सीमित फायदा: इथेनॉल-मिश्रित ईंधन को बिना सोचे-समझे थोपा नहीं जाना चाहिए

 ‘द हिंदू’ ने अपने संपादकीय में लिखा है कि जब तेल की कीमतें 70 डॉलर प्रति बैरल से कम हो चली हैं, वैसे में “किसानों को उचित फायदा देने” के लिए शुद्ध पेट्रोल के मुकाबले ज्यादा लागत पर ई20 पेट्रोल का उत्पादन जारी रखने की भारत सरकार की नीति ऊपर से देखने में बहुत अच्छी लगती है. लेकिन असल में यह एक भ्रामक प्रस्ताव है. मिश्रित ईंधन कार्यक्रम (फ्यूल-ब्लेंडिंग प्रोग्राम) के वास्ते ज्यादातर कच्चा माल (फीडस्टॉक) गन्ने से आता है. गन्ना भारत की उन फसलों में से एक है जिनमें सबसे ज्यादा पानी और उर्वरक की जरूरत होती है और इसे मुख्य रूप से पानी की कमी वाले महाराष्ट्र और कर्नाटक में उगाया जाता है. मिश्रित ईंधन की इस नीति से होने वाला कुल आर्थिक फायदा सकारात्मक बना रहेगा या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि कच्चे तेल के कम आयात, पर्यावरण में सुधार और ग्रामीण आय में बढ़ोतरी से होने वाला फायदा इन अतिरिक्त लागतों से ज्यादा हो. दक्षता भी चिंता का एक सबब बनी हुई है. उपभोक्ताओं - जिनमें गन्ने के किसानों से भी गरीब लोग शामिल हैं – द्वारा पेट्रोल पंप पर ज्यादा कीमत चुकाए जाने, तेल मार्केटिंग कंपनियों द्वारा निर्धारित कीमत पर इथेनॉल खरीदे जाने, आसवन संयंत्रों (डिस्टिलरियों) द्वारा फीडस्टॉक खरीदे जाने के बाद ही किसानों को ज्यादा कीमत मिलती है. फीडस्टॉक की ज्यादा कीमतें किसानों की कम आय के ज्यादातर कारणों, मसलन फसल की कटाई के बाद होने वाला नुकसान और बाजार तक सीमित पहुंच, का समाधान भी नहीं करती हैं. सबसे अहम बात यह है कि अगर सरकार इथेनॉल की हर यूनिट के लिए इनाम देती है, चाहे वह किसी भी फीडस्टॉक से बनी हो, तो यह नीति उस फीडस्टॉक के पक्ष में झुकेगी जिसका आधार सबसे बड़ा है: यानी गन्ना. इसके बजाय, इसके लक्ष्यों में संसाधनों का कुशल इस्तेमाल और खाद्य सुरक्षा शामिल होनी चाहिए. राज्य सिंचाई एवं लॉजिस्टिक्स में निवेश कर सकता है और इथेनॉल बनाने वालों तथा सहकारी समितियों के साथ राजस्व-साझाकरण की व्यवस्था लागू कर सकता है.

भारत ने मक्का और अनाज से इथेनॉल बनाने की क्षमता को तेजी से बढ़ाने को प्रोत्साहन दिया है. समय-समय पर फूड कॉरपोरेशन के पास मौजूद अतिरिक्त या खराब चावल से इथेनॉल बनाने की इजाजत भी दी गई है. साथ ही, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय की योजनाओं के तहत चावल के भूसे जैसे खेती के कचरे का इस्तेमाल करने वाले व्यावसायिक संयंत्रों (कमर्शियल प्लांट) को भी मदद दी गई है. मक्का और मोटे अनाज (मिलेट्स) को कम पानी की जरूरत होती है, लेकिन मक्के के लिए काफी मात्रा में खाद-उर्वरक चाहिए होते हैं. जबकि, मोटे अनाज से प्रति हेक्टेयर कम खमीर उठने योग्य (फर्मेंटेबल) स्टार्च मिलता है. गन्ने की तुलना में मीठे ज्वार को कम पानी की जरूरत होती है और इसकी फसल कम समय में तैयार हो जाती है. चावल व गेहूं का भूसा, मक्के के डंठल और मूंगफली के छिलके जैसे लिग्नोसेल्युलोजिक बायोमास भी दूसरी पीढ़ी (2जी) के इथेनॉल के उत्पादन में सहायक हो सकते हैं. कृषि के अवशेषों से प्राप्त 2जी इथेनॉल ईंधन के लिए कृषि भूमि के उपयोग को कम कर सकता है, जिससे खाद्य फसलों के साथ प्रतिस्पर्धा कम होगी और पराली जलाने की समस्या का समाधान होगा. यह ज्यादा महंगा और तकनीकी रूप से ज्यादा जटिल है, लेकिन सक्रिय नीति निर्माण के साथ इस समस्या का बेहतर समाधान किया जा सकता है. सरकार अवशेषों से उत्पादित इथेनॉल के लिए प्रीमियम का भुगतान कर सकती है और फसल अवशेषों को एकत्र करने एवं भंडारण के लिए उपकरण व बुनियादी ढांचे पर सब्सिडी दे सकती है, संग्राहकों और डिस्टिलरियों के बीच अनुबंधों को सुगम बना सकती है तथा व्यवहार्यता अंतर निधि (वायबिलिटी-गैप फंडिंग) एवं खरीद संबंधी समझौते मुहैया करा सकती है. अंत में, इथेनॉल नीति को कृषि नीति से स्वतंत्र नहीं होनी चाहिए. और आयात प्रतिस्थापन इस बात का बहाना नहीं है कि उपभोक्ताओं को शुद्ध पेट्रोल के मुकाबले कम माइलेज वाले ईंधन के लिए अधिक कीमत चुकाने के लिए मजबूर किया जाए.

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