593 मौतें, 261 गायब: सफाईकर्मियों की मौत पर दलितों का प्रतिरोध

'काउंटरकरंट्स' में रेव. ई. इमैनुएल नेहेमायाह ने सफाईकर्मियों की मौत, सरकारी आंकड़ों और दलितों के साथ होने वाले जातिगत भेदभाव को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं. लेख की शुरुआत इस आरोप से होती है कि केंद्र की भाजपा सरकार और स्थानीय कांग्रेस सरकार सफाईकर्मियों की मौतों को आंकड़ों से मिटाने की राजनीति कर रही हैं. जमीनी आंकड़ों में जनवरी 2021 से जून 2026 के बीच सीवर और सेप्टिक टैंक में 593 मौतें दर्ज हैं, जबकि संसद में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री रामदास आठवले ने 332 मौतों का आंकड़ा बताया. दोनों के बीच 261 मौतों का अंतर है.

21 जुलाई 2026 को संसद में रामदास आठवले ने बताया कि जनवरी 2021 से जून 2026 के बीच सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान 332 लोगों की मौत हुई. इसके छह दिन बाद, 27 जुलाई को सफाई कर्मचारी आंदोलन के संयोजक और मैग्सेसे पुरस्कार विजेता बेजवाड़ा विल्सन ने दिल्ली में 593 मौतों का आंकड़ा जारी किया. उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने 261 मौतों को छिपाया है. 2026 में ही अब तक 113 लोगों की मौत होने और अकेले जुलाई में 15 मौतें होने की बात कही गई. उन्होंने #stopkillingus (हमें मारना बंद करो)  के जरिए सरकार से सफाईकर्मियों की मौत रोकने की अपील की.

उसी दिन सुप्रीम कोर्ट ने मैनुअल स्कैवेंजिंग से जुड़े लंबे समय से चल रहे मामले में 15 राज्यों के मुख्य सचिवों को अवमानना नोटिस जारी किया. इनमें कर्नाटक, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश और दिल्ली शामिल हैं. अक्टूबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने 14 निर्देश जारी किए थे, जिनमें मैनुअल सफाई पर रोक, मशीनों की उपलब्धता, 30 लाख रुपये मुआवजा और प्रभावित परिवारों के पुनर्वास जैसे प्रावधान थे. जनवरी 2025 में छह महानगरों में मैनुअल स्कैवेंजिंग पर रोक लगाई गई थी.

इसके बावजूद न्यायालय को बताया गया कि 2024 में 54 और 2025 में 46 लोगों की मौत हुई, और ये केवल सरकार द्वारा स्वीकार की गई मौतें हैं. अदालत ने कहा कि उसके निर्देश जमीनी स्तर तक प्रभावी रूप से नहीं पहुंचे हैं और ठेकेदारों के ऊपर जिम्मेदारी डालकर सरकार बच नहीं सकती.

सफाईकर्मियों की मांग और मंत्री का बयान

5 सितंबर 2026 को कर्नाटक के ग्रेटर बेंगलुरु विकास मंत्री कृष्णा बायरे गौड़ा अगरा झील के निरीक्षण पर पहुंचे. वहां सफाईकर्मियों ने उनसे नियमितीकरण और स्थायी नौकरी की मांग की. इनमें करीब 95 प्रतिशत दलित महिलाएं हैं, जो वर्षों से ठेके पर काम कर रही हैं.

इन महिलाओं के बारे में बताया गया है कि वे करीब 20 वर्षों से बेंगलुरु के रोजाना लगभग 6,000 टन कचरे की सफाई कर रही हैं. उन्हें ईएसआई, पीएफ, दस्ताने, मास्क, पीने का पानी और 12 घंटे की ड्यूटी के दौरान शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाएं तक नहीं मिलतीं.

मंत्री ने जवाब में सफाईकर्मियों के बीच करीब 30 प्रतिशत अनुपस्थिति का सवाल उठाया और पूछा कि जो लोग काम पर नहीं आते उन्हें स्थायी नौकरी क्यों दी जाए. उद्योगपति किरण मजूमदार-शॉ ने भी सोशल मीडिया पर मंत्री के बयान का समर्थन किया और कहा कि शहर साफ नहीं होगा तो स्थायी नौकरी का सवाल नहीं उठना चाहिए.

593 और 332 के बीच 261 मौतें

593 और 332 का अंतर 261 है. ये 261 केवल आंकड़े नहीं हैं. इनमें कर्नाटक के कोलार, पीण्या, व्हाइटफील्ड और मैसूर रोड जैसे इलाकों में सीवर और मैनहोल में उतरने वाले मदिगा, होलेया और वाल्मीकि समुदायों के लोग शामिल हैं.

सफाई कर्मचारी आंदोलन और दूसरे नागरिक संगठनों के पास इन मौतों का अलग रिकॉर्ड है. समस्या यह है कि सरकारी रिकॉर्ड में कई मौतों को "दुर्घटना", "दम घुटना", "गैस रिसाव" या दूसरी वजहों से दर्ज किया जाता है, लेकिन उन्हें मैनुअल स्कैवेंजिंग से हुई मौत के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता.

मैनुअल स्कैवेंजिंग से हुई मौत स्वीकार होने पर सरकार को 30 लाख रुपये मुआवजा देना होता है और मैनुअल स्कैवेंजर्स के रोजगार निषेध एवं पुनर्वास अधिनियम, 2013 तथा एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज करनी पड़ सकती है. इसलिए मौतों की वास्तविक प्रकृति दर्ज न होना प्रभावित परिवारों के लिए मुआवजे और न्याय की लड़ाई को और कठिन बना देता है.

अनुपस्थिति का सवाल

सफाईकर्मियों की अनुपस्थिति को केवल काम से गैरहाजिरी के रूप में नहीं देखा जा सकता. कई बार ठेकेदार महीनों तक वेतन नहीं देते. ऐसे में महिलाएं अपने बच्चों का पेट पालने के लिए घरेलू काम करने को मजबूर होती हैं.

सुरक्षा उपकरणों की कमी भी बड़ी समस्या है. कचरे में छिपी संक्रमित सुइयों से चोट लगने और संक्रमण का खतरा बना रहता है. कई जगह महिलाओं के लिए शौचालय नहीं हैं और मासिक धर्म के दौरान भी उन्हें घंटों काम करना पड़ता है. कई परिवार ऐसे भी हैं जहां पति की सीवर में मौत के बाद 30 लाख रुपये का मुआवजा वर्षों तक नहीं मिला.

ऐसे हालात में अनुपस्थिति को कर्मचारी की गलती बताना समस्या की मूल वजहों को नजरअंदाज करना है.

जाति, ठेका व्यवस्था और तकनीक

सफाईकर्मियों के नियमितीकरण की मांग केवल नौकरी की सुरक्षा का मुद्दा नहीं है. स्थायी कर्मचारी होने पर वह असुरक्षित सीवर में उतरने से इनकार कर सकता है और मशीन से सफाई की मांग कर सकता है. ठेका कर्मचारी के पास यह विकल्प नहीं होता, क्योंकि ठेकेदार अगले दिन उसकी जगह किसी और को रख सकता है.

कर्नाटक ने 2024 में सुप्रीम कोर्ट के सामने 500 सक्शन मशीन और बैंडिकूट रोबोट उपलब्ध कराने का वादा किया था. इसके बावजूद बेंगलुरु महानगरपालिका में 15 फीट गहरे मैनहोल में रस्सी बांधकर लोगों को उतारने की घटनाएं जारी रहने का आरोप है.

सुरक्षित तकनीक उपलब्ध कराने के बजाय केवल कर्मचारियों की उपस्थिति पर सवाल उठाना उस व्यवस्था को नहीं बदलता जिसमें सफाई का सबसे खतरनाक काम आज भी एक खास जातिगत समुदाय के लोगों से कराया जाता है.

ऑल इंडिया सेंट्रल काउंसिल ऑफ ट्रेड यूनियंस ने मंत्री के बयान की निंदा करते हुए सार्वजनिक माफी, नियमितीकरण, सुरक्षा और सम्मान की मांग की है.

सुप्रीम कोर्ट की अवमानना और जमीन की हकीकत

सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों के मुख्य सचिवों को इसलिए अवमानना नोटिस दिया क्योंकि 2023 के निर्देशों का प्रभाव जमीन पर दिखाई नहीं दे रहा था. ऊपर से नीचे तक जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डालने वाली व्यवस्था में सबसे अंत में सफाईकर्मी ही दबाव झेलता है.

मुख्य सचिव से लेकर महानगरपालिका आयुक्त, आयुक्त से ठेकेदार और ठेकेदार से सफाईकर्मी तक जिम्मेदारी का यह सिलसिला चलता है. जब सफाईकर्मी स्थायी नौकरी और सुरक्षित काम की मांग करता है तो उसी पर काम से अनुपस्थित रहने का आरोप लगाया जाता है.

स्थायी नौकरी सफाईकर्मी के लिए किसी सरकारी कृपा से अधिक है. यह उसे असुरक्षित सीवर में उतरने से इनकार करने और मशीन से काम कराने की मांग करने का अधिकार देती है.

दलित प्रतिरोध की आवाज

कर्नाटक की लेखिका डु सरस्वती ने मंत्री की टिप्पणी को जातिवादी, सामंती और स्त्री-विरोधी मानसिकता का प्रतिबिंब बताया. उनके अनुसार, "तुम लोग काम पर नहीं आते" जैसी भाषा प्रशासनिक जवाबदेही की भाषा नहीं बल्कि जातिगत वर्चस्व की भाषा है.

सफाईकर्मियों के अनुभव बताते हैं कि समस्या केवल एक मंत्री के बयान तक सीमित नहीं है. यह उस सामाजिक मानसिकता से जुड़ी है जिसमें कुछ समुदायों को गंदगी साफ करने के लिए स्वाभाविक रूप से उपलब्ध मान लिया जाता है.

इसके बावजूद दलित प्रतिरोध लगातार अपनी आवाज उठा रहा है. यह प्रतिरोध न्याय, समानता और सम्मान की मांग करता है. यह उस व्यवस्था को चुनौती देता है जिसमें सफाईकर्मियों का श्रम शहरों को साफ रखता है लेकिन उनके जीवन, स्वास्थ्य और सुरक्षा को महत्व नहीं दिया जाता.

593 मौतों में से 261 का सरकारी रिकॉर्ड में गायब होना केवल आंकड़ों की विसंगति नहीं है. इसके पीछे 261 परिवार, जीवन, संघर्ष और भविष्य हैं. जब सरकार मौतों को कम करके दिखाती है, जब ठेकेदार सुरक्षा की जिम्मेदारी से बचते हैं और जब सफाईकर्मियों की नियमितीकरण की मांग को अनुपस्थिति के सवाल में बदल दिया जाता है, तब समस्या केवल प्रशासनिक विफलता नहीं रह जाती.

यह संविधान में निहित समानता, सम्मान और सामाजिक न्याय की कसौटी बन जाती है. सफाईकर्मी आज भी सीवर और कचरे के बीच मौजूद हैं, लेकिन उनके अधिकार और उनकी मौतें व्यवस्था की नजर में अदृश्य नहीं होनी चाहिए.

रेव. ई. इमैनुएल नेहेमायाह दलित ईसाई धर्मशास्त्री, लेखक, कार्यकर्ता और सीएसआई-कर्नाटक सेंट्रल डायोसिस, बेंगलुरु के पादरी हैं. यह उनके अंग्रेजी लेख का हिंदी में अनूदित अंश है.

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