टी. नवीन | जवाबदेही के बिना सत्ता: भाजपा की कहानी
टी. नवीन का तर्क है कि लोकतंत्र एक झटके में समाप्त नहीं होता, बल्कि धीरे-धीरे कमजोर पड़ता है. इसकी शुरुआत तब होती है, जब सत्ता से सवाल पूछे जाने कम हो जाते हैं, संस्थाएं अपनी स्वतंत्र भूमिका निभाने से पीछे हटने लगती हैं और सरकारें अपनी गलतियों के लिए जवाबदेह महसूस नहीं करतीं. हर सरकार से गलतियां हो सकती हैं, लेकिन लोकतंत्र की असली कसौटी यह है कि उन गलतियों पर जवाबदेही तय होती है या नहीं.
लेख में पिछले एक दशक के दौरान केंद्र की भाजपा सरकार के कामकाज का हवाला देते हुए यह सवाल उठाया गया है कि क्या लोकतांत्रिक जवाबदेही राजनीतिक शक्ति के मुकाबले कमजोर पड़ती जा रही है. तर्क दिया गया है कि कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर जनता ने जवाब मांगा, लेकिन जवाब देने के बजाय देरी, टालमटोल या टकराव का रास्ता अपनाया गया.
शिक्षा के क्षेत्र में परीक्षा पत्र लीक की घटनाओं को इसका प्रमुख उदाहरण बताया गया है. लाखों छात्र वर्षों तक मेहनत करते हैं, परिवार अपनी बचत और उम्मीदें लगाते हैं, लेकिन पेपर लीक होने से उनका भविष्य प्रभावित होता है. इसके बावजूद राजनीतिक स्तर पर जिम्मेदारी तय होने के उदाहरण बहुत कम दिखाई देते हैं. छात्रों के विरोध प्रदर्शन, शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग और देशव्यापी नाराजगी के बावजूद व्यवस्था लगभग पहले की तरह चलती रहती है.
राम मंदिर को मिले सोने, चांदी, आभूषण और नकद दान के प्रबंधन तथा पारदर्शिता को लेकर उठे सवालों का भी उल्लेख किया गया है. नागरिकों ने स्पष्ट जानकारी मांगी, लेकिन पर्याप्त पारदर्शिता सामने नहीं आई. इसी तरह वर्षों तक सरकारी पदों का खाली रहना, भर्ती प्रक्रियाओं में देरी और शिक्षित युवाओं की बढ़ती बेरोजगारी को भी जवाबदेही के संकट से जोड़कर देखा गया है. लाखों युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में अपने जीवन के महत्वपूर्ण वर्ष गुजार देते हैं, जबकि रोजगार के अवसर अपेक्षित गति से नहीं बढ़ते.
ई-20 ईंधन नीति को भी इसी संदर्भ में रखा गया है. वाहन विशेषज्ञों और उपभोक्ता संगठनों ने पुराने वाहनों पर इसके प्रभाव और पर्याप्त जानकारी उपलब्ध कराने की जरूरत पर सवाल उठाए, लेकिन नीति लागू होने के बाद भी इन चिंताओं पर व्यापक सार्वजनिक संवाद नहीं हुआ.
पर्यावरण के मोर्चे पर कहा गया है कि विकास परियोजनाओं, खनन और औद्योगिक विस्तार के कारण जंगलों, जैव विविधता और आदिवासी समुदायों पर लगातार दबाव बढ़ा है. आलोचकों के अनुसार बड़े कॉरपोरेट समूहों को इसका लाभ मिला, जबकि किसानों, आदिवासियों, मछुआरों और स्थानीय समुदायों को पर्यावरणीय नुकसान झेलना पड़ा. नदियों का प्रदूषण, सिकुड़ती झीलें, बढ़ती गर्मी और हर साल लौटने वाला वायु प्रदूषण भी इसी व्यापक संकट का हिस्सा बताए गए हैं.
बुनियादी ढांचे की विफलताओं को भी इसी प्रवृत्ति का उदाहरण माना गया है. रेल दुर्घटनाओं में लोगों की जान जाती है, पुल उद्घाटन के कुछ समय बाद ही गिर जाते हैं, सड़कें पहली बारिश में टूट जाती हैं और सार्वजनिक धन दोबारा खर्च करना पड़ता है. हादसों के बाद जांच समितियां बनती हैं, मुआवजे की घोषणा होती है, लेकिन उच्च स्तर पर जवाबदेही बहुत कम तय होती है.
शासन व्यवस्था से जुड़े कई अन्य मुद्दों का भी उल्लेख किया गया है. संसद में सीमित बहस के साथ विधेयक पारित होना, इंटरनेट बंद करने की बढ़ती घटनाएं, पत्रकारों पर दबाव के आरोप, जांच एजेंसियों की निष्पक्षता पर उठते सवाल, किसानों के लंबे आंदोलन और बढ़ती महंगाई को लोकतांत्रिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली से जोड़कर देखा गया है.
इन घटनाओं को अलग-अलग देखने पर हर मामले का अलग कारण हो सकता है, लेकिन जब ऐसी स्थितियां लगातार दोहराई जाएं तो वे शासन की एक व्यापक प्रवृत्ति का संकेत बन जाती हैं. सवालों का जवाब टलने लगे, संसद में चर्चा कम हो, सूचना हासिल करना कठिन हो जाए, आलोचना को विरोध या राष्ट्रविरोध के रूप में देखा जाए और सार्वजनिक विमर्श की जगह राजनीतिक निष्ठा को अधिक महत्व मिलने लगे, तो लोकतंत्र की बुनियाद कमजोर होने लगती है.
संसद, न्यायपालिका, मीडिया, संवैधानिक संस्थाएं और नागरिक समाज केवल सरकार के काम में सहयोग देने के लिए नहीं, बल्कि उसे जवाबदेह बनाए रखने के लिए भी मौजूद हैं. लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने तक सीमित नहीं है. चुनाव सरकार को शासन करने का अधिकार देते हैं, लेकिन उससे जवाबदेही की जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती.
अंत में निष्कर्ष निकाला गया है कि किसी भी सरकार की लोकतांत्रिक वैधता केवल चुनावी जीत से तय नहीं होती. असली कसौटी यह है कि सत्ता में रहते हुए वह कितनी पारदर्शिता, विनम्रता, संवैधानिक मर्यादा और जवाबदेही का पालन करती है. चुनाव यह तय करते हैं कि सरकार कौन बनाएगा, लेकिन जवाबदेही ही तय करती है कि वह सरकार वास्तव में लोकतांत्रिक तरीके से शासन कर रही है या नहीं.
टी. नवीन का यह लेख Countercurrents.org पर प्रकाशित अंग्रेजी लेख का हिंदी में अनुदित अंश है.

