परकला प्रभाकर | एसआईआर भारतीय नागरिकता की बुनियाद को कैसे कमजोर कर रहा है
'फ्रंटलाइन' में परकला प्रभाकर ने लिखा है कि मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर ने भारत में नागरिकता और लोकतांत्रिक भागीदारी के स्वरूप को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम हटने से देश में धीरे-धीरे दो वर्ग बन रहे हैं - एक, जिनके पास मतदान का अधिकार है और दूसरा, जो इस अधिकार से बाहर हो गए हैं.
अब तक देश की मौजूदा मतदाता सूची से करीब 13 करोड़ नाम हटाए जाने का अनुमान है और प्रक्रिया पूरी होने तक यह संख्या एक करोड़ और बढ़ सकती है. पहले से ही अनुमानित 15 करोड़ विमुक्त, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातियों के करीब 98 प्रतिशत लोग मतदाता सूची में नहीं हैं. ऐसे में एसआईआर से बाहर होने वाली बड़ी आबादी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता पैदा करती है. हालांकि हटाए गए सभी नाम गलत तरीके से हटाए गए हों, ऐसा जरूरी नहीं है. इनमें मृत, डुप्लीकेट, दूसरे स्थान पर चले गए या अन्य श्रेणी के लोग भी हो सकते हैं. लेकिन देश के भीतर एक जगह से दूसरी जगह जाने वाले व्यक्ति को देश की कुल मतदाता संख्या से बाहर नहीं होना चाहिए.
बड़े पैमाने पर नाम हटाने का असर
एसआईआर के तहत उत्तर प्रदेश में 2.89 करोड़, महाराष्ट्र में 2.06 करोड़, कर्नाटक में 1.07 करोड़, तमिलनाडु में 97 लाख, पश्चिम बंगाल में 93 लाख, गुजरात में 77 लाख, तेलंगाना में 73 लाख और बिहार में 65 लाख नाम हटाए गए हैं. दिल्ली की मतदाता सूची में 35.89 प्रतिशत यानी करीब 47.5 लाख नाम कम हुए हैं. हरियाणा में लगभग 34 लाख नाम हटाए गए, जो मौजूदा मतदाताओं का 16.38 प्रतिशत है. झारखंड में करीब 16.5 प्रतिशत, अरुणाचल प्रदेश में 19 प्रतिशत, अंडमान-निकोबार में 22.32 प्रतिशत और चंडीगढ़ में 31.84 प्रतिशत नाम हटाए गए हैं.
अभी नागालैंड और त्रिपुरा का डेटा बाकी है, जबकि हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में एसआईआर शुरू होना बाकी है.
हैदराबाद लोकसभा क्षेत्र के मालकपेट में 2023 विधानसभा चुनाव में 1,32,024 वोट पड़े थे, जबकि एसआईआर में 1,47,799 मतदाताओं के नाम हटाए गए. याकूतपुरा में 1,54,982 नाम हटाए गए, जबकि 2023 में 1,40,434 वोट पड़े थे. दिल्ली के चांदनी चौक विधानसभा क्षेत्र के एक बूथ पर 909 में से 908 मतदाताओं के नाम हटाए जाने का मामला भी सामने आया.
पहले चरण में बिहार में करीब 8 प्रतिशत नाम हटे. दूसरे चरण में यह अनुपात 13 प्रतिशत से थोड़ा अधिक और तीसरे चरण में 15 प्रतिशत से ज्यादा पहुंच गया. वहीं, कुछ रिपोर्टों में कुल हटाए गए नामों के बजाय नए नाम जुड़ने के बाद की शुद्ध संख्या दिखाई गई, जिससे बड़े पैमाने पर हुई कटौती का वास्तविक आकार कम नजर आ सकता है.
मृत और डुप्लीकेट मतदाताओं का सवाल
कई जांचों में ऐसे लोगों के नाम हटाए जाने का मामला सामने आया जिन्हें मृत बताया गया था, जबकि वे जीवित थे. तमिलनाडु में किए गए एक अध्ययन में मृत घोषित मतदाताओं की उम्र आधिकारिक मृत्यु दर के आंकड़ों से मेल नहीं खाती पाई गई. पश्चिम बंगाल में भी मृत, स्थानांतरित या अनुपस्थित बताए गए कई मतदाता सरकारी कार्यालयों में अपने नाम बचाने के लिए पहुंचे.
बिहार में एसआईआर के बाद भी 1.32 करोड़ कथित फर्जी पते सामने आए. बराचट्टी में एक ही पते पर 877 और पिपरा के गलीमपुर गांव में 509 मतदाता दर्ज पाए गए, जबकि एक पता अस्तित्व में ही नहीं था. राज्य की सभी 243 विधानसभा सीटों में जांच के दौरान 14.35 लाख डुप्लीकेट मतदाता भी पाए गए.
घुसपैठियों को हटाने का दावा
एसआईआर को विदेशी नागरिकों और घुसपैठियों को मतदाता सूची से हटाने की प्रक्रिया के रूप में भी पेश किया गया. लेकिन बिहार के आंकड़ों पर नजर डालें तो संदिग्ध विदेशी नागरिकों के खिलाफ कुल 1,087 आपत्तियां आईं. इनमें केवल 390 मामलों को सत्यापन के योग्य माना गया. इनमें 76 नाम मुस्लिम थे. सीमांचल के 10 मामलों में केवल 5 मुस्लिम थे और उनमें से 2 मृत पाए गए. अंततः केवल 3 लोगों की पहचान विदेशी नागरिकों के रूप में हुई.
इसके बावजूद सोशल मीडिया पर हजारों घुसपैठियों के पकड़े जाने और उनके देश छोड़कर भागने का दावा लगातार प्रचारित होता रहा.
अगर विदेशी नागरिकों को हटाना एसआईआर का प्रमुख उद्देश्य है तो असम में एसआईआर क्यों नहीं किया गया, जबकि नागरिकता का सवाल वहां लंबे समय से सबसे अधिक विवादित रहा है. वहां निर्वाचन आयोग ने एसआईआर के बजाय विशेष पुनरीक्षण यानी एसआर का फैसला किया.
सुप्रीम कोर्ट ने 27 मई 2026 के फैसले में संदिग्ध विदेशी नागरिकों के मामलों को नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत सक्षम प्राधिकरण के पास भेजने का निर्देश दिया था. तीन महीने से अधिक समय बीतने के बाद भी ऐसी सूची सार्वजनिक नहीं की गई है.
2002 के एसआर और मौजूदा एसआईआर में अंतर
निर्वाचन आयोग मौजूदा एसआईआर को 2002 में हुए इसी तरह के पुनरीक्षण से जोड़ता रहा है. लेकिन 2002 में हुई प्रक्रिया मौजूदा एसआईआर से अलग थी. उस समय इसे विशेष प्रकृति का गहन पुनरीक्षण कहा गया था और मौजूदा "मदर लिस्ट" के आधार पर पारदर्शी तरीके से बदलाव किए जाने थे.
2002 की प्रक्रिया में ग्राम सभाओं और वार्ड समितियों की बैठकों में पुनरीक्षण करने का प्रावधान था. मनमाने तरीके से नाम हटाने की गुंजाइश नहीं थी. जब कार्यकर्ताओं ने आरटीआई के तहत 2002 की गाइडलाइन मांगी तो निर्वाचन आयोग ने कहा कि उसके पास इसकी प्रति उपलब्ध नहीं है.
किन लोगों पर ज्यादा असर?
स्वतंत्र शोधों और मीडिया जांचों में मुस्लिम और ईसाई अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों, आर्थिक रूप से कमजोर लोगों, अशिक्षितों, दिहाड़ी मजदूरों और प्रवासी श्रमिकों के नाम बड़ी संख्या में हटने की बात सामने आई है. महिलाओं पर भी इसका असर अधिक बताया गया है.
एसआईआर के बाद कई राज्यों में अंतिम मतदाता संख्या वयस्क आबादी से काफी कम हो गई है. उत्तर प्रदेश में यह अंतर करीब 3 करोड़ और बिहार में लगभग 80 लाख बताया गया है. सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार वाली व्यवस्था में यह अंतर गंभीर सवाल खड़े करता है.
मतदाता सूची से नाम हटने का सीधा असर राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर पड़ता है. जिन लोगों के पास वोट नहीं है, उनके मुद्दों और प्राथमिकताओं पर राजनीतिक दलों के लिए ध्यान देना कम जरूरी हो जाता है. इससे गरीब, प्रवासी, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक समुदायों की राजनीतिक आवाज कमजोर हो सकती है.
राजनीतिक व्यवस्था का "भाजपाईकरण"
यदि एसआईआर जैसी प्रक्रिया बार-बार जारी रहती है और कुछ सामाजिक समूह लगातार राजनीतिक अधिकारों से बाहर होते जाते हैं तो मतदाता समाज की संरचना भी बदल सकती है. ऐसी स्थिति में राजनीतिक दल मुख्य रूप से उन समूहों को संबोधित करेंगे जिनके पास मतदान का अधिकार बचा है.
इससे सभी राजनीतिक दलों पर बहुसंख्यक हिंदू मतदाताओं को केंद्र में रखकर राजनीति करने का दबाव बढ़ सकता है. दूसरे दल चुनावी रूप से प्रासंगिक बने रहने के लिए भाजपा जैसी राजनीति अपनाने की ओर बढ़ सकते हैं. इस तरह लंबे समय में पूरी राजनीतिक व्यवस्था का "भाजपाईकरण" हो सकता है.
सार्वजनिक जीवन में बहुसंख्यक धार्मिक प्रतीकों की बढ़ती मौजूदगी को भी इसी व्यापक बदलाव से जोड़कर देखा गया है. संसद में सेंगोल, सरकारी कार्यक्रमों में "वंदे मातरम्" की सभी छह कड़ियों को शामिल करने का आदेश और सरकारी योजनाओं के ऐसे नामकरण के उदाहरण दिए गए हैं जिनमें हिंदू धार्मिक ग्रंथों और प्रतीकों की छाप दिखाई देती है.
इजराइल से तुलना
भारत की मौजूदा राजनीतिक दिशा की तुलना इजराइल की राजनीतिक संस्कृति से भी की गई है. इजराइल में यहूदी पहचान और धार्मिक प्रतीक राज्य की पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और राजनीति में यहूदी हितों का केंद्रीय स्थान है. इसी आधार पर भारत में एसआईआर को ऐसी व्यवस्था की ओर बढ़ते कदम के रूप में देखा जा रहा है जहां राजनीतिक दलों के लिए बहुसंख्यक हिंदू समाज ही मुख्य राजनीतिक समाज रह जाए.
भाजपा के प्रभाव में अन्य दलों का बहुसंख्यकवादी राजनीति की ओर बढ़ना और राज्य की पहचान में धार्मिक प्रतीकों की बढ़ती भूमिका मिलकर भारतीय राजनीति के "इजराइलीकरण" की दिशा बना सकती है.
नागरिकता को कमजोर करने का सवाल
भारतीय गणराज्य की मूल अवधारणा में नागरिकता धर्म, जाति, भाषा, लिंग, क्षेत्र, आर्थिक स्थिति या संस्कृति पर आधारित नहीं थी. संविधान ने अलग-अलग पहचान वाले लोगों को समान नागरिक और समान राजनीतिक अधिकार देने की व्यवस्था की.
इसके विपरीत, यदि बड़ी आबादी मतदान के अधिकार से बाहर हो जाती है तो नागरिकता केवल कागजी पहचान बनकर रह सकती है. मतदान का अधिकार खत्म होने पर नागरिकों की राजनीतिक आवाज और सत्ता पर उनका प्रभाव भी खत्म हो जाता है.
भारत की बहुलतावादी अवधारणा इस विचार पर आधारित थी कि अलग-अलग धर्म, जाति, भाषा और संस्कृति के लोग समान अधिकारों के साथ एक ही गणराज्य में रह सकते हैं. एसआईआर के जरिए बड़ी आबादी को राजनीतिक प्रक्रिया से बाहर किया जाना इस मूल विचार को कमजोर कर सकता है.
यही वजह है कि एसआईआर का सवाल केवल मतदाता सूची की सफाई या चुनावी प्रक्रिया तक सीमित नहीं है. यह इस बुनियादी प्रश्न से जुड़ गया है कि भारत में नागरिक कौन है, नागरिकता का वास्तविक अर्थ क्या है और लोकतांत्रिक भारत में किसकी आवाज राजनीतिक रूप से सुनी जाएगी.
परकला प्रभाकर राजनीतिक अर्थशास्त्री और 'द क्रूकेड टिम्बर ऑफ न्यू इंडिया' के लेखक हैं.यह उनके अंग्रेजी लेख का हिंदी में अनूदित अंश है.

