है कि गंगा किनारे बसे 16 शहरों में राज्य सरकार ने अपने संसाधनों से कोई सीवेज शोधन संयंत्र या स्वच्छता अवसंरचना विकसित नहीं की. अधिकांश परियोजनाएं केंद्रीय सहायता और योजनाओं पर ही निर्भर रहीं.
सामाजिक ऑडिट में सीवर कनेक्शन की स्थिति भी बेहद खराब पाई गई. चमोली-गोपेश्वर में 5,510 घरों में से केवल 354 घर यानी 6.4 प्रतिशत ही सीवर नेटवर्क से जुड़े थे. उत्तरकाशी में 6,089 घरों में से 572 घर और श्रीनगर में 6,523 घरों में से 797 घर ही नेटवर्क से जुड़े पाए गए. ऋषिकेश में स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर थी, जहां 34,756 घरों में से 9,966 घरों को सीवर कनेक्शन मिला हुआ था.
संयंत्रों की क्षमता और उपयोग में भी भारी असंतुलन देखा गया. हरिद्वार में 68 मिलियन लीटर प्रतिदिन क्षमता वाला एक संयंत्र मार्च 2023 तक औसतन 71 मिलियन लीटर प्रतिदिन सीवेज का उपचार कर रहा था, जबकि कई बार इसमें 84 मिलियन लीटर तक प्रवाह पहुंच गया. दूसरी ओर ऋषिकेश का 5 मिलियन लीटर प्रतिदिन क्षमता वाला संयंत्र लगभग 17 मिलियन लीटर प्रतिदिन सीवेज प्राप्त कर रहा था. इसके विपरीत देवप्रयाग का संयंत्र पर्याप्त सीवेज न मिलने के कारण अपनी क्षमता के केवल 3 से 4 प्रतिशत पर संचालित हो रहा था.
नमामि गंगे के क्रियान्वयन के लिए बनाई गई राज्य स्वच्छ गंगा मिशन संस्था ने स्थापना के 13 वर्ष बाद भी राज्य स्तरीय नदी बेसिन प्रबंधन योजना तैयार नहीं की है. जिला गंगा समितियां भी कोई ठोस योजना नहीं बना सकी हैं. सीएजी का कहना है कि व्यापक और दीर्घकालिक योजना के अभाव में बड़े पैमाने पर परियोजनाएं लागू की गईं, जिसके कारण अपेक्षित परिणाम नहीं मिल सके.
गंगा की स्वच्छता के लिए हजारों करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद उत्तराखंड में बुनियादी ढांचे, निगरानी और योजना निर्माण की कमजोरियां साफ दिखाई देती हैं. सीएजी की रिपोर्ट संकेत देती है कि यदि परियोजनाओं की योजना, संचालन और जवाबदेही में सुधार नहीं किया गया तो गंगा को प्रदूषण मुक्त बनाने का लक्ष्य अभी भी दूर ही रहेगा.

